मोलैला से खजुराहो तक की कलात्मक यात्रा, डॉ. चन्द्रशेखर सेन ने टेराकोटा मिरर आर्ट में रचा अनोखा संसार
भारतीय पारंपरिक शिल्प और समकालीन कला का अद्भुत संगम प्रस्तुत
वरिष्ठ टेराकोटा एवं विज़ुअल आर्टिस्ट डॉ चंद्रशेखर सेन ने अपनी नवीन टेराकोटा मिरर आर्टवर्क के माध्यम से भारतीय पारंपरिक शिल्प और समकालीन कला का अद्भुत संगम प्रस्तुत। यह विशेष कलाकृति राजस्थान की प्रसिद्ध मोलैला टेराकोटा परंपरा और खजुराहो की मूर्ति-शिल्प शैली से प्रेरित।
जयपुर। वरिष्ठ टेराकोटा एवं विज़ुअल आर्टिस्ट डॉ चंद्रशेखर सेन ने अपनी नवीन “टेराकोटा मिरर आर्टवर्क” के माध्यम से भारतीय पारंपरिक शिल्प और समकालीन कला का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया है। यह विशेष कलाकृति राजस्थान की प्रसिद्ध मोलैला टेराकोटा परंपरा और खजुराहो की मूर्ति-शिल्प शैली से प्रेरित है। इस अनूठे सर्कुलर मिरर कॉम्पोज़िशन में 150 से अधिक टेराकोटा फिगर्स को बेहद सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है। कलाकृति की आकृतियाँ दर्शकों को ऐसे दृश्य संसार में ले जाती हैं, जहाँ वे किसी अन्य लोक में तैरती हुई प्रतीत होती हैं। इसमें खजुराहो शिल्प की भाव-भंगिमाएँ, ऊर्जा और जीवंतता को आधुनिक कलात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया गया है। डॉ. सेन का यह कार्य पूरी तरह 100 प्रतिशत प्राकृतिक टेराकोटा से निर्मित है।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इस कला में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे अपनी कला प्रक्रिया में ऐसे माध्यम और तकनीकों का उपयोग करते हैं, जो प्रकृति को किसी प्रकार का नुकसान न पहुँचाएँ। यह कलाकृति केवल एक सजावटी मिरर वर्क नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा, मिथक, स्मृति और आधुनिक संवेदनाओं के बीच संवाद स्थापित करने वाला सशक्त कलात्मक प्रयोग है। यह दर्शाती है कि टेराकोटा जैसे पारंपरिक माध्यम में भी समकालीन कला के नए आयाम विकसित किए जा सकते हैं। डॉ. चन्द्रशेखर सेन की यह रचना भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों, शिल्प की शक्ति और आधुनिक कला की प्रयोगशीलता को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है।

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