जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 : लेखिका शोभा डे ने मीडिया से बातचीत, कहा- सुरक्षित कार्यस्थल और संवेदनशीलता के मामले में अमेरिका जैसे देश भी भारत से पीछे

महिलाएं जागरूक होकर उन्हें अपने जीवन में करें लागू 

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 : लेखिका शोभा डे ने मीडिया से बातचीत, कहा- सुरक्षित कार्यस्थल और संवेदनशीलता के मामले में अमेरिका जैसे देश भी भारत से पीछे

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लेखिका शोभा डे ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि स्त्री को अपने अधिकार, इच्छाएं और संवेदनशीलता खुद पहचाननी होगी। क्योंकि कोई भी समाज या व्यवस्था यह अधिकार सहज रूप से नहीं देती।

जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लेखिका शोभा डे ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि स्त्री को अपने अधिकार, इच्छाएं और संवेदनशीलता खुद पहचाननी होगी। क्योंकि कोई भी समाज या व्यवस्था यह अधिकार सहज रूप से नहीं देती। उन्होंने कहा कि दुनिया के लगभग हर समाज में महिलाओं को सम्मान और समानता के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक संघर्ष करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त शोभा डे ने फ्रंट लॉन में आयोजित सत्र के दौरान भी अपनी किताब 'द सेंसुअल सेल्फ' को लेकर अनीश गवांडे के साथ चर्चा की। 

महिलाओं की प्रगति, संघर्ष अब भी जारी
मीडिया से बातचीत के दौरान शोभा डे ने माना कि भारत में पिछले कुछ दशकों में महिलाओं के लिए अवसर बढ़े हैं। आज महिलाएं फाइटर पायलट से लेकर शीर्ष नेतृत्व की भूमिकाओं तक पहुंच रही हैं, जो सामाजिक बदलाव का सकारात्मक संकेत है। उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षित और संवेदनशील कार्यस्थल के मामले में अमेरिका जैसे विकसित देश भी कई मायनों में भारत से पीछे है। 

महिलाएं जागरूक होकर उन्हें अपने जीवन में करें लागू 
शोभा डे ने कहा कि कानूनी अधिकार तभी सार्थक होते हैं, जब महिलाएं स्वयं जागरूक होकर उन्हें अपने जीवन में लागू करें। इसके लिए शिक्षा, आत्मबोध और अपने शरीर व भावनाओं के प्रति ईमानदारी बेहद जरूरी है। अपनी पुस्तक के संदर्भ में उन्होंने बताया कि 'द सेंसुअल सेल्फ' उनकी अपनी अनुभूतियों, सवालों और इच्छाओं को समझने की आजीवन यात्रा का परिणाम है। उन्होंने कहा कि 20 वर्ष की उम्र हो या 70 की, प्रेम, स्नेह और स्पर्श की चाह पूरी तरह मानवीय है। उम्र के साथ संवेदनशीलता खत्म नहीं होती, उसका स्वरूप बदलता है।  शोभा डे ने समाज पर टिप्पणी करते हुए कहा कि महिलाओं पर लंबे समय से 'अच्छी लड़की' होने का नैतिक दबाव डाला जाता रहा है। परिणामस्वरूप उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने प्रेम, रिश्तों और शारीरिक अनुभवों पर चुप्पी साधे रखें। उन्होंने सवाल उठाया कि एक स्त्री कब तक अपने भीतर के सच को दबाती रहेगी। अब समय है कि वह शर्म और संकोच से बाहर आकर अपनी भावनाओं को समझे और व्यक्त करे।  

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