सतरंगी सियासत

सतरंगी  सियासत

देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश। उसमें भी प्रमुख विपक्षी सपा और उसके अध्यक्ष अखिलेश यादव का मानो सब कुछ दांव पर।

सब कुछ दांव पर
आम चुनाव- 2024 का परिणाम बहत कुछ संकेत और संदेश छोड़कर जाएगा। देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश। उसमें भी प्रमुख विपक्षी सपा और उसके अध्यक्ष अखिलेश यादव का मानो सब कुछ दांव पर। देश के दिग्गज समाजवादी नेता रहे मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यूपी का सीएम पद संभालने के बाद से लगातार चार बार चुनाव हार चुके। विधानसभा चुनाव 2017 और 2022 एवं लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 में भी पिछड़ चुके। इनमें अखिलेश प्रभावशाली प्रदर्शन नहीं कर पाए। अब पांचवें चुनाव में भी कोई बहुत अवसर नजर नहीं आ रहा। कांग्रेस से गठजोड़ इसकी बानगी। फिर उनकी चाचा शिवपाल यादव से पटरी बैठती नहीं। जबकि वह सपा की मुलायम सिंह के जाने के बाद मानो रीढ़। लेकिन अखिलेश ने उन्हें पूरे समय साइड में रखा। ऐसे में यदि अखिलेश यादव लगातार पांचवां चुनाव हारे। तो क्या होगा? यह समय बताएगा।

किस किसकी बारी?
आम चुनाव- 2024 कई क्षेत्रीय दलों या क्षत्रपों के लिए अवसान का अवसर भी संभव। कई दल लगातार निचले पायदान पर जाते जा रहे। सो, इनकी वंशवादी, परिवारवादी एवं व्यक्तिवादी राजनीति पर खतरा। हां, राजद के तेजस्वी यादव ऐसे नेता। जिन्होंने लालू यादव की राजनीतिक विरासत को ठीक से संभाला हुआ। बाकी कई नए राजनीतिक माहौल में संघर्ष कर रहे। बात चाहे बीआरएस के केसीआर की हो या बीजेडी के नवीन पटनायक। जदयू के नीतीश कुमार, एनसीपी के शरद पवार और शिवसेना (यूबीटी) के उद्धव ठाकरे इसी संभावना से जूझ रहे। फिर जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद- 370 हटने के बाद एनसी के उमर अब्दुल्ला और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती महबूबा के राजनीतिक भविष्य का क्या होगा? वहीं, दक्षिण के तमिलनाडु में राजनीति तेजी से करवट ले रही। जयललिता की एआईडीएमके आंतरिक झगड़े से जूझ रही। तो डीएमके को नंबर एक राजनीतिक दुश्मन भाजपा नजर आ रही।

अपनी राह
बसपा की अपनी राजनीति और गति। मायावती से आगे दूर तक देख रहीं। भले ही आज राजनीतिक जानकार उनका घाटा बता रहे हों। लेकिन मायावती की नजर भविष्य पर। इसीलिए भतीजे आकाश आनंद को आगे भी किया। लेकिन कुछ मामला गड़बड़ा गया। इसीलिए उन्हें फिलहाल फ्री भी कर दिया। बसपा प्रमुख मायावती की राजनीति टर्निंग पाइंट पर। यूपी में उनकी नजर कांग्रेस के दलित और सपा का मुस्लिम वोट पर। यानी त्रिकोणिय मुकाबले में भाजपा की जीत की संभावना ज्यादा। इसीलिए सपा और कांग्रेस, मायावती की बसपा पर हमलावर भी। लेकिन उनकी अपनी रणनीति और राजनीतिक गुणा भाग। जब यूपी में सपा और कांग्रेस कमजोर होंगी। तो भाजपा के सामने बसपा ही होगी। और इसी में मायावती अगली पीढ़ी के लिए अवसर देख रहीं। आकाश आनंद को उसी के लिए तैयार किया जा रहा। लेकिन प्रदेश की जनता का मूड इस चुनाव में मालूम पड़ेगा।

