जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, देश  होता है सशक्त

प्रयासों की आवश्यकता 

जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, देश  होता है सशक्त

भारत आज एक ऐसे परिवर्तनकाल से गुजर रहा है, जहां नारी शक्ति केवल सामाजिक विमर्श का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की सक्रिय धुरी बनती जा रही है।

भारत आज एक ऐसे परिवर्तनकाल से गुजर रहा है, जहां नारी शक्ति केवल सामाजिक विमर्श का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की सक्रिय धुरी बनती जा रही है। शिक्षा, रोजगार, उद्यमिता और वित्तीय क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा और दिशा दी है। परंपरागत सीमाओं को तोड़ते हुए महिलाएं अब घर की चौखट से निकलकर बाजार, कार्यस्थल और नेतृत्व के मंचों तक अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। यह बदलाव केवल आय वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सामाजिक संरचनाएं मजबूत हो रही हैं, पारिवारिक निर्णय अधिक संतुलित बन रहे हैं और विकास अधिक समावेशी स्वरूप ग्रहण कर रहा है। यही नारी भागीदारी भारत के उज्ज्वल भविष्य की ठोस आधारशिला है।

अर्थव्यवस्था को मजबूती :

जैसे जैसे महिलाएं आर्थिक विकास में सक्रिय योगदानकर्ता बन रही हैं, वे न केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रही हैं, बल्कि भारतीय समाज की बुनियादी संरचना को भी नया आकार दे रही हैं। इस व्यापक परिवर्तन का सबसे स्पष्ट रूप महिलाओं की श्रम बाजार में बढ़ती भागीदारी के रूप में दिखाई देता है। परंपरागत रूप से भारत में महिलाओं का काम मुख्यतः घरेलू और अवैतनिक श्रम तक सीमित रहा है या फिर असंगठित क्षेत्र में, जहां सुरक्षा और पहचान का अभाव था। लेकिन हाल के वर्षों में महिला श्रम भागीदारी दर में धीरे धीरे किंतु निरंतर वृद्धि देखने को मिली है। इस वृद्धि के पीछे बेहतर शिक्षा की उपलब्धता, कौशल विकास कार्यक्रम, शहरीकरण और सेवा तथा ज्ञान आधारित उद्योगों का विस्तार जैसे कई कारण हैं।

गतिविधियों में विविधता :

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आज महिलाएं सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, बैंकिंग, खुदरा व्यापार और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में न केवल कर्मचारी के रूप में बल्कि उद्यमी के रूप में भी योगदान दे रही हैं। कार्यबल में उनकी बढ़ती उपस्थिति ने आर्थिक गतिविधियों में विविधता लाई है और उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र इस बदलाव का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है। बैंकिंग में महिलाओं की भागीदारी ग्राहकों और पेशेवरों, दोनों रूपों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। बैंक खाताधारकों में महिलाओं का प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है, जो महिलाओं को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने वाले वित्तीय समावेशन कार्यक्रमों की सफलता को दर्शाता है। बैंक खाते होने से महिलाओं को स्वतंत्र रूप से बचत करने, सीधे सरकारी लाभ प्राप्त करने, छोटे व्यवसायों में निवेश करने और घरेलू वित्त को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित करने की शक्ति मिली है।

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क्षमता को दर्शाती है :

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वित्तीय साक्षरता अभियानों ने महिलाओं की आर्थिक समझ को और मजबूत किया है, जिससे वे आत्मविश्वास के साथ विवेकपूर्ण आर्थिक निर्णय ले पा रही हैं और उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ी है। पूंजी बाजारों में महिलाओं की भागीदारी भी आर्थिक सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। बीते कुछ वर्षों में शेयर बाजार में निवेश करने वाली महिलाओं की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है। यह बदलाव पारंपरिक बचत साधनों जैसे सोना या सावधि जमा से आगे बढ़कर विविध वित्तीय परिसंपत्तियों में निवेश की ओर संकेत करता है। इक्विटी बाजारों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी बढ़ती वित्तीय जागरूकता, अधिक उपलब्ध आय और सोच समझकर जोखिम उठाने की क्षमता को दर्शाती है।

नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में :

नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी भी इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पहलू है। हालांकि प्रबंधकीय और नेतृत्व पदों पर महिलाओं की संख्या अभी अपेक्षित स्तर से कम है, फिर भी इसमें उत्साहजनक वृद्धि देखी जा रही है। महिलाएं कॉर्पोरेट बोर्डरूम,सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों, स्टार्टअप्स और नागरिक समाज संगठनों में जिम्मेदारीपूर्ण पदों पर पहुंच रही हैं। महिला नेतृत्व से दृष्टिकोणों में विविधता आती है, शासन व्यवस्था में सुधार होता है और निर्णय प्रक्रियाएं अधिक समावेशी बनती हैं। विश्व भर के अध्ययन बताते हैं कि जिन संगठनों में नेतृत्व स्तर पर लैंगिक विविधता अधिक होती है, वे आर्थिक रूप से बेहतर प्रदर्शन करते हैं और नैतिक मानकों के प्रति अधिक प्रतिबद्ध होते हैं।

चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं :

इन सकारात्मक प्रवृत्तियों के बावजूद चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। भारत में महिला श्रम भागीदारी दर में सुधार तो हुआ है, लेकिन यह अभी भी वैश्विक औसत से कम है। सांस्कृतिक मान्यताएं, अवैतनिक देखभाल कार्य का बोझ, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और गुणवत्तापूर्ण शिशु देखभाल सुविधाओं की कमी आज भी कई महिलाओं को सशुल्क रोजगार से दूर रखती हैं। घरेलू कार्यों का असमान बोझ महिलाओं पर अधिक होने से उनके पास आर्थिक गतिविधियों के लिए समय और ऊर्जा सीमित रह जाती है।

प्रयासों की आवश्यकता :

इन चुनौतियों से निपटने के लिए केवल नीतिगत हस्तक्षेप ही नहीं, बल्कि लैंगिक भूमिकाओं को लेकर समाज की सोच में गहरा बदलाव भी आवश्यक है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक है। यद्यपि प्रगति स्पष्ट है, फिर भी स्थायी प्रयासों की आवश्यकता है ताकि शेष बाधाओं को दूर किया जा सके और विकास को वास्तव में समावेशी बनाया जा सके।

-ममता कुशवाहा
यह लेखक के अपने विचार हैं। 

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