ग्राउंड रिपोर्ट: क्या हादसाें के बाद ही जागने की रीत कभी तोड़ी जाएगी

बिना शुद्धता जांचे धड़ल्ले से टैंकरों से पानी की सप्लाई

ग्राउंड रिपोर्ट: क्या हादसाें के बाद ही जागने की रीत कभी तोड़ी जाएगी
बिना जांच 'अवैध टैंकरों' से सप्लाई हो रहा हजारों लीटर पानी,नई कॉलोनियों में मंडराया संकट।

कोटा। सरकारी स्तर पर संकट से निपटने के लिए कोटा शहर में 12 हाइड्रेंट/बोरिंग पॉइंट्स अनुबंधित (पूरी तरह टेस्टेड) किए गए हैं। इसी तरह रामगंजमंडी में 16 कुएं और सांगोद में 3 से 4 ट्यूबवेल रिजर्व रखे गए हैं, जहां से पूरी तरह जांचा हुआ पानी ही टैंकरों में भरा जाता है।
शिक्षा नगरी कोटा में भीषण गर्मी के बीच एक बड़ा जल-संकट और छात्र-छात्राओं के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। एक तरफ जहां जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) की कोटा लैब सरकारी स्तर पर लक्ष्य से आगे बढ़कर पानी की जांच कर रही है, वहीं दूसरी तरफ शहर के पॉश और घने कोचिंग इलाकों सहित बाहरी कॉलोनियों में अवैध और बिना जांचे पानी के टैंकरों का धंधा धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। रोजाना हजारों छात्र और स्थानीय नागरिक इस अनियंत्रित पानी को पीने और इस्तेमाल करने को मजबूर हैं, जिससे किसी बड़ी महामारी के फैलने का अंदेशा पैदा हो गया है।

जवाहर नगर हादसे' की याद हुई ताजा
शहर में पानी की मॉनिटरिंग को लेकर बरती जा रही यह लापरवाही सीधे तौर पर मासूमों की जान से खिलवाड़ है। विज्ञान नगर इलाके में दुषित पानी की सप्लाई के बाद वर्तमान स्थिति को देखकर कुछ साल पहले जवाहर नगर क्षेत्र में एक साथ फैली उस महामारी की याद ताजा हो जाती है, जब दूषित पानी की समस्या के चलते 70 से अधिक कोचिंग छात्रों को गंभीर हालत में अस्पतालों में भर्ती करवाना पड़ा था।
-मनू सोलंकी निवासी जवाहर नगर

निजी वाटर सप्लाई पर नहीं है कोई निगरानी
उस बड़े हादसे के बाद भी प्रशासन की नींद नहीं टूटी है। आज भी स्थिति यह है कि केवल कच्ची बस्तियां ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े कोचिंग इलाकों और हॉस्टल्स में भी पानी की मॉनिटरिंग या उसकी नियमित जांच करवाने की कोई कानूनी बाध्यता तय नहीं की गई है। आखिर पानी जैसी बेहद बुनियादी लेकिन सबसे जरूरी चीज के लिए कोटा में एक 'प्रोपर और जिम्मेदार' सिस्टम आज तक क्यों नहीं बन पाया?
-सीता प्रजापित निवासी कोरल पार्क

बिना जांच सीधे पेट तक पहुंच रहा पानी
आवासीय और कोचिंग जैसे बेहद संवेदनशील इलाकों में बिना किसी केमिकल या बैक्टीरियोलॉजिकल टेस्ट के पानी की लगातार सप्लाई हो रही है, लेकिन इन टैंकरों पर विभाग की कोई मॉनिटरिंग नहीं है। यह पानी बस्ती वासियों के रोजमर्रा के काम से लेकर उनके पेट तक पहुंच रहा है। सबसे बड़ी लापरवाही यह है कि न तो चिकित्सा विभाग (CMHO) के पास और न ही जलदाय विभाग के पास इन हॉस्टल्स और निजी स्रोतों की पूरी स्क्रीनिंग का कोई डेटा उपलब्ध है।

