संस्कृति, संवाद और संस्कारों की जीवंत पाठशाला है रामलीला मंचन, दशहरा मैदान में राघवेन्द्र कला संस्थान कर रहा रामलीला का मंचन
निर्देशक बृजराज गौतम ने रावण से लेकर दशरथ तक निभाए यादगार किरदार
कलाकारों के जीवंत अभिनय से लोगों को मिल रही संस्कृति से जुड़ने की सीख।
कोटा। भारतीय संस्कृति और परंपरा की आत्मा यदि कहीं सजीव होकर प्रकट होती है तो वह है रामलीला मंचन। यह केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं, बल्कि समाज को संस्कार, मयार्दा और जीवन मूल्यों से जोड़ने वाला सशक्त माध्यम है। रामलीला मंचन की दुनिया में निर्देशक बृजराज गौतम का नाम एक जाना-पहचाना चेहरा है। उन्होंने बताया कि वे पिछले 40 साल से निर्देशन कर रहे है जिसमें उन्होंने रामलीला में नारद, रावण और दशरथ जैसे अहम किरदार निभाए हैं। खासतौर पर रावण का किरदार उन्होंने लगातार 35 वर्षों तक किया है। गौतम मानते हैं कि दशरथ, राम और रावण जैसे रोल दर्शकों की निगाहों का केंद्र होते हैं। वे संवाद लिखते समय हमेशा यही ध्यान रखा कि दर्शकों तक कुरीतियों, व्याभिचार और गंदी आदतों के खिलाफ संदेश पहुंचे। साथ ही नैतिकता और भारतीय संस्कृति का परिचय भी मिले। श्रीराम का किरदार निभा रहे वैभव गौतम ने बताया कि बदलते दौर में जब परिवारों में विघटन, राग-द्वेष और आपसी दूरी बढ़ रही है, तब राघवेंद्र कला संस्थान इन मंचनों के जरिए लोगों को पुन: भारतीयता और परिवारिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य कर रहा है। दैनिक नवज्योति से विशेष बातचीत करते हुए बताया कि इस मंचन के दौरान किस तरह अपने अंदर महानयकों का भाव उतारते है तथा किस तरह से जीवंत कलाकारों के लिए मेहनत करनी पड़ती है। पेश है मुख्य अंश:
24 वर्षों से श्रीराम का अभिनय कर रहे वैभव गौतम
वैभव गौतम का रामलीला से जुड़ाव बचपन से रहा है। तीन वर्ष की उम्र में मंच पर कदम रखने वाले गौतम ने छोटे-राम, लक्ष्मण, वानर और राक्षस जैसे किरदार निभाए। मात्र 11 साल की उम्र में उन्हें भरत की भूमिका मिली और पिछले 24 वर्षों से वे श्रीराम का अभिनय कर रहे हैं। मेडिकल क्षेत्र से जुड़े होने के बावजूद वे राम के सौम्य, धैर्यवान और करुणामयी स्वभाव को मंच पर उतारने के लिए विशेष अभ्यास करते हैं। लक्ष्मण शक्ति प्रसंग में उनके वास्तविक आंसू बहते हैं। उनके अनुसार, राम का अभिनय केवल भूमिका नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन है।
विरंचि दाधीच निभा रहे हनुमान का किरदार
विरंचि दाधीच पिछले चार वर्षों से रामलीला में हनुमान का सशक्त किरदार निभा रहे हैं। मात्र पांच वर्ष की आयु से रामलीला से जुड़ाव होने के बावजूद वे नियमित रूप से सुंदरकांड का पाठ और हनुमान चरित्र से जुड़ी पुस्तकों का अध्ययन करते हैं। राजकीय सेवा में कार्यरत होने के बावजूद हर वर्ष दो माह का समय रामलीला के लिए निकालते हैं। उनका कहना है कि मंच पर हनुमान बनकर सेवा करना उनके लिए गर्व और सौभाग्य की बात है।
ऋषिराज गौतम 8 साल से लक्ष्मण का किरदार कर रहे है
राघवेंद्र कला संस्थान से करीब 30 वर्षों से जुड़े ऋषिराज गौतम अपने पिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। वे पिछले 8 साल से रामलीला में लक्ष्मण का किरदार निभा रहे हैं। चरित्र की भक्ति और संयम बनाए रखने के लिए नौ दिन लहसुन-प्याज का सेवन नहीं करते और योगा व जिम से फिट रहते हैं। उनके बच्चे भी रामलीला में अभिनय कर चुके हैं।
40 साल से रामलीला में बृजराज गौतम
निर्देशक और कलाकार बृजराज गौतम पिछले 40 वर्षों से रामलीला में नारद, रावण और दशरथ जैसे किरदार निभा रहे हैं। उनका मानना है कि रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज सुधार और नैतिक मूल्यों का संदेश है। गौतम के अनुसार दशरथ का जीवन आदर्श है—उन्होंने प्रेम के बावजूद राम को गुरुकुल और विश्वामित्र के पास भेजा तथा वचन पालन के लिए अपना सुख त्याग दिया। वे कहते हैं कि हर पात्र, चाहे राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान या रावण ही क्यों न हो, जीवन में चरित्र निर्माण, संस्कार, संबंध और आचरण की सीख देता है।
अश्वथामा दाधीच: 35 वर्षों से रावण का जीवंत अभिनय
