बचपन में होने वाले रूमेटिक फीवर से भविष्य में 30 से 40 प्रतिशत लोगों को वॉल्व की बीमारी, दो दिवसीय इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस स्ट्रक्चरल इंडिया समिट 2026 में डॉक्टर्स ने दी जानकारी
मरीजों को वॉल्व रिपेयर या रिप्लेसमेंट की सर्जरी करवानी पड़ती है
बचपन में होने वाला रूमेटिक फीवर भारत जैसे देशों के लिए अब भी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है। साधारण गले के संक्रमण से शुरू होकर यह बीमारी धीरे-धीरे दिल के वॉल्व को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है।
जयपुर। बचपन में होने वाला रूमेटिक फीवर भारत जैसे देशों के लिए अब भी गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है। साधारण गले के संक्रमण से शुरू होकर यह बीमारी धीरे-धीरे दिल के वॉल्व को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है। समय पर सही इलाज न मिले तो आगे चलकर हार्ट वॉल्व की जटिल बीमारी विकसित हो जाती है। शहर में आयोजित हुई दो दिवसीय इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस “स्ट्रक्चरल इंडिया समिट 2026” में देश विदेश से आए एक्सपर्ट्स ने यह जानकारी दी। “टावर मास्टर क्लास” में देश के अलग अलग हिस्सों से आए कार्डियोलॉजी के डॉक्टर्स ने स्कूल क्लास की तरह इंटरनेशनल फैकल्टी से हार्ट वॉल्व की बारीकियां समझीं।
कॉन्फ्रेंस के कोर्स डायरेक्टर डॉ. प्रशांत द्विवेदी ने बताया कि इटर्नल हॉस्पिटल के तत्वाधान में आयोजित इस कॉन्फ्रेंस के पहले दिन मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. समीन शर्मा ने टावर तकनीक से होने वाले वॉल्व रिप्लेसमेंट प्रोसीजर और सर्जरी के मुकाबले इसके परिणामों के बारे में बताया। इसके बाद सीनियर कार्डियक सर्जन डॉ. अजीत बाना ने एनिमल हार्ट में वॉल्व की संरचना और प्रोसीजर में ध्यान देने वालीं बातों की जानकारी दी। कोर्स डायरेक्टर डॉ. प्रेम रतन डेगावत ने बताया कि फ्लोरोस्कोपिक एओर्टिक वॉल्व एनाटॉमी (3डी मॉडल पर) विषय पर डॉ. मनोज गोदारा ने, प्री, इंट्रा और पोस्ट टीएवीआर के दौरान इको में किन बातों पर ध्यान दें विषय पर डॉ. हेमंत चतुर्वेदी ने अपने अनुभव साझा किए। इसके अलावा डॉ. अन्नपूर्णा किनी, डॉ. परासुराम कृष्णमूर्ति, डॉ. गिल्बर्ट टैंग, डॉ. साहिल खेरा, डॉ. राजीव मेनन आदि ने भी अपनी रिसर्च साझा की।
अमेरिका से आए डॉ. परासुराम कृष्णमूर्ति ने बताया कि बचपन में होने वाले रूमेटिक फीवर, भविष्य में हार्ट वॉल्व की गंभीर बीमारियों का कारण बनती हैं। गले के संक्रमण से शुरू होकर आगे चलकर दिल के वॉल्व को स्थायी नुकसान पहुँचाने वाली यह बीमारी हमारे लिए बड़ी चुनौती है। हर साल लगभग तीन लाख मौतें इसी कारण होती हैं। जिन बच्चों को बार-बार गले का संक्रमण और रूमेटिक फीवर होता है, उनमें से लगभग 30 से 40 प्रतिशत को आगे चलकर हार्ट वॉल्व की बीमारी हो जाती है। इस बीमारी से सबसे ज्यादा माइट्रल वॉल्व को प्रभावित करता है और उसके बाद एओर्टिक वॉल्व पर असर डालता है। कई मामलों में मरीजों को वॉल्व रिपेयर या रिप्लेसमेंट की सर्जरी करवानी पड़ती है।

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