भारत से लेकर अफ्रीका तक जानलेवा हुआ मौसम, 2 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार, 80 लाख बेघर

भुखमरी के हालात

भारत से लेकर अफ्रीका तक जानलेवा हुआ मौसम, 2 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार, 80 लाख बेघर

भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक अब ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन का व्यापक असर देखने को मिल रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों की तरफ से अब कई तरह की चिंताएं तो जताई जा ही रहीं हैं साथ ही साथ चेतावनी भी दी गई है।

लंदन। द स्टेट आफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2022 नाम की विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन का कहर थम नहीं रहा है। चाहे वह पहाड़ की ऊंची ऊंची चोटियां हो या समुद्र की गहराइयां, कुछ भी इससे अनछुआ नहीं बचा है। अफ्रीका में इसकी वजह से भूखमरी की स्थिति है तो वहीं कई लोग बेघर तक हो गए हैं। पाकिस्तान में भी विनाशकारी बाढ़ ने देश के अस्तित्व पर संकट पैदा कर दिया है। भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक अब ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन का व्यापक असर देखने को मिल रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों की तरफ से अब कई तरह की चिंताएं तो जताई जा ही रहीं हैं साथ ही साथ चेतावनी भी दी गई है।

भुखमरी के हालात
सूखे ने पूर्वी अफ्रीका को पिछले पांच सालों से जकड़ लिया है। इसके चलते वहां के 20 मिलियन से ज्यादा लोग खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। पिछले साल जुलाई और अगस्त में रिकॉर्ड तोड़ बारिश ने पाकिस्तान में बाढ़ ला दी और 1,700 से अधिक मौतें हुईं। इसके चलते आठ मिलियन लोग बेघर हो गए। जून के मध्य से अगस्त के अंत तक चीन में रिकॉर्ड तोड़ सबसे व्यापक और लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव रही। वहीं गर्मियों के दौरान रिकॉर्ड तोड़ लू ने यूरोप को प्रभावित किया। यूरोप में 15000 से ज्यादा लोग गर्मी से की वजह से मारे गए। इनमें स्पेन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और पुर्तगाल के लोग शामिल थे। इसकी वजह से भारत में फिलहाल हीटवेव अपनी आवृत्ति, तीव्रता, और घातकता में बढ़ रही है जो हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, और सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों पर बोझ डाल रही है।

भारत पर भी असर डालेगी गर्मी
पीएलओएस क्लाइमेट में प्रकाशित, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के रमित देबनाथ और उनके सहयोगियों द्वारा किए एक अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से गंभीर होती यह हीट वेव भारत के ससटेनेबल डेव्लपमेंट गोल्स को हासिल करने की दिशा में भारत की प्रगति को बाधित कर सकती हैं। गौरतलब है कि भारत सत्रह संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिसमें गरीबी उन्मूलन, अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण, बेहतर जलवायु, और आर्थिक विकास आदि शामिल हैं। शोधकतार्ओं ने पाया कि हीटवेव ने एसडीजी प्रगति को पहले के अनुमान से अधिक कमजोर कर दिया है।

गायब होते समुद्री संसाधन
ग्रीनहाउस गैसों द्वारा पृथ्वी के ऊपरी सतह में फंसी ऊर्जा ( ग्लोबल वार्मिंग) का लगभग 90% समुद्र अपने में सोख लेता है। इसके चलते समुद्र की सतह के 58% हिस्से ने 2022 के दौरान कम से कम एक समुद्री हीटवेव का अनुभव किया। वहीं ग्लोबल मीन सी लेवल यानी समुद्र एसटीआर का बढ़ना 2022 में बढ़ना जारी रहा, सैटेलाइट अल्टीमीटर रिकॉर्ड (1993-2022) के लिए एक उच्च स्तर पर पहुंच गया। उपग्रह रिकॉर्ड के अनुसार 1993-2002 के बीच में 2.27 मिमी प्रति वर्ष और 2013-2022 के बीच में 4.62 मिमी प्रति वर्ष के हिसाब से ग्लोबल औसत समुद्र स्तर वृद्धि दर दोगुनी हो गई है। 

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कार्बन डाइआक्साइड समुद्री जल के साथ प्रतिक्रिया करता है जिसके परिणामस्वरूप पीएच में कमी आती है जिसे समुद्र अम्लीकरण कहा जाता है। आईपीसीसी की छठी आकलन रिपोर्ट के अनुसार समुद्र की सतह का पीएच अब पिछले कम से कम 26 हजार साल में सबसे कम है। जिससे साफ जाहिर है की इसका कितना खतरनाक असर समुद्री जीव जनतुओं पर होगा। वैसे भी अब अधिकांश समुद्र तटों की रेत से सीपियां, शंख आदि गायब हो चुके हैं।

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पिघलने लगे ग्लेशियर
साल 2022 में वैश्विक औसत तापमान 1850-1900 के औसत से 1.15 [1.02 से 1.28] डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। सन1850 के बाद से अब तक साल 2015 से 2022 तक रिकॉर्ड में आठ सबसे गर्म साल रहे हैं। तीन मुख्य ग्रीनहाउस गैसों-कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन और नाइट्रस आक्साइड की सांद्रता 2021 में रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई, नवीनतम वर्ष जिसके लिए समेकित वैश्विक मूल्य उपलब्ध हैं।

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(1984-2021)। साल 2020 से 2021 तक मीथेन सांद्रता में वार्षिक वृद्धि रिकॉर्ड पर सबसे अधिक थी। यूरोपीय आल्प्स ग्लेशियर ने मार्च 2022 में पिघलने के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। एक रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर ग्लेशियरों ने 1993-2019 की अवधि में 6000 गिगा टन से अधिक बर्फ खो दी। अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ 25 फरवरी, 2022 को 1.92 मिलियन किमी2 तक गिर गई, जो रिकॉर्ड पर सबसे निचला स्तर है और दीर्घावधि (1991-2020) औसत से लगभग 1 मिलियन वर्ग किमी नीचे है।

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