प्राकृतिक खेती से बेहतर होगी धरती की सेहत
किसानों के बीच नई आशा जगाई
भारत की आत्मा गांवों में और गांवों की आत्मा किसान में बसती है।
भारत की आत्मा गांवों में और गांवों की आत्मा किसान में बसती है। किसान अन्नदाता होने के साथ ही प्रकृति और मानव जीवन के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। पिछले कुछ दशकों में देश की कृषि व्यवस्था ने उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का व्यापक उपयोग किया। इससे तत्काल उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन धीरे धीरे मिट्टी की उर्वरता, जल की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव दिखाई देने लगे। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग करने से भूमि की उत्पादकता घट रही है, खेती की लागत बढ़ रही है और किसान की आय अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ पा रही। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और धरती माता की सेहत बचाने का दिया गया आह्वान आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने का राष्ट्रीय संकल्प है। राजस्थान जैसे विशाल कृषि प्रधान राज्य के लिए यह संदेश और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
प्राकृतिक और जैविक विकल्प :
राजस्थान की पहचान मरुस्थल के साथ ही कठिन परिस्थितियों में भी कृषि और पशुपालन को जीवित रखने वाले मेहनतकश किसानों से है। यहां जल संकट, कम वर्षा, बढ़ती गर्मी और भूमि की क्षारीयता जैसी चुनौतियां पहले से मौजूद हैं। यदि ऐसे प्रदेश में अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों का उपयोग जारी रहा तो आने वाले वर्षों में मिट्टी की शक्ति और अधिक कमजोर हो सकती है। अब समय की मांग है कि किसान कम लागत, अधिक लाभ और स्वस्थ खेती की दिशा में आगे बढ़ें। हरित क्रांति के दौर में यूरिया, डीएपी और अन्य रासायनिक उर्वरकों को खेती का आधार माना गया। प्रारंभिक वर्षों में इससे उत्पादन बढ़ा, लेकिन लंबे समय तक अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी के प्राकृतिक पोषक तत्वों को असंतुलित कर दिया। आज किसान को हर वर्ष पहले से अधिक खाद डालनी पड़ती है, फिर भी उत्पादन स्थिर रहता है। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती कीमतों ने खेती की लागत को बढ़ाया है। प्राकृतिक और जैविक विकल्प न केवल मिट्टी की सेहत सुधारते हैं, बल्कि लंबे समय में लागत घटाने में भी सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
किसानों के बीच नई आशा जगाई :
राजस्थान में श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, कोटा, बूंदी, झालावाड़ जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक रासायनिक उपयोग के कारण भूमि और जल की गुणवत्ता प्रभावित होने की चिंताएं बढ़ी हैं। वहीं नागौर, सीकर, झुंझुनूं, बाड़मेर और जैसलमेर जैसे क्षेत्रों में जल की सीमित उपलब्धता के कारण टिकाऊ खेती की आवश्यकता महसूस की जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने अनेक अवसरों पर एक पेड़ मां के नाम के साथ साथ धरती मां को जहर से बचाने की बात की है। केंद्र सरकार प्राकृतिक खेती, गौ आधारित कृषि, नैनो यूरिया, जैविक खाद और ड्रोन आधारित संतुलित छिड़काव जैसी तकनीकों को बढ़ावा दे रही है। विशेष रूप से नैनो यूरिया ने किसानों के बीच नई आशा जगाई है। नैनो यूरिया कम मात्रा में अधिक प्रभावी साबित हो रहा है। इससे लागत भी घटती है और पर्यावरणीय नुकसान भी कम होता है।
सकारात्मक माहौल बन रहा है :
राजस्थान में भी अब प्राकृतिक खेती और जैविक कृषि को लेकर सकारात्मक माहौल बन रहा है। अनेक किसान गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट और देसी बीजों की ओर लौट रहे हैं। कई गांवों में किसान समूह बनाकर जैविक उत्पादों का विपणन कर बेहतर मूल्य प्राप्त कर रहे हैं। खेती फसल उगाने के साथ मिट्टी, जल, पशुधन और पर्यावरण को संतुलित रखने की जीवन पद्धति है। आज दुनिया फिर उसी दिशा में लौट रही है। यूरोप और अमेरिका सहित अनेक देशों में जैविक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। राजस्थान के किसान इस अवसर को समझकर वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना सकते हैं। राजस्थान के मोटे अनाज, बाजरा, मूंग, मैथी, जीरा और जैविक सब्जियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी संभावनाएं रखती हैं। राजस्थान में पशुधन की समृद्ध परंपरा रही है। यहां का ग्रामीण जीवन गाय, भैंस, ऊंट, भेड़ आदि पशुओं से गहराई से जुड़ा रहा है। यदि पशुपालन और प्राकृतिक खेती को एक साथ जोड़ा जाए तो किसान आत्मनिर्भर बन सकता है। गोबर और गौमूत्र आधारित खाद एवं जैविक घोल खेतों की उर्वरता बढ़ाने के साथ साथ रासायनिक निर्भरता कम कर सकते हैं। किसानों के लिए यह समझना भी आवश्यक है कि प्राकृतिक खेती उद्देश्य खेती को टिकाऊ, लाभकारी और स्वास्थ्यवर्धक बनाना है। शुरुआत में कुछ चुनौतियां आ सकती हैं, लेकिन धीरे धीरे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरने पर उत्पादन स्थिर और बेहतर होने लगता है। सबसे बड़ी बात यह कि खेती की लागत घटती है और किसान बाजार के महंगे रासायनिक उत्पादों पर कम निर्भर होता है।
प्रकृति के संतुलन को सुरक्षित रखें :
हमारे बुजुर्गों ने सदियों तक धरती को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि मातृस्वरूप मानकर उसकी सेवा और संरक्षण किया। उन्होंने खेती करते हुए भूमि की उर्वरता, जैविक संतुलन और प्राकृतिक संपदा को सहेजकर अगली पीढ़ियों को सौंपा। आज हमारा भी यही दायित्व है कि हम रासायनिक अंधाधुंध उपयोग से बचते हुए मिट्टी की शक्ति, उसकी जीवंतता और प्रकृति के संतुलन को सुरक्षित रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी समृद्ध और उपजाऊ धरती मिल सके। हम उस संस्कृति के वाहक हैं जो भूमि को केवल संसाधन नहीं, बल्कि पूजनीय तत्व मानती है। अतः धरती की रक्षा करना हमारे लिए कर्तव्य के साथ पवित्र उपासना भी है। यदि मिट्टी स्वस्थ रहेगी तो किसान समृद्ध रहेगा, गांव खुशहाल रहेंगे और देश सुखी रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी का यह आह्वान वास्तव में स्वस्थ धरती, स्वस्थ किसान और स्वस्थ भारत का मंत्र है। किसान भाइयों आइए, इस दिशा में आगे बढ़कर भावी पीढ़ियों के लिए उर्वर भूमि, स्वच्छ जल और सुरक्षित पर्यावरण के लिए कार्य करने का संकल्प लें। यह सच्चे अर्थों में राष्ट्रसेवा होगी और यही भारतीय कृषि की स्थायी समृद्धि का मार्ग भी होगा।
-भजनलाल शर्मा
मुख्यमंत्री, राजस्थान

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