विश्व विटिलिगो दिवस : विटिलिगो संक्रामक नहीं बल्कि त्वचा से जुड़ा रोग, जागरूकता और संवेदनशीलता की जरूरत
समय पर उपचार से काफी हद तक इलाज संभव
जयपुर। हर वर्ष 25 जून को विश्व विटिलिगो दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य विटिलिगो यानी सफेद दाग के प्रति समाज में जागरुकता बढ़ाना, इससे जुड़ी गलत धारणाओं को दूर करना और प्रभावित लोगों को सम्मान और आत्मविश्वास के साथ जीवन जीने के लिए प्रेरित करना है। राजस्थान अस्पताल के त्वचा एवं रति रोग विशेषज्ञ डॉ. दिनेश माथुर ने बताया कि विटिलिगो एक दीर्घकालिक त्वचा रोग है, जिसमें त्वचा को रंग देने वाली मेलानोसाइट्स कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं या काम करना बंद कर देती हैं। इसके कारण शरीर पर दूधिया-सफेद धब्बे दिखाई देने लगते हैं। ये धब्बे चेहरे, हाथ-पैर, होंठ, सिर की त्वचा और शरीर के अन्य हिस्सों पर हो सकते हैं।
संक्रामक रोग नहीं है विटिलिगो
डॉ. माथुर ने बताया कि विटिलिगो किसी भी तरह से संक्रामक नहीं है। यह छूने, साथ बैठने, भोजन साझा करने या सामान्य संपर्क से नहीं फैलता। इसके बावजूद समाज में आज भी इसे लेकर कई भ्रांतियां मौजूद हैं, जिनके कारण रोगियों को मानसिक तनाव और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। विटिलिगो के पीछे मुख्य रूप से ऑटोइम्यून कारण जिम्मेदार होते हैं। इसके अलावा आनुवंशिक कारण, ऑक्सीडेटिव तनाव, त्वचा पर चोट, अत्यधिक धूप और मानसिक तनाव भी इसकी शुरुआत या बढ़ोतरी में भूमिका निभा सकते हैं।
समय पर उपचार जरूरी
डॉ. माथुर ने बताया कि विटिलिगो का निदान त्वचा विशेषज्ञ जांच, वुड्स लैम्प परीक्षण और आवश्यक रक्त जांच के माध्यम से किया जाता है। उपचार में त्वचा पर लगाने वाली दवाएं, नैरो बैंड यूवी-बी फोटोथेरेपी, एक्साइमर लेजर और कुछ मामलों में सर्जिकल तकनीकों का उपयोग किया जाता है। हाल के वर्षों में रक्सोलिटिनिब क्रीम और जेक इनहिबिटर जैसी नई उपचार पद्धतियों पर भी सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
मिथकों से बचें, वैज्ञानिक सोच अपनाएं
डॉ. माथुर स्पष्ट करते हैं कि दूध और मछली एक साथ खाने या किसी विशेष खाद्य संयोजन से विटिलिगो होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। संतुलित आहार, नियमित सनस्क्रीन का उपयोग, तनाव प्रबंधन और त्वचा की सुरक्षा रोग नियंत्रण में सहायक हो सकते हैं।

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