आधुनिक चिकित्सा से सशक्तीकरण की ओर
तेज ध्वनि और प्रदूषण से बचाव
प्रतिवर्ष 25 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय कॉक्लियर इम्प्लांट दिवस मनाया जाता है।
प्रतिवर्ष 25 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय कॉक्लियर इम्प्लांट दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य श्रवण बाधित व्यक्तियों के लिए कॉक्लियर इम्प्लांट तकनीक के प्रति जागरूकता बढ़ाना और समाज में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करना है। यह दिन चिकित्सा इतिहास की एक ऐतिहासिक उपलब्धि की याद दिलाता है। दरअसल, 25 फरवरी 1957 को फ्रांसीसी चिकित्सक ने विश्व का पहला सफल कॉक्लियर इम्प्लांट प्रत्यारोपित किया था। उस समय यह एक प्रयोगात्मक प्रयास था, किंतु आज यह तकनीक लाखों लोगों के जीवन में नई ध्वनि, नई आशा और नया आत्मविश्वास भर रही है। कॉक्लियर इम्प्लांट एक उन्नत इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जिसे शल्य चिकित्सा के माध्यम से कान के भीतरी भाग कोक्लिया में स्थापित किया जाता है। सामान्यतः ध्वनि तरंगें कान के पर्दे से होकर मध्य कान के जरिए आंतरिक कान तक पहुंचती हैं और वहां से श्रवण तंत्रिका के माध्यम से मस्तिष्क तक संदेश पहुंचता है। किंतु जिन लोगों में आंतरिक कान की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होती हैं, उनके लिए साधारण हियरिंग एड पर्याप्त नहीं होते। ऐसे में कॉक्लियर इम्प्लांट सीधे श्रवण तंत्रिका को विद्युत संकेतों द्वारा उत्तेजित करता है, जिससे व्यक्ति ध्वनि का अनुभव कर पाता है।
दिवस का प्रमुख उद्देश्य :
इस दिवस का एक प्रमुख उद्देश्य समाज में प्रचलित मिथकों को तोड़ना भी है। अक्सर यह धारणा बनी रहती है कि जन्मजात मूक-बधिर बच्चे कभी सुन या बोल नहीं सकते। जबकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि समय पर पहचान और उचित हस्तक्षेप से यह संभव है। कॉक्लियर इम्प्लांट केवल एक चिकित्सकीय उपकरण नहीं, बल्कि सामाजिक सशक्तीकरण का माध्यम है। यह प्रभावित व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सहभागिता के अवसर प्रदान करता है। इस दिवस के माध्यम से सरकारों और स्वास्थ्य संस्थाओं का ध्यान भी इस दिशा में आकृष्ट किया जाता है कि यह तकनीक अधिक से अधिक लोगों के लिए सुलभ और किफायती बने। वर्तमान समय में श्रवण हानि एक गंभीर वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार विश्वभर में लगभग 43 करोड़ लोग मध्यम से गंभीर श्रवण हानि से प्रभावित हैं, जिनमें करोड़ों बच्चे शामिल हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो वर्ष 2050 तक यह संख्या 70 करोड़ से अधिक हो सकती है।
डब्ल्यूएचओ की वैश्विक रिपोर्ट :
डब्ल्यूएचओ की वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक लगभग 2.5 अरब लोग किसी न किसी स्तर की श्रवण क्षति का सामना कर सकते हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक चार में से एक व्यक्ति इस समस्या से प्रभावित हो सकता है। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है, बल्कि इस दिशा में त्वरित और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। भारत में भी श्रवण संबंधी समस्याएं व्यापक हैं। अनुमानतः 6 से 7 करोड़ लोग किसी न किसी प्रकार की श्रवण अक्षमता से जूझ रहे हैं। प्रतिवर्ष लगभग 27,000 से अधिक बच्चे जन्मजात बधिरता के साथ जन्म लेते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, जागरूकता का अभाव और आर्थिक सीमाएं इस समस्या को और जटिल बना देती हैं। हालांकि भारत सरकार द्वारा नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग, टीकाकरण कार्यक्रम और सहायक उपकरणों की उपलब्धता के प्रयास किए जा रहे हैं, फिर भी व्यापक स्तर पर जागरूकता और संसाधनों की आवश्यकता बनी हुई है।
सामाजिक और शैक्षिक प्रभाव :
श्रवण बाधा केवल सुनने की क्षमता तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के सामाजिक, शैक्षिक और भावनात्मक विकास को भी प्रभावित करती है। सुनने में कठिनाई के कारण बच्चों में भाषा विकास बाधित होता है, जिससे शिक्षा में पिछड़ने की आशंका बढ़ जाती है। वयस्कों के लिए यह रोजगार और सामाजिक संबंधों में अवरोध उत्पन्न कर सकती है। अक्सर श्रवण बाधित व्यक्ति आत्मविश्वास की कमी, सामाजिक अलगाव और मानसिक तनाव का अनुभव करते हैं। इसलिए आवश्यक है कि समाज सहानुभूति के साथ-साथ सहयोग और समावेशी दृष्टिकोण अपनाए। श्रवण हानि के निवारण और सुधार के लिए समय पर पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण है। गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल, नवजात शिशुओं की सुनने की जांच, नियमित टीकाकरण और कान के संक्रमण का समय पर उपचार कई मामलों में श्रवण हानि को रोक सकता है।
तेज ध्वनि और प्रदूषण से बचाव :
तेज ध्वनि और प्रदूषण से बचाव भी अत्यंत आवश्यक है। लंबे समय तक ऊंची आवाज़ में संगीत सुनना या औद्योगिक शोर के संपर्क में रहना श्रवण क्षमता को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त कर सकता है। जिन व्यक्तियों को श्रवण हानि है, उनके लिए हियरिंग एड, कॉक्लियर इम्प्लांट, स्पीच थेरेपी और सांकेतिक भाषा अत्यंत उपयोगी साधन हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, यदि समय पर उचित हस्तक्षेप किया जाए तो अनेक मामलों में श्रवण हानि को रोका या कम किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण है नवजात शिशुओं की अनिवार्य स्क्रीनिंग। जन्म के तुरंत बाद श्रवण जांच से समस्या की शीघ्र पहचान संभव है, जिससे प्रारंभिक अवस्था में उपचार शुरू किया जा सके। यही कदम बच्चे के भविष्य को संवार सकता है। अंतरराष्ट्रीय कॉक्लियर इम्प्लांट दिवस हमें यह संदेश देता है कि आधुनिक विज्ञान ने श्रवण अक्षमता को एक असाध्य बाधा से उपचार योग्य स्थिति में परिवर्तित कर दिया है। आज आवश्यकता केवल सहानुभूति की नहीं, बल्कि सशक्तीकरण की है। सही समय पर पहचान, आधुनिक तकनीक का उपयोग श्रवण बाधित व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा में स्थापित कर सकते हैं।
-सुनील कुमार महला
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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