राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : नाबालिग की भूलें आजीविका में बाधा नहीं बनेंगी, कहा- किशोरावस्था की गलतियों को आजीवन कलंक की तरह नहीं देखा जाना चाहिए

दिव्यांग युवक की नौकरी बहाल करने के दिए निर्देश

राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : नाबालिग की भूलें आजीविका में बाधा नहीं बनेंगी, कहा- किशोरावस्था की गलतियों को आजीवन कलंक की तरह नहीं देखा जाना चाहिए

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि नाबालिग अवस्था में हुए मामूली अपराधों के आधार पर किसी व्यक्ति की नौकरी नहीं छीनी जा सकती। अदालत ने कहा कि किशोरावस्था की गलतियों को आजीवन कलंक की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। खासकर तब जब उन अपराधों का पद की प्रकृति, नैतिक अधमता या सार्वजनिक सुरक्षा से कोई सीधा संबंध न हो।

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि नाबालिग अवस्था में हुए मामूली अपराधों के आधार पर किसी व्यक्ति की नौकरी नहीं छीनी जा सकती। अदालत ने कहा कि किशोरावस्था की गलतियों को आजीवन कलंक की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। खासकर तब जब उन अपराधों का पद की प्रकृति, नैतिक अधमता या सार्वजनिक सुरक्षा से कोई सीधा संबंध न हो। डॉ. जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने नगर पालिका रावतसर, जिला हनुमानगढ़ में सफाईकर्मी पद पर नियुक्त एक दिव्यांग युवक की सेवा समाप्ति को रद्द करते हुए उसकी नौकरी बहाल करने का आदेश दिया। साथ ही एकलपीठ के पूर्व आदेश को निरस्त कर दिया गया। अधिवक्ता दुर्गेश खत्री ने बताया कि हनुमानगढ़ निवासी श्रवण का चयन नगर पालिका रावतसर में सफाईकर्मी पद पर हुआ था। वह 70 प्रतिशत स्थायी बौनेपन से पीड़ित है। चयन के बाद 14 जुलाई, 2018 को उसे नियुक्ति आदेश जारी हुआ, जिसमें पुलिस सत्यापन संतोषजनक होने की शर्त थी। सत्यापन के दौरान सामने आया कि उसके खिलाफ पूर्व में चार आपराधिक मामले दर्ज रहे थे।

इनमें तीन मामलों में राजस्थान सार्वजनिक जुआ अधिनियम के तहत दोषसिद्धि और एक मामले में आबकारी अधिनियम के तहत बरी किया जाना शामिल था। इन्हीं आधारों पर 24 अगस्त 2018 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि सभी मामले नाबालिग अवस्था के थे और अत्यंत तुच्छ प्रकृति के थे। जिनका नौकरी से कोई सीधा संबंध नहीं था। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के अवतारसिंह बनाम भारत संघ (2016) के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि मामूली अपराधों में तथ्यों के दमन मात्र से नियुक्ति स्वत: रद्द नहीं की जा सकती। अदालत ने रेखांकित किया कि अपीलकर्ता एक दिव्यांग व्यक्ति है और उसके लिए नौकरी सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण साधन है। किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 19 का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि नाबालिग द्वारा किए गए अपराध भविष्य में अयोग्यता का कारण नहीं बनने चाहिए। अदालत ने नियुक्ति बहाल करने का आदेश दिया।  

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