सतरंगी सियासत

सतरंगी सियासत

सतरंगी सियासत से जाने अंदर की बात.....

कहां लैंड करेंगे?
सचिन पायलट की अगली पॉलिटिकल लैंडिंग कहां होगी? अब यह यक्ष प्रश्न। प्रियंका गांधी ने राजस्थान में जिस तरह से निर्णायक हस्तक्षेप करके पिछले साल की बगावत को सेटल करवाया। उसे देखते हुए फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व पायलट को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में तुरुप के पत्ते के रूप में देख रहा। वैसे भी पायलट कह चुके। पार्टी नेतृत्व ने जो भी जिम्मेदारी दी। वह उसे पूरी गंभीरता से निभाते रहे हैं। लेकिन उनका मन राजस्थान में ही रमता है। हां, मंत्रिमंडल पुनर्गठन के बाद इधर-उधर से बयानबाजी हो रही। जो अपेक्षित भी। लेकिन रायता उतना नहीं फैला। जिसका भाजपा अनुमान लगा रही थी। हां, अगले साल होने वाले पांच रा’यों के चुनाव के बाद कहानी बदल भी सकती है। क्योंकि कांग्रेस को गुजरात चुनाव से पहले सितंबर में नया चुनावित अध्यक्ष मिलने वाला। हां, रा’य सरकार में सबको एडजस्ट कर दिया। लेकिन पायलट नहीं गए। यह अपने आप में संकेत। पार्टी का फोकस 2023 और 2024 के आम चुनाव बताया जा रहा।


अर्थ पर अर्थ!
पीएम मोदी ने तीन कृषि कानून वापस क्या लिए। अभी तक उसके अर्थ लगाए जा रहे। प्रदर्शनकारी किसान अभी तक विश्वास नहीं कर पा रहे। हालांकि कैबिनेट से इसकी मंजूरी के बाद लोकसभा की सोमवार की कार्यसूची में लिस्टेट भी हो गया। हां, पीएम मोदी के इन शब्दों का खास अर्थ लगाया जा रहा। ‘जो किया किसान हित में किया और जो फैसला किया वह देशहित में किया।’ इससे किसान संगठन ही नहीं। विपक्षी दल भी चौकन्ने। फिर रही कसर उन दो तस्वीरों ने कर दी। जिसमें पीएम मोदी एवं सीएम योगी कोई गंभीर मंत्रणा करते हुए दिखाई दे रहे। इसे योगीजी ने अपने व्यक्तिगत ट्वीटर हैंडल से जारी किया। सो, मतलब तो खास ही होगा। इसीलिए अभी तक अर्थ पर अर्थ लग रहे। वहीं, भाजपा नेताओं, सांसदों ने संकेत दिया। तीनों बिल नए फार्मेट में फिर से आ जाएंगे। लेकिन जो हालात विरोध की आड़ में पैदा कर दिए गए। वह देशहित में नहीं था। इसीलिए इतना कठोर निर्णय लेना पड़ा।


कंगाल पाक..
तो अब खुद पाक पीएम इमरान ने ही स्वीकारा। देश चलाने के लिए धन नहीं। पुरानी उधारी चुक नहीं रही और नया कर्ज मिल नहीं रहा। आर्थिक संस्थाओं की नजर में पाक की साख खराब हो गई। दूसरी ओर, पाक सेना आईएसआई चीफ के बहाने ‘ऑपरेशन’ के मूड में। इमरान की कुर्सी खतरे में। भारत का हमेशा से मानना रहा। पड़ोस में शांति जरुरी। वरना इसका खुद पर भी होगा। पाक वैसे भी चीन की विभिन्न विकास परियोजनाओं के चलते उसके शिकंजे में। चीन के इसी रवैये से इसी से श्रीलंका और बांगलादेश भी उससे बिदक गए। खैर, बात पाक के खस्ताहाल होने की। दुनियां में पाक अब तक आंतक ही परोसता रहा। दुनियां की आंखें खुल रहीं। अफगानिस्तान का प्लान फेल हो रहा। तालिबान सरकार की पींगें भारत से बढ़ रहीं। रही सही कसर सउदी अरब ने भारत में बड़ा निवेश प्रस्ताव स्वीकार करके पूरी कर दी। आखिर यह पाक में भी तो हो सकता था। लेकिन वह पाक का स्तर जानता।

