कैनवास पर उभरी कल्पना की उड़ान, ज्योति स्वरूप की कृतियां बनीं आरआईसी की शान

स्याही और जल रंग माध्यम में कागज पर बनाई

कैनवास पर उभरी कल्पना की उड़ान, ज्योति स्वरूप की कृतियां बनीं आरआईसी की शान
राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित ‘लेजेंडरी मास्टर ऑफ इंडियन आर्ट’ प्रदर्शनी में प्रख्यात कलाकार ज्योति स्वरूप की 1962 और 1964 की दो प्रारंभिक अनाम कलाकृतियां आकर्षण का केंद्र बनी। स्याही और जलरंग से बनी रचनाओं में रेखा, रंग, आकृति और अमूर्त संरचनाओं की विशिष्ट शैली नजर आती है।

जयपुर। राजस्थान के आधुनिक कला परिदृश्य को नई दिशा देने वाले प्रख्यात कलाकार ज्योति स्वरूप (1939-2009) की दो प्रारंभिक कलाकृतियां इन दिनों राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में आयोजित "लेजेंडरी मास्टर ऑफ इंडियन आर्ट" प्रदर्शनी में कला-प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। प्रदर्शनी में ज्योति स्वरूप की उन्नीस सौ बासठ और उन्नीस सौ चौंसठ में निर्मित दो अनाम कलाकृतियां प्रदर्शित हैं, जो स्याही और जल रंग माध्यम में कागज पर बनाई गई हैं। दोनों रचनाओं में ज्योति स्वरूप की उस विशिष्ट कलाभाषा की झलक मिलती है, जिसके जरिए उन्होंने पारंपरिक चित्रण से हटकर रेखा, रंग, आकृति और अमूर्त संरचनाओं के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति विकसित की। पहली कृति में गहरे भूरे और मद्धिम रंगों के बीच उभरती जैविक आकृति दर्शकों का ध्यान खींचती है, वहीं दूसरी कृति में रेखाओं और ज्यामितीय संरचनाओं का जटिल संयोजन दिखाई देता है। यह दोनों कृतियां कलाकार के शुरुआती रचनात्मक दौर की हैं, जिनमें आगे चलकर राजस्थान में आधुनिक और अमूर्त कला की अलग पहचान बनाने वाले कलाकार की खोज साफ झलकती है।

स्व-शिक्षित ज्योति स्वरूप ने पारंपरिक लोक और लघु चित्रकला के प्रभाव वाले माहौल में अपनी स्वतंत्र शैली विकसित की और कला को अंतर्मन तथा कल्पना से जोड़ा। यह प्रदर्शनी कला-प्रेमियों को उनकी कलात्मक यात्रा को करीब से समझने का दुर्लभ अवसर प्रदान करती है।

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