अलनीनो से निपटने के लिए साझा प्रयास की जरूरत
चक्रवाती जलवायु घटनायें
मौसम पर अलनीनो अपना असर हाल-फिलहाल छोड़ने वाला नहीं है। मौजूदा हालात तो यही संकेत दे रहे हैं। प्रशांत महासागर में जिस तरह गर्मी ने अलनीनो को इतना ताकतवर बना दिया है, जिसका असर अगले साल फरवरी से पहले खत्म नहीं होने वाला। हालात इसके सबूत हैं कि अगले महीनों तक तापमान और बारिश का मिजाज सामान्य रहने की उम्मीद बेमानी है। कहीं तेज बारिश, कहीं तेज गर्मी और कहीं बाढ़ के अलावा मौसमी घटनाओं ने इसका संकेत दे ही दिया है। इसका असर सर्दियों पर भी पड़ने की आशंका को झुठलाया नहीं जा सकता। डब्ल्यूएमओ के अनुसार प्रशांत महासागर में अगस्त महीने में तापमान सामान्य से 2.2 से 2.6 डिग्री ज्यादा हो गया। यही नहीं समुद्र की गहराई में भी कई हिस्सों में पानी सामान्य से आठ डिग्री ज्यादा गर्म पाया गया है। इसी गर्मी ने अलनीनो को और ताकत दी है। डब्ल्यूएमओ की मानें तो सितम्बर से लेकर नवम्बर महीने तक दुनिया के सभी हिस्सों में सामान्य से ज्यादा तापमान रहने की उम्मीद है।
अलनीनों का प्रभाव :
दरअसल, प्रशांत महासागर का पानी गर्म होने पर भारत की ओर आने वाली हवा का दबाव और उसकी दिशा में आये बदलाव से बादलों की आवाजाही पर और बारिश के रास्ते में भी बदलाव आता है। यही वह अहम कारण है कि प्रशांत महासागर में होने वाले बदलाव के चलते हजारों किलोमीटर दूर-दराज के भारत जैसे देशों के मौसम पर भी प्रभाव पड़ता है जबकि भारत में कम बारिश होने पर भी अलनीनों का प्रभाव बना रहता है या यूं कहें कि वह कम नहीं होता है। मानसूनी बारिश पर इसका स्पष्ट रूप से प्रभाव दिखाई दे रहा है। बीता अगस्त का महीना इसका जीता-जागता सबूत है कि इस महीने में सामान्य से भी 16 फीसदी कम बारिश हुयी और सितम्बर का पहला पखवाड़ा भी अगस्त की तरह ही रहा। यदि हिंद महासागर में विकसित होने वाले इंडियन ओशन डाईपोल यानी आईओडी आने वाले दिनों में पॉजिटिव हुआ तो अलनीनो की चपेट में आये मॉनसून को और नयी ताकत मिल जायेगी। यह भी कि अलनीनो से हवाओं की ताकत घटती है और बहुतेरे इलाकों में बारिश सामान्य से भी कम रह जाती है। यह भी कटु सत्य है कि भारत का मॉनसून अलनीनो से निर्धारित नहीं होता है।
महासागर की परिस्थितियां :
बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के इलाकों में मानसूनी टर्फ की स्थिति और हिन्द महासागर की परिस्थितियां भी बारिश की मात्रा और वितरण को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। कई बार कुल बारिश बहुत कम नहीं होती है लेकिन उसका समय और क्षेत्रीय वितरण असंतुलित हो जाता है। इससे देश के कई राज्यों में बोआई, अंकुरण और फसलों की शुरूआती बढ़ोतरी प्रभावित होती है। कई-कई बार तो ऐसा भी होता है कि मजबूत अलनीनो के दौरान भी देश के कुछ इलाकों में अधिक बारिश होती है। लेकिन यह आईओडी पर निर्भर करती है कि वह पाजिटिव रहता है या नहीं। अगर वह पॉजिटिव नहीं हुआ तो अलनीनो का दबाव और बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में बारिश सामान्य से भी कम रहने का खतरा बना रहेगा।
अलनीनो जैसी चक्रवाती जलवायु घटनायें जो हर तीन से सात साल में होती हैं, की पुनरावृत्ति अब जल्दी-जल्दी हो रही है, जो पूरी दुनिया में लगातार बड़ी मुश्किलें खड़ी कर रही है। इनका सर्वाधिक असर भूमध्यरेखा और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों पर पड़ता है। इनमें हमारे देश में मुख्यत: कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्य शामिल हैं, जिनपर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। इन राज्यों में ये घटनायें मॉनसून के मिजाज को काफी हदतक बिगाड़ देती हैं। ऐसी हालत में समय रहते चेतावनी देने वाले डेटा को आपस में बांटने, इसके लिए सीमाओं के पार एक पारदर्शी वैज्ञानिक सहयोग की बेहद जरूरत है।
चक्रवाती जलवायु घटनायें :
इतिहास हमें 1875-77 के उस महा अकाल की भीषण भयावह घटना की याद दिलाता है जो एक बेहद खतरनाक अलनीनो के कारण आया था। इस बाबत किये गये शोध और अध्ययन इस बात के प्रमाण हैं कि यह महा अकाल प्रशांत महासागर के शुरूआती ठंडे हालातों (1870-76), एक रिकार्ड तोड़ने वाले अलनीनो (1877-78), रिकार्ड स्तर पर मजबूत हिंद महासागर के द्विध्रुव ( 1877) और उत्तरी अटलांटिक महासागर के रिकार्ड गर्म होने के असाधारण तालमेल से जुड़ा हुआ था। अलनीनो को लेकर अब हमारी सरकार अलर्ट मोड पर है। लेकिन अलनीनो की बार-बार होतीं ये चक्रवाती जलवायु घटनायें समूची दुनिया को इस बात के लिए प्रेरित करती हैं कि वे अपने राजनैतिक मतभेदों से ऊपर उठकर खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता दें और आपदा प्रबंधन पर अत्याधिक निवेश करें। इस बाबत संयुक्त राष्ट्र का सेंडाई फ्रेमवर्क भी आपदा जोखिम को कम करने और वैश्विक विकास लक्ष्यों में जलवायु लचीलेपन को शामिल किये जाने पर खास जोर देता है। उसका मानना है कि वैश्विक पटल पर घटित ये घटनायें हमें एकसाथ मिलकर एक साझे भविष्य के निर्माण पर बल देती हैं। यह समय की मांग है।
-ज्ञानेन्द्र रावत
यह लेखक के अपने विचार हैं

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