हाडौती संभाग के सबसे बड़े मातृ-शिशु अस्पताल में कउव ही नहीं

दूसरे विभागों से बुलाने पड़ते हैं डॉक्टर

हाडौती संभाग के सबसे बड़े मातृ-शिशु अस्पताल में  कउव ही नहीं
डिलीवरी के दौरान क्रिटिकल होने पर 10 किमी. दूर मेडिकल कॉलेज रैफर करना पड़ता है।

कोटा। करोड़ों रुपये के विकास कार्यों और अत्याधुनिक सुविधाओं का दम भरने वाला संभाग का सबसे बड़ा मातृ-शिशु जेकेलोन अस्पताल आज भी बुनियादी क्रिटिकल केयर सुविधाओं के लिए तरस रहा है। हाड़ौती (कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़) के साथ-साथ पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश तक की महिलाओं के इलाज का जिम्मा संभालने वाले इस प्रमुख चिकित्सा संस्थान में आज तक एक अदद 'ऑब्सटेट्रिक आईसीयू' (प्रसूति गहन चिकित्सा इकाई) स्थापित नहीं हो पाया है।

वर्तमान में अस्पताल में केवल 'हाई डिपेंडेंसी यूनिट' (ऌऊव) संचालित है, जहाँ सिर्फ हाई बीपी या सामान्य पीलिया (जॉन्डिस) से पीड़ित महिलाओं को ही संभाला जा सकता है। लेकिन जैसे ही प्रसूता की स्थिति अत्यंत नाजुक या क्रिटिकल होती है, तो उचित वेंटिलेटर या गहन चिकित्सा तंत्र न होने से डॉक्टरों के हाथ-पांव फूल जाते हैं। ऐसे नाजुक वक्त में दूसरे विभागों से डॉक्टर्स को बुलाकर वैकल्पिक इंतजाम करने पड़ते हैं, जिससे होने वाली मामूली देरी भी प्रसूताओं की जिंदगी पर भारी पड़ जाती है।

क्यों जरूरी है ऑब्सटेट्रिक आईसीयू? समझें ये 7 घातक जटिलताएं
अस्पताल के विशेषज्ञों के अनुसार, प्रसव के दौरान या बाद में महिलाओं की स्थिति कई बार अचानक इतनी क्रिटिकल हो जाती है कि उन्हें सामान्य वार्ड या एचडीयू में रखना मुमकिन नहीं होता। निम्नलिखित 7 ऐसी गंभीर स्थितियां हैं जहां तत्काल ऑब्सटेट्रिक आईसीयू और वेंटिलेटर सपोर्ट अनिवार्य होता है:

एक्लेम्पसिया और प्री-एक्लेम्पसिया
गर्भावस्था में अचानक बीपी का अत्यधिक बढ़ना और यूरिन में प्रोटीन आना प्री-एक्लेम्पसिया है। स्थिति बिगड़ने पर महिला को दौरे (ऋ्र३२) आने लगते हैं (एक्लेम्पसिया)। इसमें ब्रेन हेमरेज या ऑर्गन फेलियर रोकने के लिए तत्काल आईसीयू मैनेजमेंट चाहिए।

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हेल्प सिंड्रोम 
यह प्री-एक्लेम्पसिया का घातक रूप है, जिसमें लाल रक्त कोशिकाएं टूटने लगती हैं, लिवर एंजाइम्स अत्यधिक बढ़ जाते हैं और प्लेटलेट्स तेजी से गिरते हैं। इसमें 1% से 2% तक मृत्यु दर का खतरा रहता है। लिवर फटने या अंदरूनी ब्लीडिंग के कारण मरीज को केवल क्रिटिकल केयर सपोर्ट पर ही बचाया जा सकता है।

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पोस्टपार्टम हेमरेज (pph)
प्रसव के बाद या सिजेरियन के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव से महिला 'हाइपोवोलेमिक शॉक' में चली जाती है। बीपी शून्य होने पर लगातार ब्लड ट्रांसफ्यूजन और इनोट्रोपिक सपोर्ट के लिए आईसीयू जरूरी है।