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यूपी में चुनावी बिसात...
यूपी चुनाव को लेकर 2024 के आम चुनाव के मद्देनजर हर दल गंभीर। भाजपा जहां धीरे-धीरे पते खोल रही। तो सपा प्रमुख अखिलेश जल्दबाजी दिखा रहे। जिन्ना पर दिया गया बयान इसकी बानगी। अब तो ओवैसी की एआईएमआईएम तक से सीट बंटवारे की चर्चा। अखिलेश हर भाजपा विरोधी दल को साथ लेने के फिराक में। तो बहनजी चुुपचाप अपनी सोशल इंजीनियरिंग में लगी हुईं। जब विकास का श्रेय लेने में भाजपा एवं सपा आगे दिखे। तो मायावती ने 2007 से 12 का कार्यकाल का जिक्र कर दिया। लेकिन इस बार यूपी में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच बताया जा रहा। लगभग सभी दल यूपी के परिणाम का इंतजार कर रहे। असल में, 2024 की बिसात भी इसी के बाद बिछेगी। विपक्ष मान रहा। यदि यूपी का परिणाम भाजपा के विपरित रहा। तो पीएम मोदी का अवसान तय। फिर भाजपा में भी अंदरखाने बखेड़े का अंदाजा लगाया जा रहा। लेकिन क्या यह सब इतना आसान? विपक्ष जल्दबाजी में तो नहीं?


चोट पर चोट!
ममता बनर्जी, कांग्रेस को चोट पर चोट दे रहीं। वह प्रमुख विपक्षी दल के लगातार विकेट उड़ा रहीं। पहले सुष्मिता देव, फिर एल. फलेरियो। और अब अशोक तंवर एवं कीर्ति आजाद। मेघालय में 12 विधायकों टीएमसी में मिला लिया। ममता की हर उस रा’य में नजर। जहां कांग्रेस कमजोर हो रही। लेकिन ऐसा हो क्यों रहा? असल में, सोनिया गांधी तो दीदी की सुनने को तैयार। लेकिन राहुल गांधी नहीं मान रहे। इसीलिए बात आगे नहीं बढ़ी। हालांकि दोनों दल बंगाल में साथ चुनाव लड़ चुके। लेकिन अब हालात बिगड़ रहे। अब तो संसद में भी तालमेल, समन्वय नहीं होगा। लगता है दीदी की इच्छा। टीएमसी राष्टÑीय दल बने। इसके लिए कांग्रेस को तोड़ना ही साफ्ट रणनीति। जो राजनीति में आगे बढ़ने के आकांक्षी। जो काम तो करना चाहते। लेकिन गांधी परिवार उनका उपयोग नहीं कर पा रहा। ऐसे में यह नेता करें क्या? अच्छा है टीएमसी का ही दामन थामा जाए। वहीं, दीदी भाजपा और मोदी से राष्ट्रव्यापी मुकाबले को आमादा।


यात्रा का हासिल...
वसुंधरा राजे की तीन दिनी देवदर्शन यात्रा पूरी हुई। राजे ने कहा यह उनकी व्यक्तिगत यात्रा। इसका कोई राजनीतिक अर्थ नहीं लगाएं। इसी बीच, प्रदेश अध्यक्ष ने भी दोहराया। वह राजे की धार्मिक यात्रा पर कोई टिप्प्णी नहीं करेंगे। अब पांच दिसंबर को अमित शाह प्रदेश के दौरे पर आ रहे। भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बहाने दस हजार नेता-कार्यकर्ता जुटेंगे। जहां कांग्रेस 2023 में सत्ता में वापसी का दंभ भर रही। तो भाजपा भी इस बार सत्ता में वापसी को आतुर। उसी योजना पर काम हो रहा। इसी बीच, राजे की यात्रा ने राजनीतिक निहितार्थ लगवाए। जिससे थोड़ा असमंजस की स्थिति। पार्टी कार्यकर्ता थोड़ा असहज हुए। लेकिन कांग्रेस में भी अभी भले ही शांति हुई हो। लेकिन आगे क्या होगा। कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे में प्रदेश की राजनीति दिलचस्प मोड़ जाती हुई दिखाई दे रही। आगे के राजनीतिक घटनाक्रम का सभी को इंतजार। हां, भाजपा के एक पोस्टर ने बीते समय हुए पोस्टर वार की याद दिला दी।
-दिल्ली डेस्क

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