विकासशील देशों पर वैश्विक संघर्षों का असर अधिक : संरक्षण के लिए संतुलित वैश्विक उपायों की जरूरत, ग्लोबल कन्वर्जेंस फॉर ग्रोथ समिट की बैठक में बोली सीतारमण

विकासशील देशों को संतुलित वृद्धि के बारे में अपनी राय प्रस्तुत करने का अवसर मिला

विकासशील देशों पर वैश्विक संघर्षों का असर अधिक : संरक्षण के लिए संतुलित वैश्विक उपायों की जरूरत, ग्लोबल कन्वर्जेंस फॉर ग्रोथ समिट की बैठक में बोली सीतारमण
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ग्लोबल कन्वर्जेंस फॉर ग्रोथ समिट में कहा कि भू-राजनीतिक संघर्षों का सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ पर पड़ता है। उन्होंने समन्वित वैश्विक कार्रवाई, मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं और बहुपक्षीय सहयोग पर जोर दिया। सीतारमण ने भारत की मजबूत घरेलू मांग आधारित अर्थव्यवस्था, लगभग 7% वृद्धि दर और समावेशी वैश्विक विकास के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

नई दिल्ली। केंद्रीय वित्त एवं कार्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि भू-राजनीतिक संघर्षों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव विकासशील देशों और दक्षिण की दुनिया पर पड़ता है और उन्हें ऐसे प्रभावों से बचाने के लिए समन्वित वैश्विक कदमों की जरूरत है। सीतारमण ग्लोबल कन्वर्जेंस फॉर ग्रोथ समिट की वर्चुअल बैठक को यहां से संबोधित कर रही थीं। जी7 की बैठक से पहले मेजबान फ्रांस की अध्यक्षता में गुरुवार शाम हुई इस बैठक में शीर्ष सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के अलावा भारत, ब्राजील, चीन, दक्षिण कोरिया, केन्या और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रतिनिधि शामिल हुए। कल हुई इस बैठक में विकासशील देशों को संतुलित वृद्धि के बारे में अपनी राय प्रस्तुत करने का अवसर मिला।

सीतारमण ने कहा, हाल के घटनाक्रमों ने लचीली, विविधीकृत और भौगोलिक रूप से वितरित आपूर्ति श्रृंखलाओं के महत्व को रेखांकित किया है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से घरेलू मांग पर आधारित है और वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक संकटों के बीच भी मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। वैश्विक अनिश्चितताओं से विशेष रूप से दक्षिणी गोलार्ध के विकासशील और गरीब देशों पर पडऩे वाले असंतुलित प्रभावों के बारे में वित्त मंत्री ने कहा, आज की परस्पर जुड़ी हुई दुनिया में समृद्धि और चुनौतियां साझा हैं, लेकिन संघर्षों और अनिश्चितताओं के दुष्परिणाम विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ पर असमान रूप से अधिक पड़ते हैं। यह स्थिति समन्वित वैश्विक कार्रवाई की मांग करती है। हमें मजबूत अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण, सतत विकास को गति देने और सभी के लिए लाभकारी समावेशी विकास सुनिश्चित करने हेतु बहुपक्षीय सहयोग को सु²ढ़ करना होगा।

वैश्विक असंतुलन के मुद्दे पर केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा, सभी प्रकार के असंतुलन एक जैसे नहीं होते। कुछ असंतुलन जनसंख्या के आकार-प्रकार में अंतर, विकास की अवस्था, संसाधनों की उपलब्धता या आर्थिक प्रणाली की भिन्नता को दर्शाते हैं। इसलिए हमारा ध्यान ऐसे संतुलनों पर होना चाहिए, जो बहुत अधिक है और लगातार बने रहने वाले हैं। सीतारमण ने साथ ही यह स्वीकार किये जाने पर भी बल दिया कि विभिन्न देशों की घरेलू आवश्यकताएं और इन आवश्यकताओं का स्तर में बड़ा भेद होता है। उन्होंने कहा, इन (वैश्विक) असंतुलनों को दूर करने का बोझ उन देशों पर असमान रूप से नहीं पडऩा चाहिए, जो इनके मूल कारण नहीं हैं। भारत, अन्य कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तरह, वैश्विक असंतुलनों की उत्पत्ति और प्रसार दोनों में अपेक्षाकृत सीमित भूमिका निभाता है, फिर भी हमें इनके दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है।

सीतारमण ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में हाल के वर्षों में भारत की उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति तथा रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म (सुधार , कार्य-प्रदर्शन और कायाकल्प) के मंत्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय अर्थव्यस्था अपनी आंतरिक मांग से चलती है तथा देश की मुद्रा की दर बाजार पर निभर करती और ऐसी परिस्थिति में भारत की वृद्धि दर ऊंची बनी हुई है। वित्त मंत्री ने कहा, हमारी आर्थिक वृद्धि मुख्यत: घरेलू मांग द्वारा संचालित है और हमारी विनिमय दर काफी हद तक बाजार द्वारा निर्धारित होती है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है और मध्यम अवधि में जीडीपी वृद्धि दर लगभग सात प्रतिशत के आसपास मजबूत रहने का अनुमान है। सीतारमण ने बहुपक्षीय संस्थानों में विश्वास को मजबूत करने तथा यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया कि वे विकासशील देशों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील बने रहें। उन्होंने ऐसे बेहतर, बड़े, अधिक प्रभावी और अधिक प्रतिनिधित्व वाले बहुपक्षीय विकास बैंकों की आवश्यकता बताई, जो विकासशील देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को कहीं अधिक वित्तीय सहायता प्रदान कर सकें। उन्होंने कहा कि इन संस्थानों की वित्तीय क्षमता, परिचालन दक्षता और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को बढ़ाना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

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केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि हाल के घटनाक्रमों ने विशेष रूप से महत्वपूर्ण खनिजों के लिए तगड़ी, विविधीकृत और भौगोलिक रूप से वितरित आपूर्ति श्रृंखलाओं के महत्व को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि पुनर्चक्रण पर आधारित अर्थव्यवस्था, पुनर्चक्रण और शहरी खनन पर ध्यान केंद्रित करके दुनिया जिन आपूर्ति-संबंधी चुनौतियों का सामूहिक रूप से सामना कर रही है, उनका समाधान किया जा सकता है। वित्त मंत्री ने कहा, भारत सभी साझेदार देशों के साथ मिलकर एक अधिक मजबूत, समावेशी और समृद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण तथा साझा विकास के लिए साझा समाधानों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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