कीटनाशक पर प्रतिबंध लगाने से नहीं रुकेंगी किसानों की आत्महत्याएं, मूल कारण को दूर करने की आवश्यकता: क्रॉपलाइफ इंडिया

कीटनाशक पर प्रतिबंध लगाने से नहीं रुकेंगी किसानों की आत्महत्याएं, मूल कारण को दूर करने की आवश्यकता: क्रॉपलाइफ इंडिया
क्रॉपलाइफ इंडिया ने 'पैराक्वाट' और 'कार्बोसल्फान' पर संभावित प्रतिबंध की समीक्षा के बीच सरकार से व्यावहारिक रुख अपनाने की मांग की है। संगठन का कहना है कि उत्पादों को हटाने से कर्ज और फसल की बर्बादी जैसे मूल कारण खत्म नहीं होंगे। खरीफ सीजन में इन किफायती विकल्पों के अचानक बंद होने से किसानों का वित्तीय तनाव और बढ़ सकता है।

नई दिल्ली। केंद्र सरकार के तेलंगाना में प्रतिबंध और जहर से होने वाली मौतों पर चिंता के बाद फसल सुरक्षा उत्पादों 'पैराक्वाट डाइक्लोराइड' और 'कार्बोसल्फान' की बिक्री की समीक्षा किए जाने के बीच, क्रॉपलाइफ इंडिया ने आग्रह किया है कि कोई भी निर्णय किसानों की आत्महत्या के वास्तविक कारणों की स्पष्ट समझ और गंभीर तनाव से जूझ रहे किसानों पर इस प्रतिबंध के पड़ने वाले व्यावहारिक असर को ध्यान में रखकर ही लिया जाना चाहिए। संगठन का कहना है कि किसी उत्पाद पर प्रतिबंध लगाने से साधन तो हट जाता है, लेकिन समस्या का मूल कारण खत्म नहीं होता। वास्तव में, किसी उत्पाद को प्रतिबंधित करने से वह संकट और गहरा सकता है, जो किसी किसान को अपनी जान लेने के लिए मजबूर करता है।

वैज्ञानिक अध्ययनों और साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि किसानों की आत्महत्या के पीछे कर्ज, फसल की बर्बादी, वैकल्पिक आजीविका का अभाव और फसल खराब होने पर ऋण चुकाने में असमर्थता जैसे निरंतर बने रहने वाले मुख्य कारण हैं। उदाहरण के लिए, 'इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन' में प्रकाशित वर्ष 2024 के एक गुणात्मक अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में किसानों की आत्महत्या के मुख्य कारण मानसिक स्वास्थ्य के बजाय आर्थिक हैं, जिसमें कर्ज और उसके कारण पैदा हुआ ऋण-जाल सबसे प्रमुख कारक है। इसी तरह, 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट' के एक अन्य अध्ययन के अनुसार, किसानों की आत्महत्या का सीधा संबंध वर्षा की स्थिति से है।

पांच अत्यधिक प्रभावित राज्यों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि वर्षा में पांच प्रतिशत के बदलाव पर जहां प्रतिवर्ष औसतन 810 किसानों की आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए, वहीं वर्षा में 25 प्रतिशत की कमी होने पर यह संख्या बढ़कर 1,188 तक पहुंचने का अनुमान है। इसी अध्ययन में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में गारंटीकृत रोजगार और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध थी, वहां फसल खराब होने के बाद भी आत्महत्या के मामलों में कमी देखी गई। इन साक्ष्यों से साफ है कि आत्महत्या एक गहरे संकट का लक्षण है, और महत्वपूर्ण फसल सुरक्षा उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने से यह संकट और बढ़ सकता है। क्रॉपलाइफ इंडिया ने सभी हितधारकों और उद्योग जगत से आग्रह किया है कि वे सरकार द्वारा आय सहायता, फसल बीमा, संस्थागत ऋण और ग्रामीण रोजगार गारंटी के माध्यम से तैयार किए गए सुरक्षा चक्र को और मजबूत करें ताकि किसानों को इस संकट से उबारा जा सके।

