ऑटोमोबाइल, पेट्रोलियम और इंश्योरेंस कम्पनियों के चक्रव्यूह में फंसा उपभोक्ता, वर्कशॉप पहुंच रही डेमेज लग्जरी कारें

बीएस-6 लग्जरी कारों में रोजाना आ रहे तीन से चार खराबी के मामले

ऑटोमोबाइल, पेट्रोलियम और इंश्योरेंस कम्पनियों के चक्रव्यूह में फंसा उपभोक्ता, वर्कशॉप पहुंच रही डेमेज लग्जरी कारें
कैटेलिक कन्वर्टर, फ्यूल पम्प और आॅक्सीजन सेंसर डेमेज होने का मामला, पेट्रोल क्वालिटी जांचने का कोई तरीका ही नहीं।

कोटा। आधुनिक तकनीक से लैस बीएस-6 श्रेणी की लग्जरी कारों के डेमेज होते महंगे इंजन पार्ट्स उपभोक्ताओं की कमर तोड़ रहा है। कार कंपनियों के वर्कशॉप में प्रतिदिन तीन से चार ऐसे मामले पहुंच रहे हैं, जिनमें कैटेलिक कन्वर्टर, फ्यूल पम्प और आॅक्सीजन सेंसर समेत इंजन से जुड़े महत्वपूर्ण पार्ट्स डेमेज मिले हैं। हैरानी की बात यह है, सितम्बर माह से ही इन मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। वर्कशॉप मैनेजर और आॅटोमोबाइल तकनीशियन इसकी संभावित वजह पेट्रोल में मिलावट व ईंधन की गुणवत्ता में खामी मान रहे हैं। वहीं, पेट्रोल पम्प संचालक मेन्यूफेक्चरिंग डिफेक्ट बता रहे। हालांकि, इसकी पुष्टि के लिए अब तक कोई स्वतंत्र जांच सामने नहीं आई है।

हालात यह हैं कि वाहन मालिकों के पास पेट्रोल की गुणवत्ता की सार्वजनिक रूप से जांच करवाने की कोई व्यवस्था नहीं है। पेट्रोलियम कंपनियों की अपनी लैब तो हैं, लेकिन वहां उपभोक्ता खुद पेट्रोल का नमूना लेकर जांच नहीं करवा सकते। दूसरी तरफ, वाहन मालिकों, शोरूम संचालक व वर्कशॉप इंचार्ज के आरोप है कि घटिया गुणवत्ता के ईंधन से महंगे इंजन पार्ट्स खराब हो रहे हैं। ऐसे में पेट्रोल की गुणवत्ता, पेट्रोल पम्पों के भूमिगत टैंकों की सफाई और इंजन खराब होने पर बीमा क्लेम पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

प्रतिदिन आ रहे तीन से चार केस
कार कम्पनियों के वर्कशॉप सर्विस मैनेजर्स ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कैटेलिक कन्वटर्ड सहित फ्यूल पम्प और आॅक्सीजन सेंसर के डेमेज होने के तीन से चार मामले प्रतिदिन आ रहे हैं। यह केस सितम्बर माह से अधिक आने लगे हैं। बीएस-6 श्रैणी के वाहनों में जो कैटेलिक कंवटर्ड आता है, उसमें बहुत महीन छेद होते हैं, जिसमें से हानिकारक गैसें फिलटर होकर साइलेंसर के माध्यम से बाहर निकलती है। इससे पर्यावरण को बहुत कम नुकसान पहुंचता है। इन छेदों में सफेद पाउडरनुमा कण भारी मात्रा में जम जाते हैं। यह प्रोब्लम क्यों आ रही, इसका वास्तविक कारण तो हम भी नहीं समझ पा रहे। हालांकि, फ्यूल कंटामिनेशन की संभावना प्रबल लगती है।

कारों में यह आ रही समस्या
-इंजन का जाम होना
-चेक इंजन लाइट में बर्निंग वॉर्निंग आना
-चलती गाड़ी में तेज झटके लगना
-टायर व लाइनर जाम होना
-इंजन सीज होने तक का खतरा
-हादसे की आशंका बनी रहती है

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पेट्रोल क्वालिटी जांच करवाने की सुविधा भी नहीं
पेट्रोल कॉर्पोरेशन से जुड़े लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, फ्यूल की क्वालिटी चेक करने की कोई व्यवस्था नहीं है। शहर में ऐसी कोई लैब नहीं है, जहां उपभोक्ता पेट्रोल की गुणवत्ता परखने के लिए जांच करवा सके। हलांकि, ताथेड़ रोड पर बीपीसी की लैब है, लेकिन वहां उपभोक्ता खुद सैंपल लेकर जांच नहीं करवा सकता। कम्पनी खुद अपने स्तर पर करती है। शहरवासी, लोकेश, अक्षय आहूजा, गोपाल का आरोप है कि ई-20 के नाम पर घटिया पेट्रोल मिल रहा है। जिससे महंगी कारों का ही नहीं बाइक के भी इंजन पार्ट्स डेमेज हो रहे हैं। जब टायर व प्लास्टिक आइटम को क्लेम में एडआॅन किया जा सकता है तो इंजन पार्ट्स को क्यों नहीं किया जा रहा।

