मिशन वाम से राम: जमीनी नेताओं से संपर्क अभियान तेज, बंगाल में वामपंथी वोटों पर भाजपा की रणनीतिक घेराबंदी
बंगाल चुनाव 2026: 'लाल' किले में 'भगवा' सेंधमारी की तैयारी
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा वामपंथी वोट बैंक को साधने के लिए 'बूथ स्तर' पर सक्रिय है। पार्टी असंतुष्ट वाम कार्यकर्ताओं को "विचारधारा दिल में, वोट भाजपा को" के मंत्र से जोड़ रही है। 2019 के बाद गिरे वाम वोट शेयर का लाभ उठाकर भाजपा, तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने की रणनीतिक योजना पर काम कर रही है।
कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव एक बार फिर राम बनाम वाम के दिलचस्प राजनीतिक समीकरण की ओर बढ़ रहा है। भाजपा ने अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है कि तृणमूल को सत्ता से बेदखल करने के लिए वह वामपंथी वोट बैंक खासतौर पर जमीनी स्तर के निष्क्रिय कार्यकर्ताओं और समर्थकों को अपने पक्ष में लाने के लिए संगठित प्रयास कर रही है। इसके तहत बूथ स्तर तक पर्सनल कालिंग और घर-घर संपर्क जैसे अभियान तेज किए गए हैं। पार्टी रणनीतिकारों के अनुसार, वामपंथी समर्थकों का भाजपा को मौन समर्थन इस चुनाव में एक्स-फैक्टर साबित हो सकता है। भाजपा के लिए वाम वोट केवल संख्या नहीं, बल्कि सत्ता तक पहुंचने की रणनीतिक कुंजी साबित हो सकती है। भाजपा ने ऐसे वामपंथी कार्यकर्ताओं की पहचान शुरू की है, जो या तो सक्रिय राजनीति से दूर हैं या अपनी पार्टी से असंतुष्ट या निराश हैं। स्थानीय कार्यकतार्ओं को निर्देश दिया गया है कि वे इन मतदाताओं से सीधे संवाद स्थापित करें और उन्हें भाजपा के पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित करें। मतदाता सूची के विश्लेषण के आधार पर चल रहा यह अभियान सामान्य प्रचार से आगे बढ़कर व्यक्तिगत संपर्क पर केंद्रित हो गया है।
विचारधारा दिल में, वोट भाजपा को : प्रदेश अध्यक्ष
शमिक भट्टाचार्य ने परिवर्तन यात्रा के दौरान वाम समर्थकों से अपील की थी कि वे अपनी विचारधारा को कायम रखते हुए राज्यहित में भाजपा का साथ दें। पार्टी का तर्क है कि विपक्षी वोटों का बिखराव सत्ताधारी दल को सीधा फायदा पहुंचा सकता है। बंगाल में लाल से भगवा का यह झुकाव 2011 के बाद धीरे-धीरे उभरा। 2014 में वाम मोर्चा का वोट शेयर जहां करीब 30 प्रतिशत था, वहीं 2019 में यह घटकर लगभग 7.5 प्रतिशत रह गया। इसी दौरान भाजपा का वोट शेयर बढ़कर करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गया। 2021 के विधानसभा चुनाव में वाम दल खाता नहीं खोल सके, जबकि भाजपा 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बनकर उभरी। निचले स्तर पर एक नारा भी प्रचलित हुआ था, आगे राम, पोरे वाम, जो यह दर्शाता है कि तृणमूल के खिलाफ भाजपा को एक प्रभावी विकल्प के रूप में देखा गया।
कैडर ट्रांसफर का असर: वाम दलों की ताकत उनका संगठित कैडर रहा है। संगठन कमजोर होने के साथ ही इसका बड़ा हिस्सा या तो निष्क्रिय हुआ या भाजपा में शामिल हो गया। भाजपा अब उसी कैडर क्षमता का उपयोग कर रही है। खगेन मुर्मू और शंकर घोष जैसे नेताओं के उदाहरण को पार्टी निचले स्तर तक लागू करने की कोशिश कर रही है। चुनौती भी बरकरार: हालांकि, हालिया उपचुनावों और निकाय चुनावों में वाम वोटों की आंशिक वापसी के संकेत मिले हैं। वाम दल भी अपने आधार को पुनर्जीवित करने में जुटे हैं। ऐसे में भाजपा के लिए इस वोट बैंक को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। भाजपा के लिए वाम वोट केवल संख्या नहीं, बल्कि सत्ता तक पहुंचने की रणनीतिक कुंजी हैं। 2026 का चुनाव तय करेगा कि यह लाल से भगवा का रुझान स्थायी बदलाव बनता है या वामपंथ वापसी कर पाता है।

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