खरीफ बुवाई के सीजन की शुरुआत को देखते हुए यह मामला बेहद संवेदनशील और जरूरी हो जाता है। क्रॉपलाइफ इंडिया ने सरकार से खेतों की व्यावहारिक आवश्यकताओं पर विचार करने का अनुरोध किया है, क्योंकि किसान इस साल के लिए अपनी लागत की योजना और प्रतिबद्धता पहले ही तय कर चुके हैं। सीजन के बीच में किफायती और स्थापित खरपतवार एवं कीट नियंत्रण विकल्पों को अचानक रोकने से किसानों की लागत बढ़ेगी और उन पर वित्तीय दबाव और ज्यादा बढ़ जाएगा, जो कि इन त्रासदियों का असली कारण है।

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यह वित्तीय दबाव मामूली नहीं है। 'निदेशालय खरपतवार अनुसंधान' (भाकृअनुप संस्थान) और 'फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया' द्वारा 11 राज्यों के 3,200 किसानों पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार, देश में खरपतवारों के कारण हर साल लगभग 92,000 करोड़ रुपये की फसल उत्पादकता का नुकसान होता है, जो खरीफ फसलों में 25-26 प्रतिशत और रबी फसलों में 18-25 प्रतिशत तक है। 'पैराक्वाट' का उपयोग सालाना करीब 80 लाख एकड़ भूमि पर किया जाता है और यह चाय, कपास, आलू, मक्का, कॉफी, रबर और बागवानी फसलों में खरपतवार प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बिना जुताई (जीरो-टिलेज) और संरक्षण प्रथाओं का भी समर्थन करता है जिन्हें सरकार स्वयं बढ़ावा देती है। लगभग 300-350 रुपये प्रति एकड़ की लागत के साथ, पैराक्वाट विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक अत्यधिक किफायती समाधान बना हुआ है, जिसकी लागत श्रमिकों की भारी कमी के कारण महंगी हो चुकी हाथ से निराई की तुलना में बहुत कम है। दूसरी ओर, 'कार्बोसल्फान' धान में 'गाल मिज' कीट के खिलाफ सबसे प्रभावी विकल्पों में से एक है और इसका उपयोग लगभग 32 लाख एकड़ में किया जाता है। कृषि लागत में वृद्धि और पैदावार में कमी किसानों को उसी वित्तीय तनाव की ओर धकेलती है जो इस संकट की जड़ में है।

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क्रॉपलाइफ इंडिया के अध्यक्ष और क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड के कार्यकारी अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक अंकुर अग्रवाल ने कहा, "किसी उत्पाद पर बहस करते समय हम किसानों की आत्महत्या की मुख्य चिंता से भटक रहे हैं। मुख्य मुद्दा यह है कि किसी उत्पाद को रात भर में हटा देने से किसान का संकट दूर नहीं हो जाता। कर्ज, बर्बाद हुई फसल और भविष्य का डर वैसे ही बना रहता है। यदि उद्देश्य जीवन बचाना है, तो समाधान मूल कारण तक पहुंचना चाहिए, जिसमें ऋण की उपलब्धता, फसल की उचित कीमत, फसल खराब होने पर प्रभावी बीमा और जमीनी स्तर पर बेहतर कृषि पद्धतियों का प्रशिक्षण शामिल हो।"

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क्रॉपलाइफ इंडिया ने इस मुद्दे की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन और सरकार के विचारशील, परामर्शदात्री तथा विज्ञान आधारित दृष्टिकोण का स्वागत किया है। अनुसंधान एवं विकास पर आधारित 17 फसल सुरक्षा कंपनियों के शीर्ष निकाय के रूप में, क्रॉपलाइफ इंडिया इस समीक्षा में केंद्र, राज्यों और सभी हितधारकों के साथ एक भागीदार के रूप में काम करने के लिए पूरी तरह तैयार है, ताकि ध्यान उस वास्तविक संकट पर केंद्रित रहे जो देश के किसानों के जीवन को प्रभावित कर रहा है।

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