गर्मियों में बढ़ी मनरेगा की मांग, बजट तुलना में कार्य स्वीकृति की कमी ने सरकार की बढ़ाई चिंता
राज्य सरकार नई रणनीति कर रही तैयार
राजस्थान में भीषण गर्मी के बीच मनरेगा में ग्रामीणों की काम की मांग बढ़ी, बजट और कार्य स्वीकृति कम होने से चुनौती सामने। सरकार अतिरिक्त श्रम बजट, नए कार्य और लंबित भुगतान पर ध्यान दे रही। जल संरक्षण, सड़क मरम्मत, तालाब गहरीकरण व पौधरोपण को प्राथमिकता दी जा रही।
जयपुर। प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाली मनरेगा में काम की मांग लगातार बनी हुई है, लेकिन पिछले साल की तुलना में बजट और कार्य स्वीकृति में कमी ने राज्य सरकार और केन्द्र दोनों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
राजस्थान में मनरेगा के तहत बढ़ती रोजगार मांग और ग्रामीण क्षेत्रों में कामों की संख्या को देखते हुए राज्य सरकार आने वाले महीनों के लिए नई रणनीति तैयार कर रही है। भीषण गर्मी, सूखे की आशंका और खेती में कम रोजगार के कारण ग्रामीण इलाकों में मनरेगा पर निर्भरता बढ़ी है। ऐसे में सरकार का फोकस अब अतिरिक्त श्रम बजट, नए कार्यों की स्वीकृति और लंबित भुगतान निपटाने पर है। राज्य सरकार केन्द्र से अतिरिक्त मानव दिवस और बजट स्वीकृति मांगने की तैयारी में है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में कई जिलों ने स्वीकृत श्रम बजट का बड़ा हिस्सा शुरुआती महीनों में ही खर्च कर लिया है। खासकर बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और करौली जैसे जिलों में लगातार नई मांगें दर्ज हो रही हैं। ऐसे में सरकार पंचायतों से वास्तविक मांग के आधार पर संशोधित प्रस्ताव मंगवा रही है।
चुनौतियों से निपटने के लिए बन रही यह रणनीति :
ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण, तालाब गहरीकरण, एनीकट निर्माण, चारागाह विकास, वर्षा जल संग्रहण, ग्रामीण सड़क मरम्मत और पौधरोपण कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है। आगामी मानसून को देखते हुए कैच द रेन अभियान से जुड़े कार्यों को भी मनरेगा से जोड़ने की तैयारी है। तकनीकी स्वीकृतियों की प्रक्रिया सरल करने पर विचार चल रहा है।
गर्मी के मौसम में बढ़ती काम की मांग के मुकाबले बजट आवंटन और भुगतान की गति अब भी चुनौती बनी हुई है। केंद्र सरकार ने हाल ही में राजस्थान के लंबित सामग्री मद भुगतान के लिए 827.86 करोड़ रुपए की नई किश्त जारी की है। इसके साथ राज्य सरकार की हिस्सेदारी जोड़कर अब तक 1103.82 करोड़ रुपए उपलब्ध कराए जा चुके हैं। इसके बावजूद कई जिलों में सामग्री मद और मजदूरी भुगतान लंबित बताए जा रहे हैं।

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