प्रदूषण से उड़कर बादलों में घुलते कीटनाशक

दूषित होना चिंताजनक 

प्रदूषण से उड़कर बादलों में घुलते कीटनाशक

कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल के दुष्प्रभावों से दुनिया भर के लोग परेशान हैं।

कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल के दुष्प्रभावों से दुनिया भर के लोग परेशान हैं। हमारी धरती, वायु से लेकर खानपान की चीजों तक कीटनाशकों की मौजदूगी के प्रमाण पहले ही मिल चुके हैं। ताजा अध्ययनों के नतीजे यकीनन डराने वाले हैं। हाल में इस अध्ययन की रिपोर्ट आई है, जिससे पता चलता है कि कीटनाशक अब केवल खेतों या फसलों तक सीमित नहीं रहे। यह रासायनिक जहर अब बादलों में भी पहुंच चुका है। यानी जो बादल कभी जीवनदायी जल के रूप में अमृत बरसाते थे, अब वही प्रदूषित बूंदों के जरिए धरती पर जहर बरसा रहे हैं। भारत में भी बादलों में कीटनाशकों के मौजूद होने की पुष्टि हो चुकी है। हाल में यह भयावह सच्चाई फ्रांस के क्लेरमोंट औवर्गे विश्वविद्यालय की टीम के अध्ययन में सामने आई है। इस टीम ने फ्रांस और इटली के बादलों व बारिश के नमूनों का विश्लेषण किया तो परिणाम चौंकाने वाले आए। अध्ययन में पाया गया कि बारिश के पानी में 32 तरह के कीटनाशक पाए गए, जिनमें से कई कीटनाशक यूरोप में एक दशक से प्रतिबंधित हैं।

अध्ययन में पाया गया :

अध्ययन में पाया गया है कि यह जहर हवा में घुल चुका है और बारिश के साथ खेतों, झीलों, तालाबों, जंगलों, यहां तक कि पहाड़ों तक पहुंच रहा है। यह वही स्थिति है, जैसी कुछ दशक पहले माइक्रो प्लास्टिक के साथ देखी गई थी। माइक्रो प्लास्टिक पहले नदियों में, फिर मछलियों में पाया गया। यह चिंताजनक है कि हमारे देश के बादलों में भी कीटनाशक पहुंच जाने की पुष्टि हो चुकी है। कोलकाता स्थित भारतीय विज्ञान एवं शिक्षा अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ताओं के मुताबिक, पश्चिमी घाट और हिमालय क्षेत्र के बादलों में लगभग 12 प्रकार की विषैली धातुओं की मौजूदगी दर्ज की गई है। इनमें कैडमियम, क्रोमियम, तांबा और जस्ता जैसी धातुएं शामिल हैं। ये खतरनाक तत्व निचले इलाकों में फैले प्रदूषण से उड़कर बादलों में घुल जाते हैं और फिर पृथ्वी के सबसे ऊंचे व संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों तक पहुंच जाते हैं।

दूषित होना चिंताजनक :

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पूर्वी हिमालय के बादलों में प्रदूषण की मात्रा पश्चिमी घाट की तुलना में लगभग डेढ़ गुना अधिक है। भारत विश्व के सबसे बड़े कीटनाशक उपभोक्ता देशों में से एक है। मानसूनी बादलों का दूषित होना चिंताजनक है। अगर कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल नहीं रोका गया, तो इससे बारिश की हर बूंद खेतों को सींचने के साथ-साथ उनमें नया जहर भी मिला सकती है, जिससे नदियां, भूजल और खाद्य श्रृंखला तक सब कुछ प्रभावित होगा। जो अध्ययन हुए हैं, हमें चिंता इसलिए करनी चाहिए, क्योंकि देश में कीटनाशकों के लिहाज से स्थिति पहले से ही गंभीर है। पंजाब, हरियाणा समेत कई हिस्सों में भूजल में कीटनाशकों के अंश पाए जा चुके हैं। पंजाब और राजस्थान के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ जिलों को तो कैंसर बेल्ट कहा जाने लगा है, जहां कीटनाशकों से दूषित पानी गंभीर बीमारियों का कारण बन रहा है। श्रीगंगानगर जिले में बीस साल पहले ही मांओं के दूध में अत्यधिक कीटनाशक पाए जा चुके हैं। हरियाणा की हिसार यूनिवर्सिटी के शोध में भी मां के दूध में जहर की पुष्टि हो चुकी है। यह चिंताजनक है कि विभिन्न राज्यों में फसलों पर अत्यधिक छिड़काव से मिट्टी की उर्वरता घट रही है। अध्ययन से इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि गंगा नदी में मिले विषैले रसायनों का खतरनाक स्तर लुप्तप्राय गंगेटिक डाल्फिन के स्वास्थ्य और अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है।

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विश्वव्यापी समस्या :

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कुल मिलाकर, जब कीटनाशकों का जहर धरती, पानी और हवाओं मेंं पहले ही पहुंच चुका है, वहां बादलों में इसकी पहुंच भयभीत करने वाली है। कीटनाशक अब किसी एक खेत, देश या महाद्वीप की समस्या नहीं रहे। यह विश्वव्यापी समस्या हैं और प्रकृति के साथ समन्वय समाप्त कर हमने इसे खुद खड़ा किया है। अब अगर बादल भी दूषित हो गए हैं, तो यह सबसे बड़ी चेतावनी है। समय आ चुका है कि हमें स्थिति को नियंत्रण से बाहर होने से बचाने के लिए आगे आना चाहिए। कई पुराने और प्रतिबंधित कीटनाशकों का इस्तेमाल अब भी खेतों में किया जा रहा है। इसे रोकना होगा। कीटनाशकों के नियंत्रित इस्तेमाल की नीति को अमली जामा पहनाने की कोशिश में तेजी लानी होगी। प्राकृतिक खेती समाधान की ओर बढ़ने का जरिया है। खेती और बागवानी में वैकल्पिक जैविक उपायों को बढ़ाना होगा। इससे भी जरूरी है कि भारत के मानसूनी बादलों और बारिश के नमूनों में कीटनाशकों की उपस्थिति की निगरानी शुरू की जाए। देश में बारिश और बादलों के नमूनों की जांच होनी चाहिए। क्योंकि जीवन का प्रतीक रहे बादल अब प्रदूषण के वाहक बन रहे हैं। अगर हमने रासायनिक खेती से मुख नहीं मोड़ा तो आने वाले समय में इसके परिणाम क्या होंगे, इसकी कल्पना ही डरा देने के लिए काफी है।

-अमरपाल सिंह वर्मा
यह लेखक के अपने विचार हैं

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