बड़ा सवाल - कहां गायब हो रहा पानी, इतना पानी की 31 लाख की आबादी पले, यहां तो 15 लाख में भी पानी का टोटा
अकेलगढ़, श्रीनाथपुरम और नदी पार के प्लांट मिलकर रोजाना पैदा कर रहे हैं 425 मिलियन लीटर पानी
कोटा। शिक्षा नगरी कोटा में पानी की उपलब्धता और उसकी असल सप्लाई के बीच एक ऐसा चौंकाने वाला गणित सामने आया है, जो न केवल पानी के अत्यधिक दोहन को दर्शाता है, बल्कि सिस्टम की लाचारी और आमजन की लापरवाही को भी उजागर करता है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) नई दिल्ली के स्वच्छता मानकों के मुताबिक, हॉस्टलों या सामान्य रिहायशी इलाकों में प्रति व्यक्ति 135 लीटर पानी (LPHD) की आवश्यकता होती है। लेकिन कोटा में प्रति व्यक्ति आबादी के अनुपात को देखा जाए, तो यहाँ 345 लीटर प्रति व्यक्ति की भारी-भरकम खपत सामने आ रही है। यह राष्ट्रीय औसत से दोगुने से भी ज्यादा है, जो पानी के प्रति गंभीर लापरवाही का सबसे बड़ा सबूत है।
मेट्रो शहर जैसी क्षमता, फिर भी मांग और आपूर्ति में बड़ा फेरबदल
जलदाय विभाग के दावों और आंकड़ों को देखें, तो कोटा शहर में स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के लिए भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। शहर में पानी की कुल उत्पादन क्षमता 517 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) है, जिसमें से वर्तमान में 425 MLD पानी का रोजाना उत्पादन किया जा रहा है:
अकेलगढ़ प्लांट: 64 MLD के 3 और 75 MLD का 1 संयंत्र (कुल 267 MLD)
श्रीनाथपुरम प्लांट: 50 MLD
नदी पार क्षेत्र: 130 MLD और 70 MLD के दो संयंत्र (कुल 200 MLD)
यदि राष्ट्रीय मानक के हिसाब से गणना की जाए, तो यह 425 MLD पानी करीब 31 लाख 45 हजार की आबादी की दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी है। लेकिन विडंबना देखिए कि मात्र 15 लाख की आबादी (फ्लोटिंग पापुलेशन सहित) वाले कोटा शहर में यह पानी भी कम पड़ता दिखाई दे रहा है। वर्तमान में यहाँ औसतन 280 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के हिसाब से पानी की सप्लाई का गणित बैठ रहा है, जो कि किसी भी बड़े मेट्रो शहर की तुलना में बहुत अधिक है।
आखिर कहाँ जा रहा है चम्बल का पानी?
इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के बाद भी कोटा की प्यास पूरी तरह क्यों नहीं बुझ पा रही है? 'दैनिक नवज्योति' के विश्लेषणात्मक आंकलन में इसके पीछे कुछ बेहद गंभीर कारण सामने आए हैं।
अस्पतालों और हॉस्टल हब में पानी का गणित
कोटा में पानी की सबसे ज्यादा खपत वाले क्षेत्रों में अस्पताल और यहाँ का मशहूर कोचिंग-हॉस्टल एरिया शामिल है।
अस्पतालों का हाल: कोटा के एमबीएस अस्पताल,न्यू मेडिकल कॉलेज, सुपर स्पेशलिटी विंग सहित अन्य सरकारी चिकित्सा संस्थानों को मिला लिया जाए, तो यहाँ करीब 2,500 बेड्स की क्षमता है। चिकित्सा मानकों के अनुसार, अस्पताल में प्रति बेड 450 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इस लिहाज से अस्पतालों में प्रतिदिन 11 लाख लीटर पानी की खपत हो रही है।
हॉस्टल और पीजी हब
कोटा में वर्तमान में 3,800 से अधिक रजिस्टर्ड हॉस्टल और 40,000 से अधिक पीजी संचालित हैं। कुन्हाड़ी, राजीव गांधी नगर, तलवंडी, जवाहर नगर और विज्ञान नगर जैसे पॉश और कोचिंग इलाकों में स्थित इन हॉस्टलों में हजारों छात्र रह रहे हैं। यहाँ पानी की मांग सबसे ज्यादा रहती है।
सप्लाई नेटवर्क से बाहर 150 कॉलोनियां
