सीढ़ियों से जंग : पेंशन की राशि लेने में हाफंते 38 सौ बुजुर्ग पेन्शनधारी, जानें पूरा मामला
वरिष्ठ नागरिकों एवं दिव्यांगों के लिये वैकल्पिक व्यवस्था नहीं
कोई तीन बार रूकी, सीढ़ियों पर ही पीया पानी, दृष्टिहीन-दो पैरों से विकलांग काट रहा चक्कर।
कोटा। बुढ़ापे में जब कदम धीमे पड़ जाते हैं और घुटने जवाब देने लगते हैं, तब भी कई बुजुर्गों को अपनी पेंशन पाने के लिए सीढ़ियों की लंबी चढ़ाई तय करनी पड़ रही है। जिन लोगों ने अपनी जवानी के दिनों में नौकरी करते हुए बैंक खाते खुलवाए थे, वही लोग अब उम्र के आखिरी पड़ाव में पेंशन लेने के लिए हर बार कठिनाई का सामना कर रहे हैं। शहर के सिविल लाइंस स्थित राजभवन रोड पर मौजूद स्टेट बैंक आफ इंडिया में वर्तमान में करीब 3800 पेँशन खाते सक्रिय है। यहांं शाखा कार्यालय दूसरी मंजिल पर संचालित हो रहा है। यहां पेंशन लेने आने वाले बुजुर्गों को लगभग 18 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंचना पड़ता है। जिन पैरों ने जिंदगी भर परिवार के लिए मेहनत की, वही पैर अब हर सीढ़ी पर थकान और दर्द का एहसास कराते हैं। कई बुजुर्ग बताते हैं कि पेंशन लेने के लिए उन्हें हर दो से तीन महीने में बैंक आना ही पड़ता है। सीढ़ियां चढ़ते समय उन्हें कई बार रुककर सांस लेना पड़ता है, लेकिन मजबूरी यह है कि बिना ऊपर पहुंचे उनका काम नहीं हो पाता।
यहां भी ऐसा ही हाल
गुमानपुरा स्थित एसबीबीजे की शाखा भी बरसों से ही दुसरी मंजिल पर संचालित हो रही है। यहां पर भी 2 हजार के लगभग पेंशनर,बुजुर्गो के खाते है । ऐसे में यहां के खातेदारों को भी सीढ़ियों से ही बैंक में जाना पड़ता है। शहर के अन्य बैंको में भी कमोबेश ऐसे ही हालात है जहां वरिष्ठ नागरिकों एवं दिव्यांगों के लिये कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गयी है।
केस नं. 1- कोटड़ी क्षेत्र की एक महिला पिछले करीब 12 वर्षों से यहां पेंशन लेने आ रही हैं। उन्होंने बताया कि घुटनों की तकलीफ के कारण अब सीढ़ियां चढ़ना बेहद मुश्किल हो गया है। हर बार ऊपर पहुंचते-पहुंचते सांस फूल जाती है, फिर भी पेंशन लेने के लिए आना पड़ता है।
केस नं. 2- जवाहर सागर बांध क्षेत्र से आई कांति बाई कहती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ अब बैंक तक पहुंचना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है। सीढ़ियां चढ़ते समय उन्हें कई बार रुककर सांस लेना पड़ता है। गांव से किसी व्यक्ति को साथ लाना पड़ता है और उसके आने-जाने का खर्च भी देना पड़ता है।
केस नं. 3- सिविल लाइंस निवासी राजू खंगार, जो दोनों पैरों से लाचार हैं और आंखों से भी ठीक से नहीं देख पाते, बताते हैं कि उन्होंने दिवाली के बाद अपनी संस्था के लिए बैंक में खाता खुलवाया था। खाते में करीब सात हजार रुपये जमा हैं, लेकिन कुछ कमियां पूरी करने के लिए उन्हें बार-बार बैंक आना पड़ रहा है। उनका कहना है कि उनके जैसे दिव्यांग व्यक्ति को आने के लिये एक अन्य साथी की जरूरत पड़ती है। इसलिए हर बार बैंक आना बेहद कठिन है।
आखिर क्यूं आना पड़ता है बैंक
-बैक आने वाले इन ग्राहकों में ज्यादातर को नये नियमों की जानकारीयां ही नहीं है।
-बात यो भी है कि बैक द्वारा ऐसी जरूरी बातें आगे होकर इन बुजुर्गो को बतायी ही नहीं गयी ।
-कई लोग अंगुठा निशानी का प्रयोग करते हे, ऐसे में पैसे निकलवाने के लिये मूल बैंक में आना ही पड़ता है।
-ग्रामीण क्षेत्रों में ई-मित्र या अन्य सहायक सुविधायें मंहगी होती है या फिर कम होती हे ।
-खाता स्थानान्तरण करने में बैंको द्वारा आनाकानी ।
-मोबाईल नहीं होना या चलाने की परेशानी भी इस उम्र ओंर दिव्यांगो के लिये सबसे बड़ा कारण है ।
बुजुर्ग और दिव्यांगों के लिए डोरस्टेप बैंकिंग
बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि आज डिजिटल बैंकिंग और आधार आधारित भुगतान जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जिनसे घर के पास ही पैसा निकाला जा सकता है। बैंक परिसर में रैंप, व्हीलचेयर और जरूरत पड़ने पर लिफ्ट जैसी व्यवस्था करना व बैंक शाखाओं में बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए अलग या प्राथमिकता काउंटर की व्यवस्था करना अनिवार्य है। 70 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगों को नकद जमा-निकासी व अन्य जरूरी सेवाएं घर पर उपलब्ध कराने की सुविधा।यदि कोई घर से आने में लाचार है तो बैक प्रबंधन घर पर भी पैसे देने के लिये किसी कार्मिक को भेजता है। साथ ही बैंक की जिम्मेदारी है कि वह अपने ग्राहकों को इन सुविधाओं के बारे में बताने के लिये आवश्यक सामग्री या जानकारी उपलब्ध करवायें।
इनका कहना है
शाखा की पुरानी इमारत को तोड़कर नई बिल्डिंग बनाने का प्रस्ताव विचाराधीन है,और भविष्य में ऐसी सुविधाएं देने का प्रयास किया जाएगा, जिससे बुजुर्गों और दिव्यांगों को परेशानी न हो।
-शदेन्दु पाण्डेय, ब्रांच मैनेजर एसबीआई राजभवन रोड

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