फैकल्टी और कर्मचारियों की कमी के आंकड़े जारी करते हुए राज्यसभा में उठा एम्स रायबरेली की अनदेखी का मुद्दा, मेडिकल गरीबी के कुचक्र में फंसने का लगाया आरोप
राज्यसभा में एम्स पर सवाल
राज्यसभा में एम्स रायबरेली की अनदेखी और एम्स दिल्ली पर बढ़ते बोझ का मुद्दा उठा। सदस्यों ने फैकल्टी कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं पर चिंता जताई।
नई दिल्ली। राज्यसभा में सोमवार को एम्स रायबरेली की अनेदखी और एम्स दिल्ली पर अत्यधिक बोझ के मुद्दे उठे। सदन में शून्यकाल के दौरान राजस्थान से कांग्रेस के प्रमोद तिवारी ने कहा कि उत्तर प्रदेश के रायबरेली में 12 साल पहले एम्स की नींव रखी गयी थी, लेकिन आज भी वहां पूर्ण परिचालन शुरू नहीं हो पाया है। उन्होंने फैकल्टी और कर्मचारियों की कमी के आंकड़े रखते हुए राजनीतिक कारणों से अस्पताल की अनदेखी का मुद्दा उठाया।
प्रमोद तिवारी ने कहा कि एम्स रायबरेली में 200 सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों की सीट है जिनमें सिर्फ 37 की नियुक्ति है। प्रोफेसर के 33 पद हैं जिनमें सिर्फ तीन पर नियुक्ति है। एडिशनल प्रोफेसर से 26 पदों पर मात्र छह की नियुक्ति है। कुल मिलाकर 201 फैकल्टी पदों में से 85 रिक्त हैं।
बिहार से राजद के मनोज कुमार झा ने कहा कि एम्स दिल्ली में निजी कारणों से उन्हें चार महीने रहना पड़ा। इस दौरान उन्होंने देखा कि वहां काफी डॉक्टरों, कर्मचारियों पर काफी बोझ है। उन्होंने कहा कि विभिन्न शहरों में जो क्षेत्रीय एम्स बनाये गये हैं वहां का अनुसंधान और इलाज का स्तर भी एम्स दिल्ली जैसा ही होना चाहिए। लोग दूसरे एम्स से दिल्ली आने के लिए मजबूर होते हैं। मरीजों के साथ उनके तीमारदारों को भी लंबे समय के लिए यहां रहना होता है और वे मेडिकल गरीबी के कुचक्र में फंस जाते हैं। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेक्टर का झुकाव निजी क्षेत्र की तरफ है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन सरकारी अस्पतालों में भी इलाज की बेहतर सुविधा होनी चाहिए।

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