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सवाल : महंगे इंजन पार्ट्स का बीमा क्लेम क्यों नहीं
वाहन मालिकों ने सवाल उठाया कि जब टायर और प्लास्टिक को बीमा क्लेम में शामिल किया गया तो इंजन के महंगे पार्ट्स खराब होने पर बीमा क्लेम क्यों नहीं दिया जाता। बीमा कंपनियां पॉलिसी की शर्तों का हवाला देती हैं। यदि उपभोक्ता ने नियमित सर्विस करवाई और गुणवत्तापूर्ण ईंधन खरीदने के बावजूद नुकसान उठाया तो उसे राहत कैसे मिलेगी?

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पेट्रोल टैंक की सफाई पर उठे सवाल
बीएस-6 श्रैणी के लग्जरी कारों के इंजन पार्ट्स अचानक खराब होने के लगातार बढ़ते मामले सामने आने पर पेट्रोल क्वालिटी और टैंक की सफाई पर सवाल उठने लगे हैं। शोरूम संचालक, वर्कशॉप मैनेजर, आॅटोमोबाइल टेक्निशियन और इंश्योरेंस अधिकारियों का कहना है कि पेट्रोल पम्प संचालक 22 हजार लीटर क्षमता के टैंक की नियमित सफाई नहीं करवाते। क्योंकि, इसमें लागत अधिक आती है और व्यवसाय भी प्रभावित होता है, इसलिए संचालक टैंक साफ नहीं करवाते। बारिश व आंधी के दौरान महीन कचरा टैंक तक पहुंचने की संभावना बनती है।

कार ही बेचनी पड़ गई, पेट्रोल जांच की मिले सुविधा
मिलावटी पेट्रोल से इंजन के महत्वपूर्ण पार्ट्स खराब हो रहे हैं। बार-बार होती समस्या से परेशान होकर पेट्रोल कार बेचकर डीजल कार खरीदनी पड़ी। सर्विस सेंटर वाले भी घटिया पेट्रोल को ही इसकी वजह बताते हैं। वहीं, पेट्रोल की गुणवत्ता जांचने के लिए शहर में न तो कोई सार्वजनिक प्रयोगशाला है और न ही उपभोक्ता को जांच करवाने की सुविधा है। जिस तरह से इंश्योरेंस कम्पनियां वाहनों के टायर व प्लास्टिक आइट्म को भी कवर दे रही है, उसी तरह इंजन के महंगे पार्ट्स को भी क्लेम में शामिल किया जाना चाहिए।
-दीपक नामदेव, कार मालिक बोरखेड़ा

क्या कहते जिम्मेदार
यह कस्टमर और इंश्योरेंस कम्पनी के बीच का मामला है। इसमें आरटीओ का कोई संबंध नहीं है। हम इंश्योरेंस कम्पनियों को पाबंद नहीं कर सकते। यदि, इंश्योरेंस में जो इश्यू कवर्ड हैं, फिर भी क्लेम न मिले तो एमएसटी कोर्ट खुला है।
-मनीष शर्मा, प्रादेशिक परिवहन अधिकारी, आरटीओ

हमारे यूजर द्वारा फ्यूल से वाहनों को होने वाले नुकसान को लेकर इस तरह की शिकायत हमें अब तक नहीं मिली है। यह प्रगतिशील प्रोसेज है, यदि कोई इस तरह की कम्पलेन या इश्यू आता है तो उसे हैड आॅफिस में उच्चाधिकारियों को भेजा जाएगा।
-प्रतीक शर्मा, मेनेजर इंश्योरेंस कम्पनी

पेट्रोल की प्रतिदिन डेंटसिटी चैक की जाती है, यही सबसे बड़ा मापदंड है मिलावट जांचने का। कम्पनी खुद अपनी लैब में पेट्रोल गुणवत्ता जांच ने के बाद ही पम्प पर लाती है। पम्प के टैंक व मशीन में भी फिल्टर लगे होते हैं। जिनसे गुजरकर ही पेट्रोल नोजल से होता हुआ वाहनों में डलता है। ऐसे में पम्प से पेट्रोल में कचरा आना संभव नहीं है। पेट्रोल की जांच के लिए कम्पनी के पास लैब है लेकिन वहां पब्लिक सैंपल ले जाकर जांच नहीं करवा सकती। शिकायत पर कम्पनी खुद सैंपल कलेक्ट कर जांच करती है।
-तरूमीत सिंह बेदी, अध्यक्ष पेट्रोलियम एसोसिएशन

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