पंच परिवर्तन से होगा राष्ट्र परिवर्तन
अधिकारों की बात
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने एक सौ साल पूरे होने के मौके पर आने वाले समय के लिए समाज में परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाया है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने एक सौ साल पूरे होने के मौके पर आने वाले समय के लिए समाज में परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाया है। संघ ने समाज में परिवर्तन के अपने दृष्टिकोण को पंच परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसके तहत लाखों स्वयंसेवक काम में जुटे हुए हैं। संघ की मान्यता है कि समाज में बड़ा बदलाव केवल कुछ लोगों के प्रयासों से नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की शक्ति से ही संभव है। यह ऐसा विचार है, जो समाज के जीवन में समयानुकूल परिवर्तन लाने की बात तो करता ही है, राष्ट्रहित में जीवन को ढालने का आग्रह भी इसमेंं है। अपने शताब्दी पर्व पर संघ ने समाज के सामने पंच परिवर्तन के जिस विचार को रखा है, वह केवल कोई नारा या अभियान नहीं है बल्कि इससे बढ़कर एक दीर्घकालिक सामाजिक संकल्प है।
पंच परिवर्तन :
संघ चालक मोहन भागवत बार-बार कह चुके हैं कि पंच परिवर्तन भारतीय समाज की दिशा और दशा तय करने वाले हैं। यह कथन केवल औपचारिकक भाषण का हिस्सा नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति है जो समाज की सामूहिक शक्ति पर भरोसा करता है। संघ का मानना है कि कुछ चुनिंदा लोग समाज को नहीं बदल सकते। समाज स्वयं जब बदलने का निश्चय करता है, तभी राष्ट्र बदलता है। सवाल उठता है कि आखिर पंच परिवर्तन क्या है, इसका उत्तर है कि इसमें देश का आमूलचूल परिवर्तन छिपा हुआ है। पंच परिवर्तन के पांच सूत्रों में सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी आचरण और नागरिक कर्तव्य को लिया गया है और ये सूत्र दरअसल आधुनिक भारत के सामने खड़ी जटिल चुनौतियों का समग्र उत्तर और समस्याओं का समाधान हैं।
सामाजिक समरसता :
हमें ये सूत्र अलग-अलग दिखते जरूर हैं, लेकिन भीतर से एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। किसी एक को नजरअंदाज करके दूसरे को साधा नहीं जा सकता। हमें सभी सूत्रों को एकरूपता में देखना होगा। अगर सबसे पहले सामाजिक समरसता की बात करें, तो देश की विविधता उसकी ताकत भी है और उसकी चुनौती भी है। संघ हमेशा से यह माननता आया है कि जब तक समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सौहार्द और अपनापन नहीं बढ़ेगा, तब तक विकसित भारत को यथार्थ रूप नहीं दिया जा सकता। सामाजिक समरसता बढ़ेगी तो व्यर्थ के विवादों से मुक्ति मिलेगी और ऊर्जा निर्माण में लगेगी, टकराव में जाया नहीं होगा। इसी प्रकार पर्यावरण संरक्षण आज किसी एक संगठन या देश का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानवता का सवाल बन चुका है। बढ़ता प्रदूषण, घटते जल-स्रोत और बिगड़ता पारिस्थितिक संतुलन सीधे-सीधे जन-स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।
संघ का कहना है :
पंच परिवर्तन सृष्टि को माता मानकर जीवन शैली में बदलाव की वकालत करता है। संघ का कहना है कि सृष्टि सभी प्राणियो की मां के समान है, जो हमारे जीवन का आधार है, लेकिन भौतिकतावादी जीवन शैली और उपभोग की अंधी दौड़ के कारण प्रकृति का निरंतर शोषण हुआ है। पश्चिमी विकास के चिंतन पर आधारित इस मॉडल ने मात्र पांच सौ सालों मेंं पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ कर रख दिया है। संघ पंच परिवर्तन के जरिए इसमें सुधार चाहता है और उसकी सोच केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि उस में उपभोग की आदतों पर पुनर्विचार का आग्रह है। इसी प्रकार स्वदेशी आचरण का सूत्र हमें हमारी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरणा देता है। संघ के लिए स्वदेशी की अवधारणा यह केवल आर्थिक नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक आत्म विश्वास का मुद्दा भी है।
रोजगार के अवसर :
स्वदेशी अपनाने से स्थानीय उद्योगों और कारीगरों को बल मिलता है, रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और आर्थिक असमानता कम करने की दिशा बनती है। आधुनिक जीवन की दौड़ में संयुक्त परिवार टूटे हैं, एकल परिवार बढ़े हैं और उसके साथ ही अकेलापन, तनाव और सामाजिक असुरक्षा में भी इजाफा हुआ है। संघ का मानना है कि परिवार केवल निजी इकाई नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण की पहली पाठशाला है। संस्कार, संवाद और स्रेह से भरा कुटुंब समाज को स्थिरता देता है। जब कुटुंब मजबूत होते हैं, तो समाज स्वत सशक्त होता है। एक सशक्त समाज से ही सशक्त देश की परिकल्पना साकार होती है। इसी प्रकार नागरिकों के कर्त्तव्य का विचार महत्वपूर्ण है।
अधिकारों की बात :
जब से देश आजाद हुआ है हम अपने अधिकारों की बात तो करते हैं, लेकिन कर्त्तव्यों से दूर होते जा रहे हैं। पंच परिवर्तन प्रत्येक नागरिक से जीवनशैली में स्वच्छता, अनुशासन, सेवा और कर्त्तव्य बोध के मूल्यों को उतारने पर जोर देते हैं। इसके जरिए संघ हर देशवासी को जिम्मेदार नागरिक बनाना चाहता है क्योंकि जिम्मेदार नागरिक ही मजबूत लोकतंत्र की नींव होते हैं। पीएम नरेन्द्र मोदी ने भी पंच परिवर्तन की पहल को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया है। उनका जोर इस बात पर है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ राष्ट्र और पर्यावरण का संतुलन भी बना रहे। यह दृष्टि शासन और समाज के बीच सेतु का काम कर सकती है।
-प्रो.महेश चंद गुप्ता
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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