जोधपुर में भ्रूण लिंग जांच का भंडाफोड़, पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन से चल रहा था अवैध कारोबार
हैंडहेल्ड पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड प्रोब और 50 हजार रुपए नकद जब्त
जोधपुर। भ्रूण लिंग जांच का अवैध कारोबार अब पहले जैसा नहीं रहा। भारी-भरकम सोनोग्राफी मशीनों और बड़े डायग्नोस्टिक सेंटरों की जगह अब हथेली में समाने वाले पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड प्रोब और मोबाइल एप का इस्तेमाल होने लगा है। जोधपुर में पीसीपीएनडीटी सेल की ताजा कार्रवाई ने इसी बदलते अपराध के तौर-तरीकों का खुलासा किया है। बनाड़ थाना क्षेत्र स्थित श्री सागर नसिंर्ग होम पर पीसीपीएनडीटी सेल की दबिश में संचालक ओम प्रकाश चौधरी को कथित रूप से अवैध भ्रूण लिंग परीक्षण करते हुए गिरफ्तार किया गया। कार्रवाई में हैंडहेल्ड पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड प्रोब, मोबाइल फोन, 50 हजार रुपए नकद और एक गर्भवती महिला मिली। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि लिंग परीक्षण के बदले 50 हजार रुपए लिए गए थे। पुलिस और पीसीपीएनडीटी सेल ने नकदी जब्त कर ली है। सूत्रों के अनुसार, संबंधित नसिंर्ग होम के खिलाफ लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं। गुप्त सूचना मिलने पर जिला प्रशासन को अवगत कराया गया। कलक्टर के निर्देश पर सीएमएचओ डॉ. सुरेंद्र सिंह शेखावत के नेतृत्व में पीसीपीएनडीटी सेल ने योजनाबद्ध डिकॉय ऑपरेशन तैयार किया। टीम ने पूरी निगरानी के बाद उस समय दबिश दी, जब आरोपी कथित रूप से पोर्टेबल मशीन से जांच कर रहा था। मौके से उपकरण, मोबाइल, नकदी और अन्य साक्ष्य जब्त किए गए।
बदल गया अपराध का तरीका
कार्रवाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल गिरफ्तारी नहीं, बल्कि अपराध का बदलता स्वरूप है। जांच में सामने आया कि आरोपी पारंपरिक सोनोग्राफी मशीन का उपयोग नहीं कर रहा था। वह एक पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड प्रोब को मोबाइल फोन से जोड़कर जांच करता था। मोबाइल पर चलने वाला एप ही स्क्रीन का काम करता था, जिस पर भ्रूण की तस्वीरें दिखाई देती थीं। यानी पूरी सोनोग्राफी प्रणाली अब एक छोटे उपकरण और मोबाइल फोन तक सिमट गई है। इससे ऐसे उपकरणों को आसानी से छिपाया और एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है। यही कारण है कि जांच एजेंसियों के सामने निगरानी की नई चुनौती खड़ी हो रही है।
तकनीक ने बढ़ाई निगरानी की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड उपकरणों के बढ़ते उपयोग ने पीसीपीएनडीटी कानून के क्रियान्वयन को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। जहां स्थायी अल्ट्रासाउंड केंद्रों की निगरानी अपेक्षाकृत आसान होती है, वहीं छोटे और आसानी से ले जाए जा सकने वाले उपकरणों का दुरुपयोग रोकना अधिक कठिन हो सकता है। ऐसे मामलों में खुफिया सूचना और योजनाबद्ध डिकॉय ऑपरेशन ही सबसे प्रभावी माध्यम बनते हैं।

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