कब खत्म होगा देश में नदियों का प्रदूषण ?
प्रदूषण का दानव
देश में नदियों का प्रदूषण खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। कोई एक नदी ऐसी नहीं है, जिसे शुद्ध और निर्मल नदी के रूप में जाना जाये। जिसे पतितपावनी और मुक्तिदायिनी कहा जाता है और जिसका जल पुण्य का सबब माना जाता है, सबसे पहले देश की उसी पुण्य सलिला, मोक्षदयिनी नदी गंगा को लें। गंगा प्रदूषण मुक्ति हेतु 42,000 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है। इसके अलावा 1985 में गंगा एक्शन प्लान पर शुरुआत में ही 1200 करोड़ की राशि खर्च की गयी। लेकिन गंगा आज अपने मायके उत्तराखंड में ही साफ नहीं है। दावे कुछ भी किये जायें वह आज भी मैली है और उसका जल पुण्य का नहीं, मौत का सबब बन गया है। कैग की रिपोर्ट इसका जीता जागता सबूत है। अब देश की दूसरी प्रमुख नदी यमुना को लें, संसद में दिये आंकड़ों के मुताबिक अभी तक यमुना की सफाई पर पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कुल 5,536 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है जबकि यमुना संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर पहले ही लगभग 1,951 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी थी। इसके अलावा दिल्ली सरकार के ग्रीन बजट के तहत दिल्ली जल बोर्ड को 6485 करोड़ रुपए की राशि दी गयी और अभी हाल फिलहाल में ही दिल्ली सरकार ने यमुना की सफाई के लिए 4500 करोड़ की राशि की मंजूरी दी है लेकिन यमुना गंदगी और दुर्गंध से बजबजा रही है। वह जहरीली है। इसके अलावा देश की और दूसरी नदियों को छोड़ भी दें, केवल गंगा और उसकी सहायक नदियों की बात की जाये, तो उनपर अभीतक 21,340 करोड़ रूपये से ज्यादा की राशि स्वाहा हो चुकी है।
प्रदूषण का दानव :
इतनी भारी-भरकम राशि खर्च करने के बाद भी नदियां आज भी अपने ताड़नहहार की बाट जोह रही हैं कि कौन भगीरथ आयेगा जो उन्हें प्रदूषण के दानव से मुक्ति दिलायेगा? हालत तो इतनी खराब है कि उनका पानी आचमन की बात तो दीगर है, वह सीवेज और कारखानों के रासायनिक अपशिष्ट से इतना विषैला है कि प्राणी मात्र और जलजीवों की सेहत के लिए भी जानलेवा साबित हो रहा है।
विडम्बना देखिए कि इस बाबत देश की सुप्रीम अदालत नौ साल पहले ही आदेश दे चुकी है कि नदियों में शोधन के बगैर सीवेज न बहाया जाये। लेकिन दुखद यह है कि इसके बावजूद न राज्य सरकारों पर इसका कोई असर पड़ा और न ही सीवेज निस्तारण करने वाली एजेंसियों पर कि वह इस मामले पर कारगर कदम उठातीं। उसका नतीजा यह है कि नदियों का प्रदूषण लोगों को जानलेवा बीमारियों की सौगात देकर उन्हें मौत के मुंह में ढकेल रहा है। देखा जाये तो देश में रोजाना लगभग 73,000 मिलियन लीटर, एम एल डी सीवेज उत्पन्न होता है। इसमें से केवल 28 फीसदी हिस्से का ही शोधन हो पाता है। बाकी लगभग 72 फीसदी यानी 52,000 मिलियन लीटर से ज्यादा अनुपचारित सीवेज का गंदा पानी सीधे-सीधे देश की नदियों और दूसरे जलस्रोतों में गिर रहा है। यदि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट की मानें तो देश के विभिन्न राज्यों में लगभग 296 प्रदूषित नदी खंड चिन्हित किये गये हैं जिसका मुख्य कारण उनमें गिरने वाला बिना शोधित किया हुआ सीवेज है। यदि सी एस ई की एक रिपोर्ट को मानें तो देश की लगभग चार सौ से भी अधिक नदियां ऐसी हैं जो प्रदूषित हैं और उसका सबसे बड़ा कारण अनुपचारित सीवेज का उनमें लगातार गिरना है। देश में नदियों में सीवेज गिराये जाने के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है जहां हजारों की तादाद में नाले सीवेज का गंदा पानी सीधे-सीधे नदियों में गिरा रहे हैं। यहां बिना शोधन के गंगा, यमुना, वरुणा, रोहिणी, पांडु, ईशन, सई, घाघरा, काली, गोमती, रामगंगा, कोसी, राप्ती, तमसा, सरयू, नीमा, बीटा, सेंगर, अरिंद, सरायन, करवन, काक, उल्ल जैसी नदियों में सीवेज का गंदा विषैला पानी 1385 गंदे नालों के जरिये बहाये जाने के मामले में बीते बरसों से बेतहाशा बढ़ोतरी देखी गयी है।
नदियों की यह दुर्दशा :
यह हालत तब है जबकि 2017 में ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पारित किया था कि बगैर शोधित किये सीवेज का गंदा पानी नदियों में प्रवाहित न किया जाये। उस समय तो केवल 1230 नाले ही सीवेज का गंदा पानी बिना शोधन के नदियों में बहा रहे थे। नदियों के प्रदूषण का आलम यह है कि उनका पानी कई जानलेवा बीमारियों का सबब बन रहा है। नदिया का जल सीसा, पारा, आर्सैनिक और कैडमियम जैसी विषैली धातुओं व कारखानों के विषाक्त रासायनिक अपशिष्ट लीवर के संक्रमण, आंत में सूजन, तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क, गुर्दे, फेफडो़ं के कैंसर, त्वचा , फाइब्रेसिस, लिवर सिरोसिस, लेप्टोस्पाइरोसिस, सार्कोप्टेस एलर्जी के घुन के लिए प्रजनन स्थल प्रदान करने के साथ साथ हैजा, पीलिया, किडनी, डर्मेटाइटिस और हड्डियों व प्रजनन सम्बंधी जानलेवा रोग के कारण बन रहे हैं। सबसे बड़ा दुख इस बात का है कि नदियों की यह दुर्दशा उस धर्मभीरू देश में है जहां नदियों की मां की तरह पूजा की जाती है, जिनके किनारे सभ्यताओं और संस्कृतियों ने जन्म लिया है, उनके किनारे कुंभ जैसे विशालकाय मेले लगते हैं जिनमें करोड़ों-करोड़ की तादाद में धर्मप्राण जनता स्नान कर खुद को धन्य मानती है।
-ज्ञानेन्द्र रावत
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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