अश्वथामा दाधीच पिछले 35 वर्षों से रामलीला संस्था से जुड़े हैं और पिछले आठ वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने अंगद, विश्वामित्र, दशरथ जैसे कई प्रमुख किरदार भी निभाए हैं, लेकिन रावण का किरदार उन्हें सबसे चुनौतीपूर्ण लगता है। इसके लिए उन्होंने रामचरित मानस, वाल्मीकि रामायण और रावण संहिता का गहन अध्ययन किया। 20 किलो अतिरिक्त वेशभूषा, प्रभावी बॉडी लैंग्वेज और दमदार आवाज के अभ्यास से उनका अभिनय दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। अश्वथामा मानते हैं कि वे रावण की तरह विद्या के क्षेत्र में संतुलित और समर्पित रहने का प्रयास करते हैं। वे संस्कृत के ज्ञाता भी हैं।
पवन दोसाया: अभिनय से मेकअप तक का सफर
राघवेंद्र कला संस्थान से 1988 से जुड़े पवन दोसाया ने पेंटिंग और मेकअप के माध्यम से कला जगत में पहचान बनाई। अब तक 30 फिल्मों और 1500 एलबम में उनका योगदान रहा है। वे संस्थान में बाली, जयंत, काल्यादेव और विदूषक जैसे किरदार निभा रहे हैं। बाली, सुग्रीव का भाई है जो उसे भगा देता है। जयंत, श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए कौआ का रूप धारण करता है। वहीं विदूषक केवल जोकर नहीं होते बल्कि राजा के सलाहकार माने जाते हैं, जो हंसी-मजाक में भी बड़ी और गंभीर बातें कह देते हैं।
गोविंद तिवारी: 35 वर्षों से शिव, केवट और परशुराम
गोविंद तिवारी ने मंच पर विभिन्न पौराणिक पात्र निभाए हैं। शिव और केवट में संगीत प्रधानता है, जबकि परशुराम में वीर रस का अभिनय। वे पात्र को पूरे समर्पण और मन से जीवंत करते हैं।
रंगलाल मेहरा : रामलीला मंचन से समाज सुधार का संदेश
राघवेन्द्र कला संस्था के महासचिव रंगलाल मेहरा पिछले 25 वर्षों से समाज को संस्कृति और परंपरा से जोड़ने का काम कर रहे हैं। उनके अनुसार रामलीला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज सुधार का माध्यम है। निषाद, जनक, विभीषण और मारीच जैसे पात्रों के माध्यम से दर्शकों तक संस्कार और जीवन मूल्य पहुँचते हैं।
दीपक शर्मा: रामलीला से जीवन मूल्य
दीपक शर्मा पिछले छह वर्षों से मेघनाथ, मारीच, शतानंद और धावल जैसे प्रमुख पात्र निभा रहे हैं। उनका कहना है कि रामलीला ने उन्हें जीवन शैली को ढालने और सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा दी।
संतोष कुमार जैन: संस्कार और परंपरा से जुड़ाव
राघवेंद्र कला संस्थान से 12 वर्षों से जुड़े संतोष कुमार जैन ने बताया कि संस्था से जुड़कर उन्होंने कई महत्वपूर्ण किरदार निभाए हैं। उन्होंने गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र और सुग्रीव जैसे पात्र निभाए। उनके बच्चे भी मंच से जुड़े हैं। उनकी 16 वर्षीय बेटी पिछले तीन वर्षों से रामलीला में सक्रिय है और गौरीमाता, छोटी सीता, राक्षसी, शबरी और अग्निदेव जैसे विभिन्न किरदार निभा चुकी है।
मुक्ता कुलश्रेष्ठ: कौशल्या और शबरी से मिली पहचान
वर्ष 2006 से महिलाओं की भागीदारी की पहल के साथ जुड़ी मुक्ता कुलश्रेष्ठ ने मां कौशल्या और शबरी के रूप में दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। उनके अनुसार ऐसे पवित्र पात्रों को निभाना आस्था और संस्कारों को दृढ़ करता है।
उमेश जोशी 15 वर्षों से निभा रहे कुम्भकर्ण का किरदार
रामलीला मंचन में कुम्भकर्ण का पात्र हमेशा दर्शकों को रोमांचित करता है। राघवेन्द्र कला संस्थान से जुड़े उमेश जोशी पिछले 15 वर्षों से इस चुनौतीपूर्ण भूमिका को निभा रहे हैं। जोशी ने बताया कि कुम्भकर्ण का रोल आसान नहीं होता। खरार्टों की आवाज निकालना और मदमस्त हाथी की चाल में चलना काफी कठिन है। लेकिन जब दर्शक तालियां बजाते हैं तो सारी मेहनत सफल हो जाती है। उन्होंने हंसते हुए कहा कि अब तो लोग मुझे आॅफिस में भी कुम्भकर्ण कहकर बुलाने लगे हैं। रामलीला से जुड़े इस अनुभव को वह अपने जीवन का अनमोल हिस्सा मानते हैं।
40 वर्षों से रामलीला में विदूषक बनकर हंसा रहे भुवनेश जोशी
भुवनेश जोशी पिछले चार दशकों से रामलीला मंचन में विदूषक की भूमिका निभा रहे हैं। उनका कहना है कि लोगों को रुलाना या डराना आसान होता है, लेकिन हंसाना सबसे कठिन कार्य है। इसी चुनौती को उन्होंने जीवन का हिस्सा बना लिया। जोशी बताते हैं कि उनका पात्र जोकरनुमा होता है, जिसे देखकर और आवाज सुनकर दर्शक उत्साहित हो जाते हैं। लंबे समय से लगातार इस भूमिका को निभाते हुए वे आज भी दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर रहे हैं। हमारा मुख्य उद्देश्य है इस मंचन के माध्यम से संस्कृति अऔर परम्परा को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखना है, वहीं समाज में सभी परिवारों को संस्कारों से जोड़ना है।

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