प्रदूषण के कारकों के खात्मे की जरूरत

असुरक्षित हवा 

प्रदूषण के कारकों के खात्मे की जरूरत

आज देश गंभीर वायु प्रदूषण के दौर से गुजर रहा है।

आज देश गंभीर वायु प्रदूषण के दौर से गुजर रहा है। इसका दुष्प्रभाव भयावह स्तर पर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। वायु प्रदूषण प्रमुख पर्यावरणीय समस्याओं में से एक है, जिसका प्राणी जगत पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। सच कहें, तो वायु प्रदूषण के लिए मानवजनित स्रोत ही वे अहम तत्व हैं, जो बाहरी तत्वों से मिलकर वायु की गुणवत्ता में कमी लाते हैं, जो मानव जाति और जीव-जंतुओं के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। इसी जानलेवा हवा में कार्बन डाई आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, क्लोरीन, सीसा, अमोनिया, कैडमियम, धूल आदि मानवजनित वायु प्रदूषक तत्वों की अहम भूमिका होती है। हमारा देश दुनिया के प्रदूषित देशों की सूची में शामिल है। यहां हर साल तकरीबन 20 लाख से ज्यादा लोग प्रदूषित हवा के चलते मौत के मुंह में चले जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज 93 फीसदी बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन :

वायु प्रदूषण में सर्वाधिक योगदान जीवाश्म ईंधन और बायोमास के जलाने से होता है, जो परिवहन, ऊर्जा उत्पादन, विनिर्माण और कृषि क्षेत्रों में होते हैं। इन गतिविधियों से निकलने वाली गैसें जैसे कार्बन मोनोक्साइड, कार्बन आक्साइड, नाइट्रोजन डाय आक्साइड तथा सूक्ष्म कण पार्टिकुलेट मैटर यानी पी एम वायुमंडल को प्रदूषित करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो गरीब और मध्यम आय वर्ग के देश घरेलू और बाहरी दोनों तरह के वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। भारत जैसे देश में अधिकतर जनसंख्या राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों से ज्यादा प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर है। वैज्ञानिक विश्लेषणों से यह साबित हो चुका है कि कोयला और परिवहन उत्सर्जन के दो प्रमुख स्रोत हैं। ये दोनों वायु प्रदूषण के सबसे खतरनाक रूपों में बड़े भूभाग को प्रभावित करते हैं। यह भी कि वायु प्रदूषण से जुड़ी होने वाली स्वास्थ्य समस्यायें अक्सर एयरोसोल से जुड़ी होती हैं। एयरोसोल हवा में निलंबित सूक्ष्म ठोस या तरल लवण होते हैं, जो अक्सर दिखाई नहीं देते।

स्वास्थ्य पर प्रभाव :

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इनका निर्माण प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों स्रोतों से होता है। इनका आकार कुछ नैनोमीटर से लेकर कई माइक्रोमीटर तक हो सकता है। इसे कणों के आधार पर पी एम 2.5 आदि नामों से जाना जाता है। एयरोसोल में यह धुंआ, कोहरा और औद्योगिक प्रदूषण कण हैं। ये कण वायुमंडल में निलंबित धूल, समुद्री नमक, ज्वालामुखी की राख, धुंआ, पेड़ों से निकलने वाला रसायन और विभिन्न प्रकार के उत्सर्जन जैसे जीवाश्म ईंधन जलने यथा कारों और कारखानों से निकलने वाला प्रदूषण और औद्योगिक प्रदूषण आदि रूपों में पाया जाता है। यह जलवायु, मौसम और स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। एयरोसोल में मौजूद विषाक्त पदार्थ शरीर में विषाक्तता सम्बंधित प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं। इसके चलते श्वसन सम्बंधी, लीवर,तंत्रिका तंत्र,आंख और त्वचा की समस्या पैदा होती है। इसके लम्बे समय तक संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। इसके प्रभाव से पौधे और जानवर भी अछूते नहीं रह गये हैं।

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शरीर को नुकसान :

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एयरोसोल के कण फेफड़ों में जलन पैदा कर सकते हैं और अत्याधिक सान्द्रता के कारण श्वसन तंत्र को अवरुद्ध भी कर सकते हैं। यहां तक कि यह मृत्यु का कारण भी बन सकते हैं। इसके सूक्ष्म कणों से होने वाले वायु प्रदूषण से हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। वायु प्रदूषण आपके फेफड़े, दिल, दिमाग ही नहीं, पूरे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। शरीर का कोई अंग ऐसा नहीं है, जो इसके प्रभाव से अछूता हो। इस बाबत देश के 80 से ज्यादा पद्म पुरस्कार प्राप्त डाक्टरों ने चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि भारत में सभी श्वसन संबंधी मौतों में से एक तिहाई से अधिक वायु गुणवत्ता से जुड़ी हैं। इसके अलावा स्ट्रोक से होने वाली लगभग 40 फीसदी मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है। जिन परिवारों के पास एयर प्यूरीफायर नहीं है, उनको रोजाना गीले कपड़े से सफाई करना, अगरबत्ती, धूपवत्ती, कपूर और मास्क्यूटो कौइल से बचना चाहिए।

असुरक्षित हवा :

हालात की भयावहता का सबूत यह है कि देश की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी रोजाना असुरक्षित हवा में सांस ले रही है। प्रदूषण का असर अब दमा, हृदय रोगों से भी कहीं आगे बढ़ गया है। अब यह कैंसर और मेटाबोलिक विकार को भी पार कर गया है। अब वातावरण में मानक से भी ढ़ाई गुणा प्रदूषक कण मौजूद हैं। यह बेहद खतरनाक स्थिति है। हालात की गंभीरता का प्रमाण यह है कि डाक्टर दिल्ली वालों को कुछ दिनों के लिए पहाड़ों पर जाने की सलाह दे रहे हैं। विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र की मानें तो दिल्ली में हानिकारक जहरीली गैसों यथा नाइट्रोजन डाय आक्साइड और कार्बन मोनोक्साइड का स्तर लगातार बढ़ रहा है। राजधानी के प्रदूषण में लगभग 51.5 फीसदी योगदान वाहनों के उत्सर्जन का है। इसके बाद आवासीय उत्सर्जन और दूसरे कारक जिम्मेदार हैं। राजधानी में मुख्य रूप में प्रदूषण वाहनों और दहन स्रोतों से हो रहा है। हकीकत में दिल्ली के तकरीबन 11 से अधिक स्थानों पर एक्यूआई 400 के पार है। वायु प्रदूषण अब एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। अब इसका दीर्घकालिक उपाय ढूंढना जरूरी हो गया है। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि कि मामला बेहद गंभीर है।

-ज्ञानेन्द्र रावत
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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