संघर्ष और चुनौतियों से लड़ बेटियों ने लिखी तकदीर, 90% से अधिक अंक हासिल कर पाया मुकाम
टीचर नहीं, कोचिंग के पैसे नहीं, लेकिन जज्बा 100 फीसदी
मजदूर, किसान और ऑटो चालक की बेटियों ने 12वीं बोर्ड में रचा कीर्तिमान।
कोटा। सपने वही सच होते हैं, जिनके पीछे संघर्ष की कहानी होती है। यह कहावत उन हौनहार बेटियों ने सच कर दिखाई, जिन्होंने गरीबी, अभाव, आर्थिक तंगी और विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और जिद और जूनून के दम पर संघर्ष करते हुए 12वीं बोर्ड परीक्षा में 90 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल कर खुद को साबित किया। किसी के पिता मजदूर, किसान हैं तो कोई आॅटो चालक की बेटी है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि ताकत बनाकर मिसाल पेश की। संघर्षों की कहानी में कुछ प्रतिभाएं ऐसी भी हैं, जिन्होंने अपनी जिद और जुनून से नामुकिन को भी नुमकिन कर दिखाया। पेश है खबर के प्रमुख अंश....
जंगल में बसा गांव:माता-पिता और भाई दूसरों के खेतों पर मजदूरी करते ,बेटी ने पाया मुकाम
जंगल में बसे जिस गांव में मोबाइल नेटवर्क भी ठीक से नहीं आता, वहां से भी प्रतिभा निकलकर सामने आई है। मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में बसे घाटोली गांव में सरकारी स्कूल की रीना कुमारी ने 12वीं आर्ट्स फर्स्ट डिविजन से पास कर खुद को साबित किया। रीना बतातीं हैं, माता-पिता और भाई दूसरों के खेतों पर मजदूरी करते हैं, जो सुबह जल्दी घर से निकल जाते हैं। स्कूल जाने से पहले घर का सारा काम करती हूं। शाम को भी काम निपटाकर पढ़ाई करती हूं। घर में कोई पढ़ा लिखा नहीं है। छोटा भाई पढ़ रहा है। परिवार में 8 सदस्य हैं और दो कमरे हैं। एक में दादा-दादी और दूसरे में हम भाई-बहन व माता पिता सहित 6 सदस्य रहते हैं। शोर-शराबा होता है, कोई अन्य विकल्प नहीं होने से ऐसी परिस्थितियों में ही पढ़ाई की और 62.2 % हासिल की। आगे टीचर बनना चाहती हूं।
पैदल चल अगले दिन कोटा आने का बचाता किराया
महात्मा गांधी राजकीय इंग्लिश मीडियम स्कूल सुल्तानपुर के छात्र लक्ष्य गोस्वामी ने परिवार की विपरित परिस्थितियों के बावजूद 12वीं साइंस में 96% अंक हासिल कर कस्बे को टॉप किया। पिता जितेंद्र गोस्वामी 10 हजार रुपए महीने में प्राइवेट जॉब करते हैं, जिससे घर का गुजारा होता है। घर की स्थिति बेटा समझता है। वह रोडवेज बस से रोजाना 40 किमी का सफर कर कोटा कोचिंग को जाता है लेकिन शहर में कोचिंग तक जाने के लिए डेढ़ से दो किमी पैदल चलता है ताकि अगले दिन वापस कोटा आने के लिए बस का किराया बचा सके। आर्थिक परेशानियों के बावजूद लक्ष्य पर टॉप करने पर फोकस रखा और वह कर दिखाया। लक्ष्य का कहना है कि वह आगे इंजीनियर बनना चाहता है।
टीचर नहीं, कोचिंग के पैसे नहीं, लेकिन जज्बा 100 फीसदी
दीगोद निवासी जयश्री एक किमी पैदल स्कूल जाती और लौटकर घर का काम करती। शाम को भी मां का हाथ बंटाती। 12 लोगों का संयुक्त परिवार में शोर-शराबे के बीच पढ़ाई करती लेकिन व्यवधान से मन विचलित होता इसके बावजूद हिम्मत नहीं हारी और 12वीं कला में 94.80% अंक हासिल किर खुद को साबित किया। जयश्री बताती हैं, संयुक्त परिवार होने से शोर अधिक रहता है। शाम को 3 घंटे छत पर जाकर पढ़ती हूं। स्कूल में पिछले कई साल से इंग्लिश के टीचर नहीं हैं, ऐसे में लेसन व ग्रामर समझने में काफी परेशानी होती है। पिता किसान हैं, परिवार की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं होने से कोचिंग की सोच भी नहीं सकती। खुद के स्तर पर ही पढ़ाई की। पिता अनिल नागर ने बताया कि बेटी आगे सिविल सर्विसेज में जाना चाहती है।
घर-दुकान बिकी, बीमार पड़ी फिर भी हासिल किए ऑटो चालक की बेटी ने 96.60%
रायपुरा निवासी सरकारी स्कूल की छात्रा लक्षिता खरेड़िया की कहानी संघर्ष और चुनौतियों से भरी रही। आर्थिक तंगी के बावजूद उसने पढ़ाई जारी रखी और 12वीं कला में 96.60 % अंक हासिल कर ऑटो चालक पिता का नाम रोशन किया। लक्षिता कहती हैं, हमारा छावनी रामचंद्रपुरा में मकान व दुकान थी, जो कठिन परिस्थितियों के कारण बिक गए। पिता भी बेरोजगार हो गए। रायपुरा में रहने लगे। रोजगार की तलाश में पिता ऑटो चलाने लगे, इसी से गुजर-बसर होता है। परिवार की माली हालत समझती हूं, कई दिक्कतों से हर दिन दो-चार हुई लेकिन शिक्षा का दामन नहीं छोड़ा। पिता रामनिवास ने बताया कि कई बार स्टेशनरी खरीदने तक के पैसे नहीं थे। पेपरों के दौरान बेटी बीमार हो गई थी। फिर भी उसने हार नहीं मानी और बोर्ड में 96 प्रतिशत अंक हासिल किए।
मां का ऑपरेशन हुआ तो खुद संभाली घर की जिम्मेदारी, रात दो बजे तक पढ़ाई कर पाया मुकाम
जोमेटो राइडर शंभूदयाल की बेटी निर्जला मेहरा ने मुश्किल हालातों में भी 94.60 प्रतिशत अंक प्राप्त कर तीन विषयों में 99 अंक अर्जित किए। निर्जला ने बताया कि परीक्षा से पहले मां के गले का ऑपरेशन हुआ। उस समय हालत ऐसी नहीं थी कि मां घर का कोई काम कर सकें। ऐसे में खुद ने ही घर की जिम्मेदारी संभाली। मां की सार-संभाल के साथ-साथ छोटे भाई-बहनों की देखभाल की। घर के काम और परीक्षा की तैयारी सब एक साथ की। पिता शंभूदयाल ने बताया कि परिस्थितियां बेहद कठिन थी। उसके सामने सबसे बड़ी दिक्कत एक छोटे भाई की भी थी जो कि मानसिक रूप से कमजोर है।ज्यादातर समय तो मां की सेवा और छोटे भाई की देखभाल में निकलता। इसके बाद देर रात दो बजे तक वह पढ़ाई करती थी। निर्जला ने कोई कोचिंग या ट्यूशन नहीं ली। उसका आईएएस बनना सपना है।

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