दास प्रथा के लिए माफी मांग सकता है ब्रिटेन
औपनिवेशिक अतीत और अटलांटिक पार दास व्यापार में उसकी भूमिका
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने देश के औपनिवेशिक अतीत और अटलांटिक पार दास व्यापार में उसकी भूमिका को लेकर औपचारिक माफी की संभावना के संकेत दिए हैं। उनके इस रुख से सदियों पुराने ऐतिहासिक अन्याय और उसकी जवाबदेही का मुद्दा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आ गया है। हालांकि ब्रिटेन ने माफी पर बातचीत की इच्छा जताई है, लेकिन आर्थिक मुआवजे की मांग को स्वीकार करने के संकेत नहीं दिए हैं। दरअसल, 15वीं से 19वीं शताब्दी के बीच यूरोपीय देशों ने अफ्रीका के लाखों लोगों को जबरन पकड़कर गुलाम बनाया और अटलांटिक महासागर के रास्ते अमेरिका तथा कैरेबियाई द्वीपों में भेजा। वहां उनसे गन्ने, कपास, तंबाकू और अन्य कृषि उत्पादों के बागानों में अमानवीय परिस्थितियों में काम कराया जाता था।
ऐतिहासिक अनुमानों के मुताबिक, करीब 1.25 करोड़ अफ्रीकी लोगों को इस व्यापार के तहत जहाजों पर चढ़ाया गया था। इनमें से बड़ी संख्या यात्रा के दौरान ही बीमारी, भूख और प्रताड़ना के कारण जान गंवा बैठी। ब्रिटेन इस व्यापार में प्रमुख भागीदार रहा और उसके जहाजों के जरिये लाखों अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर दूसरे महाद्वीपों तक पहुंचाया गया। ब्रिटेन ने 1807 में दास व्यापार पर प्रतिबंध लगाने का कानून बनाया और 1833 में अपने साम्राज्य में गुलामी समाप्त करने का कानून पारित किया, जो 1834 से प्रभावी हुआ। लेकिन गुलामी खत्म होने के बाद भी उसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव समाप्त नहीं हुए। उल्लेखनीय है कि उस समय ब्रिटिश सरकार ने गुलामों के मालिकों को मुआवजा दिया था, जबकि गुलामी झेलने वाले लोगों को कोई क्षतिपूर्ति नहीं मिली। अब कैरेबियाई देशों के नेता ब्रिटेन से इस ऐतिहासिक अन्याय के लिए औपचारिक माफी के साथ आर्थिक क्षतिपूर्ति की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि दास प्रथा और औपनिवेशिक शोषण के कारण पैदा हुई गरीबी, आर्थिक असमानता तथा सामाजिक पिछड़ापन आज भी प्रभावित देशों की चुनौतियों में शामिल हैं।
कैरेबियाई देशों के संगठन कैरिकॉम ने भी लंबे समय से इस दिशा में आवाज उठाई है। बर्नहैम ने प्रभावित देशों और समुदायों के साथ औपचारिक बातचीत की पेशकश की है। इस चर्चा में माफी की मांग को भी शामिल करने की बात कही गई है। साथ ही उन्होंने गरीब राष्ट्रमंडल देशों के कर्ज के पुनर्गठन और उन्हें आर्थिक राहत देने की पहल का समर्थन किया है। हालांकि कैरेबियाई देशों का कहना है कि कर्ज में राहत और ऐतिहासिक अन्याय की क्षतिपूर्ति दो अलग-अलग विषय हैं। इस पूरे घटनाक्रम का महत्व केवल ब्रिटेन की संभावित माफी तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या किसी देश की वर्तमान पीढ़ी अपने पूर्वजों के ऐतिहासिक अपराधों की जिम्मेदारी स्वीकार करे और उसकी भरपाई में योगदान दे। औपचारिक माफी अतीत की पीड़ा को स्वीकार करने का प्रतीक हो सकती है, लेकिन उससे प्रभावित समाजों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति अपने आप नहीं बदलती। इसलिए असली चुनौती माफी से आगे बढ़कर समानता, विकास और ऐतिहासिक न्याय की दिशा में ठोस कदम उठाने की है।

Comment List