स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला प्राधिकरण को नोटिस का जवाब भेजा, बोलें-ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने नियुक्त किया था उत्तराधिकारी
'शंकराचार्य' उपाधि पर विवाद गहराया
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रयागराज मेला प्राधिकरण के नोटिस को 'असंवैधानिक' बताते हुए 8 पन्नों का कानूनी जवाब भेजा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका अभिषेक सुप्रीम कोर्ट की रोक से पहले ही संपन्न हो चुका था।
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रयागराज मेला प्राधिकरण के नोटिस का जवाब उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता ए के मिश्रा के माध्यम से भेज दिया है। अधिवक्ता की तरफ से कल रात आठ पन्नों का प्रयागराज मेला प्राधिकरण को भेजे गए है इस विस्तृत जवाब में मेला प्राधिकरण के आरोपों को सिरे से नकार दिया गया है। नोटिस के जवाब में कहा गया है कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी ने जीवनकाल में ही अविमुक्तेश्वरा नंद को उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।
11 सितंबर 2022 को ब्रह्मलीन हुए थे शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज 12 सितंबर 2022 को वैदिक विधिविधान के साथ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विधिवत अभिषेक किया गया एवं सार्वजनिक समारोह में शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठापन किया गया था। उच्चतम न्यायालय के संज्ञान में लाया गया कि अभिषेक पहले ही हो चुका था, 14 अक्टूबर 2022 के आदेश में यह तथ्य दर्ज है
शंकराचार्य पद पर बने रहने को लेकर किसी भी न्यायालय से कोई स्थगन आदेश नहीं है। श्रृंगेरी, द्वारका और पुरी पीठ के शंकराचार्यों का समर्थन होने का दावा किया गया है। भारत धर्म महामंडल द्वारा भी मान्यता का उल्लेख किया गया है। ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की पंजीकृत वसीयत को वैध बताया गया है। गुजरात उच्च न्यायालय ने वसीयत को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की थी।
यह जानकारी नोटिस के जवाब में दी गई है। विरोधी पक्ष के बयानों को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में मानहानि वाद दायर किया गया था। लेकिन विरोधी द्वारा दायर आवेदन बाद में वापस लिया गया कुछ व्यक्तियों पर उच्चतम न्यायालय में गलत जानकारी देने का आरोप भी लगा था। फर्जी दस्तावेज पेश करने और भ्रम फैलाने का दावा किया गया है। इस नोटिस में प्रयागराज मेला प्राधिकरण के पत्र को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया गया है। इस प्रशासनिक हस्तक्षेप को असंवैधानिक करार दिया है मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन तीसरे पक्ष के बयान को न्यायाधीन बताया गया है।
शंकराचार्य पद को लेकर भ्रम फैलने से सामाजिक और प्रतिष्ठा की क्षति का दावा किया गया है। नोटिस के जवाब में यह कहा गया है कि अगर 24 घंटे में अगर मेला प्रशासन ने नोटिस वापस नहीं लेता है, तो न्यायालय की अवमानना और शंकराचार्य परंपरा एवं स्वामी जी की छवि धूमिल करने के लिए विधिक कार्यवाही की जाएगी। नोटिस का जवाब प्राधिकरण उपाध्यक्ष को मेल के जरिए भी भेजा गया है।

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