नई शिक्षा नीति से सशक्त होती बेटियां
समाज में सम्मान
नई शिक्षा नीति बेटियों को चारदीवारी से निकालकर विश्व के मंच तक पहुंचा पाएगी, या फिर संसाधनों की कमी और सामाजिक सोच उनके रास्ते में फिर दीवार बन जाएगी।
नई शिक्षा नीति बेटियों को चारदीवारी से निकालकर विश्व के मंच तक पहुंचा पाएगी, या फिर संसाधनों की कमी और सामाजिक सोच उनके रास्ते में फिर दीवार बन जाएगी। भारत में शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली साधन रही है। नई शिक्षा नीति इसी परिवर्तन की बड़ी परिकल्पना लेकर आई। परंतु इस नीति को यदि सबसे संवेदनशील दृष्टि से देखा जाए, तो यह भारतीय बेटियों के भविष्य से गहराई से जुड़ी हुई दिखाई देती है। वर्षों से सामाजिक बंधन, आर्थिक सीमाएं, घरेलू जिम्मेदारियां और लैंगिक भेदभाव लड़कियों की शिक्षा में बाधा बनते रहे हैं।
उम्मीद की किरण है :
ऐसे में यह नीति केवल शैक्षिक सुधार नहीं, बल्कि उन लाखों बेटियों के लिए उम्मीद की किरण है, जो शिक्षा के सहारे अपने जीवन की दिशा बदलना चाहती हैं। नई संरचना और प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा पर दिया गया जोर बालिकाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अक्सर देखा गया है कि लड़कियां प्राथमिक स्तर से आगे नहीं बढ़ पातीं। अब खेल आधारित, गतिविधि आधारित और मातृभाषा में सीखने की प्रक्रिया उन्हें शिक्षा से जोड़कर रखने में सहायक हो सकती है।
क्रांतिकारी पहलू है :
जब पढ़ाई डर का विषय न होकर आनंद का अनुभव बनती है, तो परिवार भी बालिकाओं की शिक्षा के प्रति अधिक सकारात्मक होते हैं। प्रारंभिक साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर ध्यान उनकी बुनियाद को मजबूत करता है, जिससे आगे की शिक्षा उनके लिए सरल हो जाती है। इस नीति का सबसे क्रांतिकारी पहलू है लचीलापन। मल्टीपल एंट्री एग्ज़िट, विषय चयन की स्वतंत्रता और कौशल आधारित शिक्षा उन बालिकाओं के लिए वरदान साबित हो सकती है, जो विवाह, पारिवारिक जिम्मेदारियों या आर्थिक परिस्थितियों के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ देती थीं।
कौशल और व्यावसायिक :
अब वे अपनी सुविधा अनुसार शिक्षा को फिर से शुरू कर सकती हैं। यह व्यवस्था शिक्षा को एक बार मिलने वाला अवसर न बनाकर जीवनभर उपलब्ध रहने वाला अवसर बनाती है। कौशल और व्यावसायिक शिक्षा पर दिया गया जोर बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यमिता और तकनीकी दक्षता से जुड़ती है। डिजिटल कौशल, कंप्यूटर शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बना सकता है।
समाज में सम्मान :
यह आत्मनिर्भरता ही उन्हें समाज में सम्मान और निर्णय लेने की शक्ति देती है। डिजिटल शिक्षा ने नई संभावनाएं खोली हैं। ऑनलाइन कक्षाएं ई लर्निंग सामग्री और वर्चुअल संसाधन उन बालिकाओं तक शिक्षा पहुंचा सकते हैं, जो सामाजिक कारणों से स्कूल नहीं जा पातीं। पर यही डिजिटल विस्तार एक चुनौती भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और स्मार्ट उपकरणों की कमी का सबसे अधिक प्रभाव लड़कियों पर पड़ता है। कई घरों में यदि एक ही मोबाइल है, तो उसका उपयोग पहले लड़कों को मिलता है। यह डिजिटल विभाजन बेटियों के अवसरों को सीमित कर देता है।
शिक्षा का प्रावधान :
मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान बालिकाओं के लिए सहज सीख का माध्यम बनता है। वे अपनी भाषा में बेहतर समझ विकसित कर पाती हैं, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है। पर अभिभावकों की चिंता यह भी है कि अंग्रेजी की कमी भविष्य के अवसरों को सीमित कर सकती है। इस संतुलन को साधना नीति के सफल क्रियान्वयन की कुंजी है। आंकड़े बताते हैं कि प्राथमिक स्तर पर बालिकाओं का नामांकन बढ़ा है, पर माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर अब भी चिंता का विषय है।
नई शिक्षा नीति :
कम उम्र में विवाह, घरेलू कार्यों का बोझ, सुरक्षा की चिंता और आर्थिक दबाव बालिकाओं की शिक्षा को रोक देते हैं। नई शिक्षा नीति इन समस्याओं को कम करने का मार्ग दिखाती है, पर सामाजिक सोच में बदलाव के बिना इन लक्ष्यों को हासिल करना कठिन है। शिक्षा का असली अर्थ तब दिखाई देता है जब एक ग्रामीण बालिका पहली बार स्कूल की ड्रेस पहनकर अपने सपनों की ओर कदम बढ़ाती है। जब वह किताबों के साथ अपने भविष्य की कल्पना करती है। जब एक शिक्षक सीमित संसाधनों में भी उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
सशक्तिकरण का माध्यम :
जब परिवार उसे पढ़ने की अनुमति देता है,वहीं नई शिक्षा नीति का वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है। नई शिक्षा नीति बेटियों के लिए शिक्षा को अधिकार से आगे बढ़ाकर सशक्तिकरण का माध्यम बनाने की क्षमता रखती है। परंतु यह तभी संभव है, जब संसाधनों की उपलब्धता, डिजिटल पहुंच, प्रशिक्षित शिक्षक, सुरक्षित विद्यालय वातावरण और सबसे महत्वपूर्ण,सामाजिक सोच में बदलाव साथ आएं। यदि ये चुनौतियां दूर की जाएं, तो यह नीति भारतीय बेटियों को न केवल शिक्षित, बल्कि आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और सशक्त नागरिक बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभा सकती है।
-डॉ सुनिधि मिश्रा
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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