इन्सुलिन एक्सेस विषय पर WHO SEARO ऑफिस में हुई स्टेटहोल्डर मीटिंग, डॉ. तोमर- मधुमेह से जूझती दुनिया के लिए इन्सुलिन सिर्फ़ दवा नहीं, जीवन की डोर हैं 

एक गंभीर वैश्विक विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी 

इन्सुलिन एक्सेस विषय पर WHO SEARO ऑफिस में हुई स्टेटहोल्डर मीटिंग, डॉ. तोमर- मधुमेह से जूझती दुनिया के लिए इन्सुलिन सिर्फ़ दवा नहीं, जीवन की डोर हैं 

WHO SEARO कार्यालय में “इंसुलिन एक्सेस के लिए नीति और कूटनीति” विषय पर उच्च स्तरीय बैठक हुई। विशेषज्ञों ने मधुमेह के बढ़ते वैश्विक संकट के बीच इंसुलिन की असमान उपलब्धता पर चिंता जताई। प्रो. डॉ. बलवीर सिंह तोमर ने अंतर-क्षेत्रीय सहयोग और हेल्थ डिप्लोमेसी से लागत घटाकर समान पहुंच सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

जयपुर। इंसुलिन की खोज को एक सदी से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी आज भी दुनिया भर में करोड़ों लोगों के लिए यह जीवनरक्षक दवा समान रूप से उपलब्ध नहीं है। इसी गंभीर वैश्विक चुनौती को केंद्र में रखते हुए निम्स इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ एंड गवर्नेंस द्वारा “इंसुलिन एक्सेस के लिए नीति और कूटनीति” विषय पर एक उच्च स्तरीय स्टेकहोल्डर मीटिंग का WHO SEARO के दिल्ली स्थित ऑफिस में आयोजन किया गया। इस संवाद में देश–विदेश के नीति विशेषज्ञों, ग्लोबल हेल्थ लीडर्स, शिक्षाविदों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में प्रो. डॉ. बलवीर सिंह तोमर, संस्थापक एवं चांसलर, निम्स यूनिवर्सिटी राजस्थान ने कहा की “इंसुलिन तक समान पहुँच केवल स्वास्थ्य मंत्रालय या डॉक्टरों की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, उद्योग, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिक समाज के बीच मजबूत अंतर-क्षेत्रीय सहयोग आवश्यक है। जब तक हम सामूहिक नेतृत्व और साझा उत्तरदायित्व की भावना से काम नहीं करेंगे, तब तक यह जीवनरक्षक दवा हर जरूरतमंद तक नहीं पहुँच पाएगी।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हेल्थ डिप्लोमेसी के माध्यम से देशों के बीच सहयोग बढ़ाकर, साझा निर्माण क्षमता और नॉलेज एक्सचेंज से इंसुलिन की लागत को कम किया जा सकता है।

बढ़ता मधुमेह संकट और इंसुलिन की असमान उपलब्धता :

आज मधुमेह (डायबिटीज़) केवल एक बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर वैश्विक विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। विश्व स्तर पर लगभग 83 करोड़ लोग मधुमेह से प्रभावित हैं, जो 1990 की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इसका बोझ निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है, जहाँ स्वास्थ्य प्रणालियाँ पहले से ही संक्रामक रोगों, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य समस्याओं और संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं।

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वर्ष 2022–23 के दौरान मधुमेह और इससे संबंधित किडनी रोगों के कारण 20 लाख से अधिक मौतें दर्ज की गईं। उच्च रक्त शर्करा, हृदय रोगों से होने वाली मृत्यु का भी एक प्रमुख कारण बना हुआ है। टाइप-1 मधुमेह से पीड़ित सभी लोगों के लिए इंसुलिन अनिवार्य है, जबकि टाइप-2 मधुमेह से ग्रस्त करोड़ों लोगों के लिए भी यह जीवन को सुरक्षित रखने में अत्यंत आवश्यक है। इसके बावजूद, अनुमान बताते हैं कि टाइप-2 मधुमेह के लगभग आधे मरीजों को नियमित रूप से इंसुलिन उपलब्ध नहीं हो पाती, जिसका मुख्य कारण महँगी कीमतें, आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियाँ और नीति स्तर पर अपर्याप्त प्राथमिकता है।

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