कौन है तस्लीमा नसरीन? जो 19 साल बाद पहुंची कोलकाता, हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच छोड़ना पड़ा था शहर
सेक्युलर मिशन ट्रस्ट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में होगी शामिल
कोलकाता। बांग्लादेशी मूल की लेखिका तस्लीमा नसरीन लगभग 19 वर्ष बाद एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए शुक्रवार को कोलकाता पहुंचीं। वर्ष 2007 में हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच शहर छोड़ने के लिए मजबूर होने के बाद यह उनकी पहली कोलकाता यात्रा है। नसरीन शनिवार शाम रवींद्र सदन में सेक्युलर मिशन ट्रस्ट की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होंगी। यह कार्यक्रम धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक कट्टरवाद के विरोध पर चर्चा करने के लिए कवियों, लेखकों और बुद्धिजीवियों को एक साथ लायेगा।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के इस कार्यक्रम में मौजूद रहने की संभावना है। शुक्रवार सुबह, नसरीन ने कोलकाता के लिए रवाना होते समय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पारंपरिक लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहने अपनी एक तस्वीर साझा की। बांग्ला में उन्होंने एक पोस्ट लिखा, "आज सुबह, मैंने कोलकाता के लिए अपनी यात्रा शुरू की।" लेखिका ने इससे पहले सोशल मीडिया पर घोषणा की थी कि वह 18 वर्ष, आठ महीने और 10 दिन बाद कोलकाता लौट रही हैं। शहर के कई हिस्सों में उनकी यात्रा की घोषणा करने वाले पोस्टर लगाये गये हैं।
नसरीन बांग्लादेश से निर्वासन के लगभग एक दशक बाद 2004 में कोलकाता आ गयी थीं। महिलाओं के अधिकारों पर उनके लेखन और धार्मिक उग्रवाद की आलोचना के कारण मिली जान से मारने की धमकियों और फतवों के बाद 1994 में उन्होंने बांग्लादेश छोड़ दिया था। उनके लेखन, विशेष रूप से उनकी आत्मकथात्मक कृति 'द्विखंडितो' के अंशों को लेकर मुस्लिम संगठनों के एक वर्ग की ओर से किये गये हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद हालांकि नवंबर 2007 में उन्होंने कोलकाता छोड़ दिया था।
अशांति के कारण व्यवस्था बहाल करने के लिए सेना की तैनाती करनी पड़ी, जिसके बाद तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने उनसे कोलकाता छोड़ने को कहा था और द्विखंडितो पर प्रतिबंध लगा दिया था। शुक्रवार को न्यू टाउन के इको पार्क में बोलते हुए पश्चिम बंगाल के मंत्री दिलीप घोष ने नसरीन की यात्रा का स्वागत किया और कहा कि कोलकाता हमेशा से दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करने वाला शहर रहा है।
घोष ने कहा, "कोलकाता दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करता है। यह सिटी ऑफ जॉय है। तृणमूल कांग्रेस और माकपा ने इस परंपरा को बाधित किया था। उनके शासनकाल में जो उनके पक्ष में बोलते थे, केवल वैसे चुनिंदा लोगों को ही यहां आने की अनुमति थी। आज सरकार बदल गयी है और लोकतंत्र कायम है। अगर कोई यहां किसी कार्यक्रम का आयोजन करने के लिए आना चाहता है या कोई उन्हें आमंत्रित करना चाहता है, तो उन्हें बस उचित प्रक्रिया के माध्यम से आवेदन करने की आवश्यकता है। यदि कोई आपत्ति या शिकायत नहीं है, तो सरकार निश्चित रूप से अनुमति देगी।"

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