महिला दिवस पर विशेष : राजस्थान की बेटी पर समाज का फैसला, पढ़ाई हां; आजादी आधी
समाज का रवैया
राजस्थान की महिलाएँ अब घर की चौखट से निकलकर बैंक, समूह, मोबाइल और शिक्षा तक पहुँच चुकी हैं। साक्षरता बढ़ी है, खाते खुले हैं, मोबाइल हाथ में है—लेकिन बराबरी अभी अधूरी है। समाज कहता है, “पढ़ो और आगे बढ़ो”, पर जब बात आज़ादी, करियर और देर से शादी की आती है तो कदम ठिठक जाते हैं।
जयपुर। राजस्थान की महिला अब सिर्फ़ आँगन की परिक्रमा नहीं करती; वह बैंक की लाइन में भी है, समूह की बैठक में भी, मोबाइल की स्क्रीन पर भी और घर और किताब में भी। यह वही धरती है जहाँ बेटी की पढ़ाई को अब खुला विरोध कम मिलता है, पर उसके पंखों की लंबाई पर अब भी घर-घर की अलग माप है। आँकड़े बताते हैं कि बदलाव आया है, और खूब आया है—लेकिन आधा। लड़की को पढ़ाओ, यह बात समाज मानने लगा है; लड़की को अपने हिसाब से जीने दो, यहाँ आकर आवाज धीमी पड़ जाती है। राजस्थान की स्त्री ने चाल तेज की है, लेकिन रास्ते पर अब भी अदृश्य बैरिकेड खड़े हैं।
समाज का रवैया
राजस्थान में लड़कियों को लेकर समाज का रवैया अब वैसा सपाट नहीं रहा जैसा कभी था। पढ़ाई की खिड़की खुली है, मगर पूरी छत अभी नहीं खुली। राज्य में 15 वर्ष और उससे ऊपर की 64.7% महिलाएं साक्षर हैं, लेकिन पुरुषों में यही अनुपात 88.9% है। और जब बात लंबी पढ़ाई की आती है, तो तस्वीर और साफ हो जाती है—10 या उससे अधिक वर्ष की स्कूली शिक्षा केवल 33.4% महिलाओं के पास है, जबकि पुरुषों में यह 51.9% है।
पढ़ेगी, लेकिन कितनी दूर तक
राजस्थान की लड़कियों की कहानी अब ‘पढ़ेगी या नहीं’ से आगे बढ़कर ‘कितनी दूर तक पढ़ेगी’ का सवाल है। घरों में अब यह वाक्य ज्यादा सुनाई देता है कि लड़की को पढ़ाना चाहिए, लेकिन पढ़ाई का असली इम्तहान तब आता है जब कॉलेज दूसरे शहर में हो, कोचिंग देर शाम तक चले, या नौकरी पढ़ाई के बाद शादी की टाइमलाइन बिगाड़ दे। आँकड़ों में यह झिझक सीधे नहीं दिखती, लेकिन उसका साया साफ दिखता है—क्योंकि शिक्षा की रेखा जहाँ ऊपर जाती है, वहीं शादी की रस्सी उसे नीचे खींचती रहती है। राजस्थान में 20-24 वर्ष की 25.4% महिलाएँ 18 वर्ष से पहले विवाह के दायरे में आ चुकी थीं। यानी हर चार में लगभग एक बेटी की जिÞंदगी पर वयस्क होने से पहले ही सामाजिक मुहर लगा दी गई।
डिजिटल दुनिया में भी राजस्थान की लड़कियाँ आधी खुली खिड़की के सामने खड़ी है। एक तरफ 79.6% महिलाओं के पास ऐसा बैंक या बचत खाता है, जिसे वे खुद इस्तेमाल करती हैं—यह बहुत बड़ा बदलाव है। दूसरी तरफ 65.5% महिलाओं के पास अपना मोबाइल है, लेकिन इंटरनेट की दुनिया में प्रवेश करते-करते भीड़ छँट जाती है: सिर्फ़ 36.9% महिलाओं ने कभी इंटरनेट इस्तेमाल किया, जबकि पुरुषों में यह अनुपात 65.2% है। यह वही जगह है जहाँ कहानी सबसे ज्यादा दिलचस्प भी है और सबसे ज्यादा बेचैन करने वाली भी। जेब में मोबाइल आ गया, खाते में नाम जुड़ गया, लेकिन स्क्रीन पर दुनिया अब भी पूरी नहीं खुली।
यानी कुल मिलाकर राजस्थान की बेटी पर समाज का फैसला कुछ ऐसा है: पढ़ो, मगर बहुत उड़ो मत। कमाओ, मगर नियंत्रण साझा रहे। मोबाइल रखो, मगर दुनिया सीमित हो। घर संभालो, बचत करो, समूह चलाओ—लेकिन जीवन की पूरी पटकथा अभी अपने हाथ में मत लो। यही इस पूरी कहानी की धड़कन है।

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