शहर की 150 से अधिक कॉलोनियां और कई आधुनिक मल्टी-स्टोरी बिल्डिंग्स आज भी पीएचईडी की मुख्य पाइपलाइन सप्लाई से बाहर हैं। इनमें बून्दी रोड़, बारां रोड़ थेकड़ा,रायपुरा व अनन्तपुरा के अलावा नान्ता, सीन्ता क्षेत्र की 3 दर्जन से अधिक मल्टी स्टोरीज है व कॉलोनियां है जो पुरी तरह आबाद है लेकिन सरकार के नियमानुसार पानी की आपुर्ति से अभी तक दुर है।
चम्बल के पानी को चखा तक नहीं
लैंडमार्क (कुन्हाड़ी) व कोरल पार्क जैसे बड़े हॉस्टल एरिया जहां 60 हजार से अधिक हॉस्टल छात्र रहते है। यहां छात्रों ने तो अभी तक कोटा व चम्बल के पानी के स्वाद को चखा ही नहीं। यह एरिया तो आज भी पानी की मुख्य लाइन से वंचित हैं और निजी साधनों व टैंकरों पर निर्भर हैं। यानी जो पानी कागजों में सप्लाई हो रहा है, वह असल में इन नलों तक पहुँच ही नहीं पा रहा। मुख्य शहर के अलावा कोचिंग क्षेत्रों में कोरल व लैण्ड़ मार्क जैसे इलाकों में तो आज तक जलदाय विभाग ने सप्लाई दी ही नहीं।
185 हजार उपभोक्ता कनेक्शन,लाइन लॉस और लीकेज
425 MLD पानी ट्रीट होने के बाद जब प्लांट से निकलता है, तो पुरानी पाइपलाइनों में लीकेज और अवैध कनेक्शनों के कारण पानी का एक बड़ा हिस्सा जमीन में समा जाता है या बर्बाद हो जाता है। दीपक झा ने बताया कि अब तक शहर में विभाग के द्वारा जारी किये गये कुल कनेक्शन 1 लाख 85 हजार है। ऐसे में यदि प्रति परिवार 6 लोग भी जोडें तो यह आंकडा 11 लाख व्यक्तियों का हो जाता है। जबकि हमारी क्षमता 31 लाख से अधिक लोगो को पानी की सुविधा देने की है। इतना पानी आखिर जा कहां रहा है। यह तो बडी बात है। इस और हमारी टीम काम कर रही है।
अत्यधिक दोहन और जागरूकता की कमी
चम्बल नदी के मुहाने पर बसे होने के कारण कोटा के लोगों में पानी को सहेजने की प्रवृत्ति कम देखी गई है। फुल फ्लशिंग टॉयलेट्स और हॉस्टलों में पानी की अनियंत्रित बर्बादी के कारण प्रति व्यक्ति खपत 345 लीटर तक पहुँच गई है।
-शैलेन्द्र कुमार सक्सेना उपभोक्ता दादाबाड़ी
कोटा में पानी की कोई कमी नहीं है, कमी है तो सिर्फ बेहतर प्रबंधन और वितरण प्रणाली की। यदि जलदाय विभाग लीकेज को रोकने और टेल-एंड (आखिरी छोर) तक पानी पहुँचाने में कामयाब हो जाए, तथा नागरिक पानी की बर्बादी रोकें, तो कोटा का यह पानी आने वाले कई सालों तक की आबादी के लिए अमृत साबित हो सकता है। फिलहाल, 15 लाख की आबादी में मेट्रो जितना पानी खपा देने का यह रहस्य सिस्टम पर कई बड़े सवाल खड़े करता है।
- राजू सोनी उपभोक्ता नांता
हमारे यहां पिछले सालों में करीब 1 दर्जन मल्टी स्टोरीज ने पीएचडी की पाईप लाईन से कनेक्शन के लिये आवेदन किया था हमनें जैसे ही डिमाण्ड़ नोट जारी किया उसके बाद से केवल 3 मल्टी स्टोरीज ने ही पैसे जमा कराये बाकि के आवेदन अभी आगे नहीं बढ़ सके है। हमारी तरफ से जैसे ही अमृत 2.0 का काम आगे बढता है वैसे ही अन्य इलाकों को भी पानी के लिये जोडा जायेगा।
-दीपक झा अतिरिक्त मुख्य अभियन्ता पीएचईडी कोटा
कोटा में प्रति व्यक्ति पानी की खपत 380 लीटर तक पहुंचना जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन और भविष्य के बड़े संकट का सीधा संकेत है। पीने के साफ पानी से सड़कें धोना और खुले नलों से होने वाली बर्बादी पर्यावरण और जल सुरक्षा के लिहाज से एक नासूर बन चुकी है।
पानी की उपलब्धता से ज्यादा पानी के महत्व से लोगों को जोडना होगा। पानी की बर्बादी पर सभी को मुखरता से आवाज उठानी ही होगी। सरकार 1 लीटर पानी तैयार करने मे जितना समय और पैसा लगा रही है उतने से भी कम यदि सही वितरण और सख्ती से प्रबंधन पर लगा दे तो सारी परेशानी दूर हो जाए सभी को पर्याप्त व शुद्ध पानी मिल जाए।
-अनिल रावत वरिष्ठ वैज्ञानिक केन्दीय प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड

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