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हॉस्टल्स और घनी आबादी 'टैंकर माफिया' के भरोसे
जिन क्षेत्रों में जलदाय विभाग की सीधी पाइपलाइन नहीं है, वहां निजी स्रोतों के नाम पर टैंकर माफियाओं का राज चल रहा है। शहर के सबसे संवेदनशील और वीआईपी माने जाने वाले कोचिंग हब इस समय पूरी तरह निजी टैंकरों के जाल में हैं। कोरल पार्क और लैंडमार्क सिटी जैसे अत्यधिक घनी आबादी वाले हॉस्टल क्षेत्रों में हजारों कोचिंग छात्र रह रहे हैं। यहां रोजाना बिना किसी शुद्धता जांच के धड़ल्ले से टैंकरों से पानी की सप्लाई की जा रही है।

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आवासीय बस्तियों व निजी कॉलोनियों मेेें बडा खेल
नयागांव, आंवली, रोजड़ी, नांता के करणी नगर,बरड़ा, अनन्तपुरा के भीतरी इलाके,क्रेशर बस्ती, बृज धाम, मान सरोवर, प्रताप नगर पुनम कॉलोनी, श्री विहार, रायपुर की कॉलोनियां, रेलवे स्टेशन क्षेत्र, बूंदी रोड और बालिता की कॉलोनियां पूरी तरह इन निजी टैंकरों के भरोसे चल रही हैं। यहां निजी काॅलोनियां ताे विकसीत हो गयी लेकिन पानी जैसी बुनियादि जरूरत के लिये या तो घर के भीतर बने बोरिंग या फिर महंगे बोरिग सप्लाई के साथ टेन्करों की सप्लाई पर निर्भर है। यही नही इनके बदले पानी के इन सौदागरों की मोटी कमाई भी बडी है।

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पीएचईडी लाचार, गेंद सीएमएचओ के पाले में
पीएचईडी के सीनियर केमिस्ट तरुण कुमार जैन ने बताया कि विभाग निजी स्रोतों और टैंकरों के पानी की जांच के लिए मात्र 297:रूपये की नॉमिनल फीस लेता है, जिसमें 48 घंटे में बैक्टीरियोलॉजिकल और केमिकल टेस्ट की रिपोर्ट आ जाती है। लेकिन सबसे बड़ा पेंच नियमों का है PHED लैब के पास प्राइवेट ट्यूबवेल या अवैध रूप से चल रहे टैंकर्स पर सीधे कानूनी कार्रवाई या जब्ती का अधिकार नहीं है। यदि पानी दूषित भी पाया जाता है, तो उस पर सीधे कार्रवाई करने का अधिकार केवल मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) के पास होता है। ऐसे में दोनों विभागों के बीच तालमेल की कमी का फायदा टैंकर संचालक उठा रहे हैं।

हर 6 महीने में जांच है जरूरी
जलदाय विभाग के जानकारों के अनुसार, आमतौर पर लोग एक बार पानी की जांच करवाकर निश्चिंत हो जाते हैं, लेकिन पानी की शुद्धता बनाए रखने के लिए हर 6 महीने में दोबारा जांच करवानी चाहिए। विशेषकर प्री-मानसून (बारिश से पहले) और पोस्ट-मानसून (बारिश के बाद) जांच अनिवार्य है, क्योंकि बारिश के दिनों में भूजल में खतरनाक बैक्टीरिया पनपने की संभावना सबसे ज्यादा होती है।

यह है कोटा में पानी की कहानी
कोटा शहर में चंबल नदी से पानी लिफ्ट कर सकतपुर (130 व 70 MLD), अकेलगढ़ (64 MLD की 3 और 75 MLD की 1 यूनिट) तथा श्रीनाथपुरम (50 MLD) प्लांट्स से शुद्ध पानी सप्लाई किया जा रहा है। हमारे पास पानी की पयार्प्त व्यवस्था है। जहां कमी हो वहां टैंकर भेजते हैं।
-दीपक झा, अतिरिक्त मुख्य अभियन्ता पीएचईडी

यदि आपके क्षेत्र में नल से बदबूदार या गंदा पानी आ रहा है, तो बीमारी फैलने का इंतजार न करे। तुरंत संबंधित अधिकारीयों को सूचित करें। निजी स्रोतों का उपयोग करने वाले नागरिक बीमारी को न्योता न दें और नजदीकी पीएचईडी लैब में अपने पानी के सैंपल की जांच अवश्य करवाएं।
-तरूण कुमार जैन ,सीनीयर केमिस्ट पीएचईडी

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