घुंघरुओं की गूंज में तांडव का तेज : जयपुर घराने का कथक रचता है लय और शक्ति की अद्भुत कहानी, राजस्थानी वीरता, शिव तांडव की ऊर्जा और कृष्ण भक्ति की कोमलता का अनोखा संगम
इतिहास की धड़कनों में बसता है घराना
जयपुर का कथक घराना अपनी दमदार तकनीक, तेज चक्करों और जटिल लयकारी के लिए प्रसिद्ध है। भानुजी महाराज से शुरू हुई यह परंपरा तांडव की ऊर्जा और भक्ति की कोमलता का संगम है। कछवाहा राजाओं के संरक्षण में विकसित इस शैली में ताल, गति और सटीकता का अनोखा मेल देखने को मिलता है।
जयपुर। भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक के प्रमुख घरानों में जयपुर घराना अपनी दमदार तकनीक, तेज रफ्तार चक्करों और जटिल लयकारी के लिए विश्वभर में विशिष्ट पहचान रखता है। यह शैली केवल नृत्य नहीं, बल्कि राजस्थान की वीरता, परंपरा और आध्यात्मिकता का जीवंत प्रतीक है। जहां लखनऊ घराना भाव और नजाकत के लिए प्रसिद्ध है, वहीं जयपुर घराना शक्ति, गति और ताल की गहराई से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करता है।
इतिहास की धड़कनों में बसता है घराना
जयपुर घराने की नींव भानुजी महाराज ने रखी, जिन्हें शिव तांडव का सिद्धहस्त कलाकार माना जाता है। उनके वंशजों में मालूजी, लालूजी और कन्हूजी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वृंदावन से नटवरी नृत्य की प्रेरणा ली। इस समागम ने तांडव की ऊर्जा और कृष्ण भक्ति की कोमलता को एक सूत्र में पिरो दिया। कछवाहा राजाओं के संरक्षण में 18वीं-19वीं शताब्दी में यह घराना अपने उत्कर्ष पर पहुंचा।
हनुमान प्रसाद और हरिप्रसाद जैसे नर्तकों ने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, जिनकी परंपरा आज भी जीवंत है। धमार, चौताल और रुद्रताल जैसे कठिन तालों में दक्षता इस शैली को विशेष बनाती है। तेज चक्कर, जटिल तोड़े-टुकड़े और पखावज की गूंज पर आधारित परन इस नृत्य को ऊर्जा और प्रभाव से भर देते हैं। यहां अभिनय से अधिक तकनीकी सटीकता और गति पर जोर दिया जाता है। घुंघरुओं की हर थिरकन ताल के साथ इतनी सटीक होती है कि दर्शक अनायास ही इस कला में खो जाते हैं।
कलाकारों की परंपरा और आधुनिक विस्तार
पंडित सुंदर प्रसाद, कुंदन लाल गंगानी और पंडित राजेंद्र गंगानी जैसे कलाकारों ने इस घराने को वैश्विक पहचान दिलाई है। आज भी जयपुर कथक केंद्र जैसी संस्थाएं वर्कशॉप और समर कैंप के माध्यम से बच्चों से लेकर वरिष्ठ आयु वर्ग तक को यह कला को सिखा रही हैं।
इनका कहना है...
जयपुर कथक केंद्र में विद्यार्थियों को कथक नृत्य की सूक्ष्म बारीकियों का गहन और व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया जाता है। विशेष रूप से जयपुर घराने की पारंपरिक शैली, उसकी विशिष्ट गतियों और ठाठ को संरक्षित रखते हुए विद्यार्थियों को प्रामाणिक रूप से सिखाया जाता है।
-श्रुति शुक्ला (सचिव, जयपुर कथक केन्द्र)
नृत्य, नाटक का अभिन्न अंग है। यह कलाकार को अनुशासन, लचीलापन, स्मरणशक्ति और एकाग्रता प्रदान करता है। नृत्य से शारीरिक संतुलन, स्टैमिना, लय-ताल की समझ बढ़ती है तथा प्रस्तुति प्रभावी बनती है। साथ ही यह तनावमुक्त कर कलाकार को सशक्त अभिव्यक्ति में सक्षम बनाता है।
-प्रदीप सोलंकी (डांसर व थिएटर आर्टिस्ट)

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