वन्यजीवों के अन्तिम संस्कार के लिए बनाया यंत्र, पर्यावरण की दृष्टि से भी सुरक्षित
आधुनिक और वैज्ञानिक मापदंडों पर किया तैयार
प्रदेश के पहले मिनी शवदाह गृह से रुकेगी अंग तस्करी , अवशेषों की खाद से महकेगी विभाग की नर्सरी।
कोटा। क्षेत्रीय वन्य जीव मंडल ने वन्यजीवों के सम्मानजनक निस्तारण की दिशा में एक अनूठी पहल की है। जिले में अब घायल वन्यजीवों और पक्षियों की मृत्यु के बाद उनके शवों को जमीन में दफनाने की पारंपरिक मजबूरी खत्म होगी। विभाग ने एक विशेष 'ओवननुमा शवदाह गृह' तैयार किया है, जो न केवल पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है, बल्कि वन्यजीवों के अंगों की तस्करी को रोकने में भी अभेद्य कवच साबित होगा।
विभाग ने बनाया प्रदेश का पहला मिनी शवदाह गृह
प्रदेश में पहली बार अन्तिम संस्कार के लिए बने यंत्र से अंतिम संस्कार होगा। नयापुरा स्थित क्षेत्रीय वन्य जीव कार्यालय कोटा ने इसे बनाकर तैयार कर लिया है। जिसमें जिले भर से लाये गये घायल व इलाज के दौरान दम ताेड़ने वाले जानवराें, पक्षीयों का अंतिम संस्कार किया जा सकेगा। कोटा मेें इस पहल की शुरूआत जल्द ही होने वाली है।
अहमदाबाद से मिली प्रेरणा से बनाया मिनिएचर
डीसीएफ (वाइल्डलाइफ) अनुराग भटनागर ने बताया कि गुजरात दौरे के दौरान उन्होंने देखा कि वहां हाथियों जैसे बड़े जानवरों के लिए विशाल शवदाह गृह बने हुए हैं। जिनमें वाहन से लाये गये बड़े से बड़े जानवर को सीधे ही रखा जा सकता है। राजस्थान में फिलहाल इसके लिए अलग से बजट उपलब्ध नहीं था। इसलिए कोटा टीम ने उसी तकनीक का एक मिनिएचर मॉडल स्थानीय स्तर पर तैयार करवाया। नयापुरा स्थित वन्य जीव कार्यालय में जमीन की कमी और बारिश में दुर्गंध की समस्या को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।
गैस आधारित कम खर्चीला व सुरक्षित
इसे बनाने में विभाग के एडेप्टिव स्कीम से बचे पैसे से कुल 3.25 लाख रूपये की लागत में ही इसे तैयार कर लिया। इस शवदाह यंत्र की बनावट बेहद मजबूत है। जिसे आधुनिक और वैज्ञानिक मापदंडों पर तैयार किया गया है। इसमें अन्य छोटे जीवो के अलावा भेड़िया ,लोमड़ी ,बन्दर , व्यस्क चिंकारा , हिरण जैसे जानवरों का निस्तारण किया जा सकेगा। गैस आधारित संचालन प्रक्रिया को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए इसमें तीन गैस कनेक्शन का आवेदन किया गया है, ताकि शव को पूरी तरह भस्म किया जा सके।
6 एमएम की लोहे की चादर से निर्मित
विशाल आकार यह ओवननुमा यंत्र करीब 9 फीट लंबा, पौने चार फीट चौड़ा और साढ़े चार फीट ऊंचा है। इसका ढ़ांचा मोटी चद्दर की दोहरी परत से बनी हैं, जिससे इसकी कुल मोटाई 4 इंच हो जाती है। जिसमे एक साथ 6 बर्नर से ऐ साथ गैस ड़ाली जाती है यह संरचना उच्च तापमान को बर्दाश्त करने में सक्षम है।
पर्यावरण संरक्षण तस्करी पर रोक
परंपरागत रूप से जानवरों को जमीन में दफन करने पर हड्डीयों व अंगों की चोरी या दुरुपयोग का जोखिम बना रहता है। इस मशीन में शव पूरी तरह राख में तब्दील हो जाएगा, जिससे तस्करी की संभावनाएं शून्य हो जाएंगी। साथ ही, बारिश के मौसम में जमीन से आने वाली दुर्गंध और संक्रमण का खतरा भी टल जाएगा।
वेस्ट टू वेल्थ हड्डियों के पाउडर से बढ़ेगी वन भूमि की उर्वरता
चिड़ियाघर और बायोलॉजिकल पार्क में मांसाहारी वन्यजीवों के भोजन के बाद रोजाना करीब 80 से 85 किलो हड्डियां बचती हैं। पर्यावरण नियमों के तहत इन्हें बाहर नहीं फेंका जा सकता। अब इन हड्डियों को इस भट्टी में जलाने के बाद क्रशर मशीन से पीसा जाएगा। इस पाउडर का उपयोग विभाग की नर्सरी और वन भूमि में खाद के तौर पर होगा, जिससे पौधों को प्राकृतिक पोषण मिलेगा और जानवरों के अवशेषों का कोई दुरुपयोग नहीं हो सकेगा।
बजट की कमी के बावजूद हमने वन्यजीवों के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए यह यंत्र तैयार करवाया है। इससे न केवल स्वच्छता रहेगी, बल्कि बहुमूल्य वन्यजीव अंगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।
-अनुराग भटनागर, डीसीएफ वाइल्डलाइफ, कोटा

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