मातृभाषा का महत्व और अस्तित्व की रक्षा

व्यक्ति की पहचान, उसकी सनातन संस्कृति, परंपराओं और सोच का मुख्य आधार होती है

मातृभाषा का महत्व और अस्तित्व की रक्षा

21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में यह दिवस दुनिया भर में भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देने के साथ ही साथ विभिन्न मातृभाषाओं के संरक्षण के महत्व को समझाने के लिए समर्पित है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह दिवस मातृभाषाओं के संरक्षण और संवर्धन को बढ़ावा देने, भाषाई विविधता और बहुभाषावाद को प्रोत्साहित करने,शिक्षा में मातृभाषा के महत्व को उजागर करने तथा लुप्त होती भाषाओं के प्रति जागरूकता फैलाने के क्रम में मनाया जाता है। मातृभाषा केवल संचार का ही माध्यम नहीं होती है, बल्कि यह व्यक्ति की पहचान, उसकी सनातन संस्कृति, परंपराओं और सोच का मुख्य आधार होती है। नेल्सन मंडेला का यह मानना था कि यदि आप किसी व्यक्ति से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह समझता है, तो वह उसके दिमाग में जाती है। यदि आप उससे उसकी मातृभाषा में बात करते हैं, तो वह उसके दिल तक पहुंचती है। यदि हम मातृभाषा के महत्व की बात करें तो मातृभाषा का महत्व अत्यंत व्यापक और गहरा होता है, क्योंकि यही भाषा व्यक्ति के जीवन की पहली सीख, भावनाओं की अभिव्यक्ति और सोचने समझने का आधार बनती है।

मातृभाषा का संरक्षण :

मातृभाषा के माध्यम से बच्चे दुनिया को आसानी से समझते हैं, इसलिए शुरुआती शिक्षा यदि अपनी भाषा में मिले तो ज्ञान अधिक प्रभावी ढंग से ग्रहण होता है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है। यह भाषा व्यक्ति को उसकी संस्कृति, परंपराओं और पहचान से जोड़ती है तथा सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाती है। मातृभाषा का संरक्षण केवल एक भाषा को बचाना नहीं, बल्कि पूरी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना है और यही भी कारण है कि यूनेस्को सहित विश्व भर की संस्थाएं मातृभाषाओं के संरक्षण और उपयोग पर विशेष जोर देती हैं। आज बच्चे अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं तो उनकी समझ, रचनात्मकता और आत्मविश्वास अधिक मजबूत होता है। बहरहाल, यदि हम यहां पर इस दिवस के इतिहास की बात करें तो इस दिवस की शुरुआत यूनेस्को ने वर्ष 1999 में की थी और वर्ष 2000 से इसे वैश्विक स्तर पर मनाया जाने लगा। हर वर्ष इस दिवस की एक थीम रखी जाती है और अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और इस साल की थीम क्रमशः सतत विकास के लिए भाषाओं को महत्वपूर्ण बनाएं, तथा बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज़,वर्ष 2026 की थीम रखी गई है। इस साल यानी कि वर्ष 2026 की थीम का मतलब यह है कि शिक्षा प्रणाली में कई भाषाओं, विशेष रूप से मातृभाषा, के महत्व को लेकर युवाओं के विचारों, उनके अनुभवों तथा विभिन्न सुझावों को महत्व दिया जाए।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार :

