मुकुंदरा और शेरगढ़ के जंगलों में आबाद हो रही उल्लुओं की दुनिया

कोलीपुरा के जंगलों में नजर आ रहे मोटल वुड प्रजाति के आउल

मुकुंदरा और शेरगढ़ के जंगलों में आबाद हो रही उल्लुओं की दुनिया

गराड़िया से गैपरनाथ तक चंबल की कराइयों में पर्यटकों को दिखाई दे रहे उल्लूओं के बच्चे।

कोटा। रात का सन्नाटा, पेड़ों की ऊंची डालियां और चट्टानों की दरारों में चमकती आंखें, यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि कोटा के जंगलों उल्लुओं की मौजूदगी का संकेत है। एक समय लोगों की नजरों से दूर रहने वाला आउल अब मुकुंदरा और शेरगढ़ के जंगलों में अच्छी संख्या में दिखाई देने लगे हैं। खास बात यह है कि अब चंबल सफारी करने वाले पर्यटकों को गरड़िया से गैपरनाथ तक चंबल की कराइयों में उल्लुओं के बच्चे भी नजर आ रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि यहां का जंगल इन पक्षियों के लिए सुरक्षित घर बनता जा रहा है। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व, भैंसरोडगढ़ और शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के जंगलों में इन दिनों उल्लुओं की दुनिया आबाद हो रही है। कालीसिंध-गागरोन क्षेत्र से लेकर चंबल नदी की कराइयों तक इनकी दुनिया फल-फूल रही है। 

अब तक नहीं हुआ उल्लुओं का सर्वे
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, उल्लू शिकारी पक्षी होता है, ईको सिस्टम में इसकी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हालांकि, इनकी वास्तविक संख्या का आंकड़ा वन विभाग के पास भी नहीं है, क्योंकि अब तक इनका सर्वे नहीं करवाया गया। लेकिन, फोरेस्ट अधिकारी व वाइल्ड लाइफर द्वारा इनकी संख्या अच्छी मात्रा में बताई जाती है। मुकुंदरा की कोलीपुरा रेंज में मोटल वुड प्रजाति का ऑउल पाया जाता है, जो काफी रेयर होता है।

मुकुंदरा में 6 प्रजाति के आउल
बायोलॉजिस्ट उर्वशी शर्मा बताती हैं, कालीसिंध-गागरोन से चंबल की कराइयों तक मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में उल्लूओं की 6 प्रजाति पाई जाती है। जिनमें इंडियन इगल ओवल, स्पोट्रेड ओवल, ब्राउन फिश ओउल, डस्की इगल ओवल, इंडियन स्कूप ओठल, बान ओवल शामिल हैं। उल्लूओं की कोई भी प्रजाति कॉमन नहीं है, यह सभी संकटग्रस्त हैं। गागरोन, जवाहर सागर, चंबल घड़ियाल सेंचुरी, भैंसरोडगढ़ व शेरगढ़ की कराइयों में उल्लूओं की आबादी पनप रही है।  

270 डिग्री तक घुमा सकता है गर्दन
उल्लू अपनी गर्दन को लगभग 270 डिग्री तक घुमा सकता हैं। साथ ही इस पक्षी की रात में देखने की क्षमता अन्य पक्षियों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती है। साथ ही इनकी सुनने की शक्ति भी काफी तेज होती है। ईको सिस्टम में इनका अहम योगदान है। यह कीट, पतंगे, चूहे खाकर इंसानों को बीमारियों से बचाते हैं। चूहे खेतों में घुसकर फसले बर्बाद करते हैं, ऐसे में चूहों का शिकार करने से यह किसान मित्र भी कहलाते हैं।

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चोटिल ऑउल का रेस्क्यू कर करा रहे इलाज
बायोलॉजिस्ट उर्वशी ने बताया कि ट्यूरिस्ट को चंबल सफारी कराने के दौरान नदी किनारे जंगल को वॉच करते हैं। कोटा से गरड़िया महादेव और गैपरनाथ तक ऑउल के बच्चे नजर आते हैं। कई बार उड़ने की कोशिश में वह चट्टानों पर गिरकर घायल हो जाते हैं। गत वर्ष करीब 4 बेबी ऑउल घायल अवस्था में मिले थे, जिनका नयापुरा स्थित चिड़ियाघर में इलाज करवाया। ठीक होने के बाद वन्यजीव विभाग ने उसे उनके हैबीटाट में रिलीज कर किया। चंबल सफारी के दौरान उर्वशी अब तक डेढ़ दर्जन से अधिक घायल उल्लुओं की जान बचा चुकी है।

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जन्म के डेढ़ माह बाद देख पाते हैं बेबी ऑउल
वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर बताते हैं, एक मेटिंग सीजन में मादा उल्लू करीब 15 अंडे देती है। जन्म के करीब डेढ़ माह बाद यह देख पाते हैं। जब उल्लू के बच्चे का जन्म होता है तो माता-पिता अपने बच्चों को खाना खिलाते हैं और उन्हें सीने से लगाकर गर्म रखते हैं। बच्चे करीब 1 साल तक माता-पिता के साथ रहते हैं।

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कोलीपुरा में दुर्लभ प्रजाति का मोटलवुड ऑउल
नेचर प्रमोटर एएच जैदी बताते हैं, कोलीपुरा में दुर्लभ प्रजाति का मोटलवुड ओवल पाया जाता है। यह अपना घौंसला पेड़ों के अंदर हॉल करके बनाता है। मुकुंदरा के कोर एरिया कोलीपुरा के जंगलों में डायन का टोला व शिवकुडी इलाके में अच्छी संख्या में पाया जाता है। इसके अलावा अन्य ऑउल खण्हर बिल्डिंग, वीरान घरों में घौंसला बनाते हैं।

रेडियो तरंगों से लगाता है शिकार का पता
मुकुंदरा, भैंसरोडगढ़, शेरगढ़ में उल्लू अच्छी संख्या में आबाद हो रहे हैं। यह अपने शिकार का पता लगाने के लिए रेडियो तरंगे छोड़ता है, जो शिकार से टकराकर वापस आती है। इससे यह शिकार की वास्तिविक लॉकेशन को ट्रैस कर लेते हैं और एक ही निशाने में शिकार को दबोच लेते हैं। खास बात यह है, उल्लू के पंजे शिकार पकड़ने पर इंटरलॉक हो जाते हैं। इनकी उम्र 5 से 12 साल होती है। जब बच्चे अंडे से बाहर निकलते हैं तो वह गुलाबी रंग के होते हैं और एक माह तक अंधे रहते हैं। वह अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार होते हैं। उल्लू के दांत नहीं होते हैं, इसलिए सांप की तरह शिकार को निगलते हैं। बच्चे एक साल तक मां-बाप के साथ रहते हैं और 2 से 3 साल की उम्र में परिवार से अलग हो जाते हैं। चंबल के इलाकों से कई उल्लू रेस्क्यू होकर आते हैं, जिनका इलाज करवाकर वापस उनके हैबीटाट में छोड़ देते हैं। यह शेड्यूल वन का एनिमल है, लेकिन अभी तक इसका सर्वे नहीं हुआ है। हालांकि, वर्तमान में इनका सर्वे किए जाने की जरूरत है।
- अनुराग भटनागर, उप वन संरक्षक, वन्यजीव विभाग कोटा

 

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