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एम्नियोटिक फ्लूइड एम्बोलिज़्म
इस दुर्लभ व खतरनाक स्थिति में बच्चे के आसपास का पानी (अ‍ेल्ल्रङ्म३्रू ऋ’४्र)ि मां के रक्तप्रवाह में मिल जाता है, जिससे दिल और फेफड़े अचानक काम करना बंद कर देते हैं। इसमें मरीज को तुरंत लाइफ सपोर्ट (वेंटिलेटर) पर लेना पड़ता है।

सेप्सिस या गंभीर इन्फेक्शन
प्रसव या अबॉर्शन के बाद गर्भाशय का इन्फेक्शन जब खून में फैल जाता है, तो मल्टीपल ऑर्गन (किडनी और फेफड़े) फेल होने लगते हैं। बीपी मेंटेन करने और हाई-डोज एंटीबायोटिक्स के लिए आईसीयू अनिवार्य है।

पेरिपार्टम कार्डियोमायोपैथी (heart failure)
डिलीवरी के आस-पास महिला का दिल अचानक कमजोर हो जाता है, जिससे फेफड़ों में पानी भर जाता है और सांस लेने में तकलीफ होती है। इसके लिए निरंतर कार्डियक मॉनिटरिंग की आवश्यकता होती है।

डीआईसी 
शरीर के भीतर खून जमने का सिस्टम पूरी तरह बिगड़ने से टांकों या अंदरूनी अंगों से अनियंत्रित ब्लीडिंग होने लगती है। यह आमतौर पर ढढऌ या गर्भ में बच्चे की मृत्यु (कवऊ) के बाद होता है, जहां क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट्स ही जान बचा सकते हैं।

20 मिनट की यह दूरी पड़ सकती है भारी
शहर और अस्पतालों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। जेकेलोन अस्पताल की सीनियर डॉक्टर और अधीक्षक डॉ. निर्मला शर्मा ने वर्तमान प्रशासनिक और भौगोलिक चुनौतियों को रेखांकित करते हुए बताया कि यदि जेके लोन, एनएमसीएच , या एसएसबी से किसी विशेषज्ञ डॉक्टर को आपातकालीन स्थिति में दूसरे अस्पताल (जैसे एमबीएस) जाना पड़े, तो कम से कम 20 मिनट का समय लग जाता है। गंभीर मरीजों के लिए यह समय बेहद कीमती होता है।

यह टेस्ट है जरूरी  
डॉ. शर्मा के अनुसार, ऑब्सटेट्रिक आईसीयू का प्रबंधन क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट्स, फिजिशियन या एनेस्थीसिया विभाग के डॉक्टरों द्वारा किया जाना चाहिए, जो 24 घंटे इसी तरह की गंभीर स्थितियों को संभालते हैं। लेबर रूम परिसर में ही यह व्यवस्था होने से डॉक्टर बिना किसी मानसिक तनाव के अपना शत-प्रतिशत दे सकेंगे। समय रहते संभावित खतरों को भांपने के लिए गर्भवती महिलाओं के लिवर फंक्शन, रीनल फंक्शन, सीबीसी और प्रॉपर ब्लीडिंग प्रोफाइल जैसे बुनियादी टेस्ट बेहद जरूरी हैं।

अधीक्षक का बयान
मैं आपके माध्यम से सरकार से भी निवेदन करती हूँ और उच्च अधिकारियों को भी समय-समय पर लिखती हूँ कि हमें लेबर रूम परिसर में ही एक 'ऑब्सटेट्रिक आईसीयू' की सख्त जरूरत है। इस क्रिटिकल केयर यूनिट को चलाने के लिए या तो क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट्स, फिजिशियन या फिर एनेस्थीसिया के डॉक्टर्स की तैनाती होनी चाहिए ताकि समय रहते ऐसी गंभीर महिलाओं को नया जीवन दिया जा सके।
-डॉ. निर्मला शर्मा, अधीक्षक, जेकेलोन अस्पताल, कोटा

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