एस. सोमनाथ ने कहा, इसरो का अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण वाहन 'सूर्या' को मिलेगी नई पहचान, जानें कैसे?

इसरो का 'सूर्या' रॉकेट: 30 टन पेलोड के साथ अंतरिक्ष में भारत की नई छलांग

एस. सोमनाथ ने कहा, इसरो का अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण वाहन 'सूर्या' को मिलेगी नई पहचान, जानें कैसे?

इसरो का नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल 'सूर्या' (NGLV) पुन: उपयोग योग्य तकनीक से लैस होगा। ₹8,240 करोड़ की लागत से बनने वाला यह रॉकेट 30 टन भार ले जाने में सक्षम होगा।

चेन्नई। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अगले पीढ़ी के प्रक्षेपण वाहन (एनजीएलवी), जिसे अनौपचारिक रूप से 'सूर्या' नाम दिया गया है, को पूरी तरह पुन: उपयोग योग्य और मॉड्यूलर डिजाइन वाला रॉकेट बनाया जा रहा है जो मौजूदा रॉकेट्स की तुलना में काफी अधिक पेलोड क्षमता वाला होगा। यह जानकारी पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने दी। एनजीएलवी को ठोस ईंधन मोटर्स की जगह पूर्ण रूप से तरल प्रोपल्शन सिस्टम पर आधारित बनाया जा रहा है। एस. सोमनाथ के अनुसार, नए इंजनों को बड़ा आकार, नई तकनीक और थ्रॉटलिंग क्षमता वाला बनाना पड़ रहा है, इसलिए मौजूदा वेंडरों का उपयोग नहीं किया जा सका।

यह तीन-चरण वाला रॉकेट अपनी पहली दो स्टेजों में क्लस्टर्ड एलओएक्स-मीथेन इंजनों का उपयोग करेगा, जबकि तीसरी स्टेज क्रायोजेनिक होगी। पूर्ण समन्वय में इसका लिफ्ट-ऑफ वजन करीब 1,000 टन होगा और यह निचली पृथ्वी कक्षा (एलईओ) में 30 टन तक पेलोड ले जा सकेगा। एनजीएलवी का विकास 8,240 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से हो रहा है, जिसमें तीन विकासात्मक उड़ानें, बुनियादी ढांचा और लॉन्च अभियान शामिल हैं। 

रॉकेट के बड़े आकार के कारण प्रमुख कंपोनेंट्स का निर्माण श्रीहरिकोटा लॉन्च साइट के पास ही किया जाएगा, क्योंकि इन्हें सड़क से लाना संभव नहीं होगा। इसरो ने उद्योग भागीदारी मॉडल अपनाया है, जिसमें साझेदार लंबे अनुबंध के तहत उत्पादन सुविधाएं स्थापित करेंगे। उन्होंने बताया कि सही साझेदार चुनना महत्वपूर्ण है, जो निवेश और जोखिम लेने में सक्षम हों। इस दिशा में कई संभावित साझेदारों से चर्चा चल रही है।

वर्तमान में इसरो की प्रक्षेपण क्षमता सीमित है, क्योंकि एलवीएम3 का उत्पादन सालाना सिर्फ 2-3 रॉकेट्स तक है। तरल इंजनों से उत्पादन तेज होगा। एनजीएलवी उपग्रह नक्षत्रों, संचार उपग्रहों, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और भविष्य के चंद्र मानव मिशनों के लिये लाभकारी साबित होगा। एस. सोमनाथ ने चंद्रमा पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री भेजने के लिए मॉड्यूलर दृष्टिकोण को सबसे लागत-प्रभावी बताया, जिसमें पहले मानवरहित फिर मानवयुक्त मिशन शामिल होंगे।

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