Read More जानें राज काज में क्या है खास 

इस थीम का उद्देश्य यह बताना है कि जब बच्चों को शुरुआती शिक्षा,विशेषकर प्राथमिक शिक्षा उनकी अपनी भाषा में मिलती है तो उनकी समझ बेहतर होती है, उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और सीखने में रुचि भी अधिक रहती है। साथ ही, युवाओं को अपनी भाषाई पहचान और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए प्रेरित करना भी इसका लक्ष्य है। वास्तव में आज के समय में शिक्षा नीतियों और व्यवस्थाओं में युवाओं की भागीदारी बहुत ही जरूरी है, क्योंकि वही भविष्य के समाज का निर्माण करते हैं। इसी सोच को बढ़ावा देने के लिए यूनेस्को हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के माध्यम से जागरूकता फैलाता है। मातृभाषा के संरक्षण और संवर्धन को लेकर आज वैश्विक और स्थानीय स्तर पर गहरी चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि किसी भी समाज की संस्कृति, स्मृति और पहचान की संवाहक होती है। जब एक मातृभाषा दम तोड़ती है, तो उसके साथ सदियों का पारंपरिक ज्ञान और अद्वितीय विश्वदृष्टि भी लुप्त हो जाती है।इस क्रम में संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, हर दो सप्ताह में एक भाषा विलुप्त हो जाती है और विश्व एक पूरी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत खो देता है।

Read More चिकित्सा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र को सशक्त बनाता बजट

विशेषज्ञों का अनुमान है :

Read More एग्जाम स्ट्रेस से सफलता तक परीक्षा फोबिया

यूनेस्को के ही अनुसार, विश्व की लगभग 6,000 से अधिक भाषाओं में से करीब 43 प्रतिशत लुप्तप्राय की श्रेणी में हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि संरक्षण के ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो इस सदी के अंत तक दुनिया की आधी भाषाएं गायब हो सकती हैं। यदि हम यहां पर भारत की स्थिति की बात करें तो एक सर्वे के अनुसार, पिछले 50 वर्षों में भारत ने अपनी लगभग 250 भाषाएं खो दी हैं। भारत में वर्तमान में लगभग 196 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें यूनेस्को ने असुरक्षित माना है। यह चिंताजनक बात है कि आज के समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़त बनाने की होड़ में अंग्रेजी जैसी भाषाओं का प्रभुत्व बढ़ रहा है। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है, जिससे उन्हें प्रशासनिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक संरक्षण मिलता है। यह भाषाई विविधता की रक्षा का एक मजबूत आधार है। आज भाषाओं को सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है।लोकभाषाओं और बोलियों के उत्सव भी आयोजित किए जाते हैं, साहित्य सर्जन पुरस्कारों की भी व्यवस्था हमारे यहां है। अंत में यही कहूंगा कि मातृभाषा का संरक्षण केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक व्यक्तिगत और सामाजिक कर्तव्य भी है।

-सुनील कुमार महला
यह लेखक के अपने विचार हैं।

Related Posts

Post Comment

Comment List

Latest News

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ट्रंप ने लागू किए 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ : ट्रंप ने न्यायालय के फैसले को बताया बेहद निराशाजनक, कहा- रद्द टैरिफ के स्थान पर वैकल्पिक उपायों का होगा इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ट्रंप ने लागू किए 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ : ट्रंप ने न्यायालय के फैसले को बताया बेहद निराशाजनक, कहा- रद्द टैरिफ के स्थान पर वैकल्पिक उपायों का होगा इस्तेमाल
यह कदम ट्रंप के संरक्षणवादी व्यापार एजेंडे का हिस्सा बताया जा रहा है, जिसका उद्देश्य भुगतान संतुलन घाटे और कथित...
पहले बांटते थे नोट, अब पांच जिलों के दफ्तर आलमारियों में सिमटे
न्यूक्लियर डील के डॉक्यूमेंट से बड़ा खुलासा, सऊदी अरब को परमाणु बम बनाने में मदद कर रहा अमेरिका 
शहीद आश्रितों को सरकारी नियुक्ति : 14 आवेदन प्राप्त, 6 को मिली नौकरी ; अविवाहित सैनिक के मामले में भाई या बहन आश्रित की श्रेणी में शामिल
Weather Update : प्रदेश में सर्दी पड़ी कमजोर, दिन में तेज धूप सताने लगी 
हिमाचल के छात्रों ने किया अनोखा आविष्कार : अब जूते लगाएंगे लैंडमाइन का पता, सेना के जवान नहीं होंगे लापता
चीन को 6जी तकनीक में बड़ी कामयाबी : नई संचार तकनीक ने डेटा स्पीड में बनाया रिकॉर्ड, 5जी से दस गुना तेज ट्रांसमिशन