घुश्मेश्वर महादेव मंदिर में श्रावण महोत्सव नजदीक, व्यवस्था का कार्य शुरू
सावन का महीना शुरू
शिव लहरी सेवा प्रमुख आर एस एस राजस्थान गौतम आश्रम से शोभायात्रा का शुभारंभ कर ध्वजारोहण करेंगे।
शिवाड़। घुश्मेश्वर महादेव मंदिर में श्रावण महोत्सव नजदीक आने के साथ ही ट्रस्ट पदाधिकारियों के द्वारा मंदिर परिसर घुश्मेश्वर गार्डन, धर्मशाला में डेकोरेशन, सफाई व्यवस्था, श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था का कार्य युद्ध स्तर पर जारी है। श्रावण महोत्सव पर भोले के जलाभिषेक,रुद्राभिषेक दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालुओं की संख्या में आने को ध्यान में रखते हुए मंदिर ट्रस्ट पदाधिकारी व्यवस्था में जुटे हैं मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष प्रेम प्रकाश शर्मा ने बताया कि बुधवार से 10 सितंबर तक चलने वाले महोत्सव पर श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की परेशानी ना हो इसके लिए ट्रस्ट पदाधिकारियों ने सदस्यों को अपनी अपनी जिम्मेदारियां सौंपने के साथ साथ धर्मशाला में श्रद्धालुओं के ठहरने की विशेष सुविधाएं की जा रही है ।14 जुलाई गुरुवार को मुख्य अतिथि शिव लहरी सेवा प्रमुख आर एस एस राजस्थान गौतम आश्रम से शोभायात्रा का शुभारंभ कर ध्वजारोहण करेंगे।
श्रावण में कांवड़ यात्रा: शिवभक्त सावन का महीना शुरू होते ही गंगा नदी की तरफ चल पड़ते हैं जिसका पवित्र जल लाकर भगवान शिव पर चढ़ाते हैं लेकिन जिन क्षेत्रों में गंगा नदी बहुत दूर है वहां दूसरी पवित्र नदियों का जल लाकर शिव पर चढ़ाया जाता है कावड़िया कावड़ यात्रा धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा उत्तर भारत की जीवन परंपरा का हिस्सा है हरिद्वार ऋषिकेश से इन दिनों जलाकर शिव भक्त पूरे देश के शिव मंदिरों में जाते हैं जिसके कारण पश्चिम, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, उत्तरांचल का एक बड़ा हिस्सा श्रावण में का और यात्राओं से सरोबार हो जाता है अगर माइथोलॉजी पर जाए तो माना जाता है कि रावण परशुराम भगवान राम दुनिया के पहले कावड़िए थे जिन्होंने पवित्र नदियों का पवित्र जल लाकर के भगवान शिव का अभिषेक किया था के पिछले इसके पीछे धार्मिक बात है कि पौराणिक काल में जब देवताओं ने मिलकर समुद्र मंथन किया था उस समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले थे इन रत्नों में एक रत्न हलाहल विष भी था जिसे देवता की अनुपम पर शिव ने पी लिया था कि जब भगवान शिव ने वह जहर पिया तो वह बहुत ही असहनीय था उसे पीते ही उनका पूरा गला नीला पड़ गया इसलिए उनका नाम नीलकंठ भी है, भगवान शिव के शरीर से गर्मी को दूर करने के लिए देवता ने उन पर जल की बारिश की तथा भक्तों ने उनका जलाभिषेक किया तबसे पूरे सावन के महीने में भगवान का जलाभिषेक होता है।

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