संकेत और संदेश
श्रीनगर संसदीय क्षेत्र में इस बार मतदान का 28 साल पुराना रिकार्ड टूट गया। साल 1996 में 41 तो इस बार 38 फीसदी मतदान हुआ। भाजपा इसे अनुच्छेद- 370 खत्म होने का असर बता रही। जिसे शांतिपूर्ण माहौल और अच्छी कानून व्यवस्था से भी जोड़कर देखा जा रहा। लेकिन सीमा पार गुलाम कश्मीर में हालात इसके एकदम उलट। वहां पाक फौज के खिलाफ बगावत जैसे हालात। धरना-प्रदर्शन एवं नारेबाजी भी ठीक उसी दिन। जिस दिन श्रीनगर में मतदान हो रहा था। इसकी जानकारी पूरी दुनियां तक पहंच रही। याद रहे, भारत के रक्षा और विदेश मंत्री कश्मीर को भारत में मिलाए जाने की बात एकदम स्पष्ट कह चुके। अब यह घटनाक्रम महज संयोग या फिर कुछ और? लेकिन गुलाम कश्मीर ने दुनियाभर का ध्यान जरुर खींच लिया। आनन-फानन में पाक सरकार द्वारा 700 करोड़ की मदद की घोषणा की गई। मतलब हालात काबू से बाहर।

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रूस की एंट्री
देश के आम चुनाव में पाक का जिक्र न हो। तो चुनाव ही क्या? लेकिन अब रूस की भी एंट्री। इसका जिक्र किया अरविंद केजरीवाल ने। जो इन दिनों सुप्रीम कोर्ट की जमानत पर। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति पुतिन का जिक्र करके चुनावी तड़का तो लगा ही दिया। इससे पहले अमरीका पर आरोप। वह भारतीय चुनाव प्रक्रिया में दखलंदाजी कर रहा। इसके बाद अमरीका बैक फुट पर। वैसे बात पाक तक तो ठीक। लेकिन रूस के जिक्र से विदेशी संबंधों पर भी असर संभव। लेकिन विपक्षी नेता जिस तरह से पीएम मोदी पर हमला कर रहे। इसे क्या कहा जाए? चुनावी रस्म या अगला संदेश? और वह क्या? पीएम मोदी सभी पर भारी पड़ रहे? लेकिन एक बात। इस बार का चुनाव। कई नेताओं एवं दलों के लिए राजनीतिक अस्तित्व का सवाल। हारे तो वह मानकर चल रहे। राजनीति की रिंग से बाहर जाने का खतरा!

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विपक्ष का नजरिया!
आम चुनाव का पांचवां चरण कल। लेकिन विपक्ष अभी भी यही दावा कर रहा कि एनडीए 400 पार नहीं करेगा। साथ में विपक्ष जोड़ रहा। यदि 400 सीटें पार हुईं। तो देश का संविधान और आरक्षण व्यवस्था को खत्म कर दिया जाएगा। इसी की काट में पीएम मोदी ने बोला। यदि कांग्रेस सत्ता में आई। तो ओबीसी का आरक्षण काटकर मुस्लिम समाज को दे दिया जाएगा। कर्नाटक इसका उदाहरण। रही सही कसर सलमान खुर्शीद की भतीजी ने वोट जेहाद का जिक्र करके कर दिया। इसके बाद कांग्रेस बैकफुट पर। इसके बावजूद विपक्ष और कांग्रेस यह नहीं बता रहे कि खुद उनकी कितनी सीटे आएंगी। अब तो ममता बनर्जी भी बोल गईं। इंडिया गठबंधन सत्ता में आया। तो टीएमसी उसे बाहर से समर्थन देगी। इसी, बीच पीओजेके में महंगाई को लेकर प्रदर्शन। तो इधर, देश में सीएए के तहत नागरिकता देने का कार्यक्रम शुरू हो गया।

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केजरीवाल मौन!
अरविंद केजरीवाल राजनीतिक और कानूनी भंवर में। स्वाति मालीवाल के साथ सीएम आवास में मारपीट क्या हुई। केजरीवाल एकदम मौन हो गए। बाद में आप सांसद संजय सिंह नमूदार हुए। कहा, मालीवाल के साथ अभद्रता हुई। दोषी के खिलाफ कार्रवाई होगी। उन्होंने मालीवाल के घर जाकर उनका हालचाल जाना। लेकिन सवाल केजरीवाल का। उनसे न उगलते बन रहा और न निगलते। फिर उनके खास सिपहसालार विभव कुमार जेल पहुंच चुके। इधर, माहौल आम चुनाव का। अभी दिल्ली और पंजाब में मतदान बाकी। कहीं, यह सब आम आदमी पार्टी में अंदरखाने की ही तो कोई खदबदाहट तो नहीं? क्योंकि केजरीवाल को वापस जेल भी जाना। उससे पहले राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा। आप सांसद राघव चढ्ढा की लंदन से अचानक स्वदेश वापसी। इसकी स्पष्ट बानगी। फिर सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका। अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री पद पर रहेंगे या नहीं। यह उप-राज्यपाल को तय करना।

-दिल्ली डेस्क
(ये लेखक के अपने विचार है)

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