सम्राट चौधरी बने बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री : मदरसे से रहा है ताल्लुक, पढ़ें लालू के साथ शुरूआत से लेकर सीएम बनने तक का सफर

बिहार में भाजपा का उदय: सम्राट चौधरी ने रचा इतिहास

सम्राट चौधरी बने बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री : मदरसे से रहा है ताल्लुक, पढ़ें लालू के साथ शुरूआत से लेकर सीएम बनने तक का सफर

सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेकर नया इतिहास रच दिया है। भाजपा को दशकों के इंतजार के बाद बिहार में अपना पहला मुख्यमंत्री मिला। मुंगेर के एक मदरसे से शिक्षा प्राप्त कर राजनीतिक शिखर तक पहुंचे सम्राट ने नीतीश कुमार की विरासत संभाली है, जिससे राज्य में सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल गया है।

पटना। सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है और इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी उंस महत्वाकांक्षा को हासिल कर लिया है, जिसका पीछा वह लंबे समय से कर रही थी। भाजपा ने 2023 में सम्राट चौधरी को पार्टी का बिहार प्रदेश अध्यक्ष बना कर जो राजनीतिक निवेश किया था, तीन साल बाद उसकी ब्याज के साथ वसूली हो गयी है। 46 साल पुरानी इस पार्टी को लंबे जद्दोजहद के बाद बिहार में उसका पहला मुख्यमंत्री मिल गया है।

Shakuni Chaudhary

सम्राट चौधरी का जन्म 16 नवंबर 1968 को मुंगेर जिले में तारापुर के लखनपुर गांव में हुआ था। सम्राट चौधरी का शुरुआती नाम राकेश चौधरी था, जिसे बाद में उन्होंने बदल कर सम्राट चौधरी कर दिया। पिता शकुनी चौधरी कुशवाहा समाज के बड़े चेहरे और प्रदेश के कद्दावर नेताओं में एक रहे हैं। शकुनी चौधरी पहली बार 1985 में तारापुर सीट से विधायक बने थे। यह वही साल था जब नीतीश कुमार भी पहली बार हरनौत से विधानसभा चुनाव जीते थे। शकुनी चौधरी इसके बाद सात बार विधायक और एक बार सांसद बने। 1998 में जब सम्राट चौधरी खगड़िय लोकसभा सीट से सांसद बने तब उनकी पारंपरिक तारापुर सीट से उनकी पत्नी और सम्राट चौधरी की माता पार्वती देवी विधायक बनी। सम्राट चौधरी एक छोटे से गांव से निकलकर एक मदरसे में पढ़कर मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे हैं। सम्राट चौधरी लखनपुर की कच्ची गलियों में एक मकान की छत पर बने 'मदरसा इस्लामिया' में पढ़े हैं।

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सम्राट चौधरी की राजनीतिक शिक्षा अलग अलग हस्तियों के साथ हुई। 1990 में राजनीति में प्रवेश के बाद सन 2014 में राष्ट्रीय जनता दल छोड़ने से पहले उन्होंने काफी लंबा समय लालू प्रसाद के साथ गुजारा। लालू प्रसाद के साथ राजनीति की स्कूलिंग के बाद उन्होंने आगे के चार वर्ष नीतीश कुमार के साथ गुजरे और उसके बाद भाजपा की राजनीतिक भठ्ठी में तप कर कुंदन बन गए। नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जदयू) में आने के बाद 2014 में वह विधानपरिषद के सदस्य बने, जबकि अगले टर्म 2020 में उनको भाजपा ने विधानपरिषद में भेजा।

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2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 74 और जदयू को सिर्फ 43 सीटें मिली। बावजूद इसके मुख्यमंत्री का पद नीतीश कुमार के पास ही रहा। राजनीतिक पंडितों ने कहा कि भाजपा के पास आक्रामक नेतृत्व की कमी है। फिर क्या था, भाजपा ने बिहार के अनुकूल जातीय समीकरण के साथ एक आक्रामक नेता की खोज शुरू की। इन्ही परिस्थितियों में जब जदयू और भाजपा के बीच मुख्यमंत्री पद की जद्दोजहद चल रही थी, 9 अगस्त 2022 को नीतीश कुमार ने फिर राजग से नाता तोड़ लिया और महागठबंधन में शामिल हो गए। यह वह स्थान था, जहां से भाजपा ने अपने लिए एक स्थाई मुख्यमंत्री के चेहरे की तलाश शुरू की। पार्टी ने 2021-22 में नीतीश मंत्रिमंडल में पंचायती राज मंत्री रहे और अगस्त 2022 से बिहार विधानपरिषद में विपक्ष ने नेता पद पर काबिज सम्राट चौधरी को 23 मार्च 2023 को संजय जायसवाल की जगह बिहार में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। इस परिवर्तन पर बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने तंज कसते हुए कहा था कि ‘भाजपा अब बनियों की पार्टी नही रही।‘

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दरअसल, इस परिवर्तन के साथ सम्राट चौधरी के रूप में भाजपा एक ऐसे शक्श को ले कर आई जो कुशवाहा बिरादरी के एक बड़े नेता शकुनी चौधरी का पुत्र था। शकुनी चौधरी कभी लालू प्रसाद के यादव मतों के खिलाफ खड़े हुए नीतीश के लव(कुर्मी) और कुश (कोइरी) समीकरण के ध्वजवाहक रहे थे। सम्राट चौधरी को ला कर भाजपा ने नीतीश कुमार के कोइरी-कुर्मी समीकरण में सेंध डालने के साथ उस छवि को भी उतरने का प्रयास किया, जिसमे उसको अगड़ों की पार्टी कहा जाता था।सम्राट चौधरी ने 2023 में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनते ही अपने आक्रामक तेवर दिखाने शुरू कर दिये। उन्होंने सर पे मुरेठा बांध लिया और कहा कि अब यह मुरेठा बिहार में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटा कर ही उतरेगा। यह अलग बात है कि अगले ही साल 2024 में जदयू-भाजपा पुनः साथ आ गए और चौधरी को नीतीश कैबिनेट में जगह के साथ उपमुख्यममंत्री का ओहदा भी मिल गया। चौधरी ने भी इसके बाद सरयू नदी में स्नान के दौरान अपना मुरेठा यह कह कर उतार दिया कि कसम महागठबंधन के मुख्यमंत्री को गद्दी से उतरने की खाई थी।

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2024 में पुनः जदयू-भाजपा गठजोड़ के बाद अगले साल अक्टूबर-नवंबर में बिहार विधानसभा चुनाव हुए। नीतीश कुमार के अस्वस्थ होने की खबरों के बीच उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को सरकार के प्रशासन में दखल देने के अवसर ज्यादा मिलने शुरू हुए। वह एक साये की तरह मुख्यमंत्री कुमार की सभाओं में भाग लेते रहे। 2025 विधानसभा चुनाव में राजग को 243 के सदन में 202 सीटों की प्रचंड जीत मिली। इस बार भी 2020 की तरह भाजपा को जदयू से ज्यादा सीटें मिली। भाजपा 89 सीटों के साथ सदन में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। 2014 से लगातार विधान परिषद का सदस्य रहे सम्राट चौधरी इस बार अपने पिता की विरासत तारापुर सीट से 2025 में चुनाव लड़े और प्रचंड बहुमत के साथ जीत कर विधानसभा में पहुंचे।

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2025 के विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन तो गये, लेकिम अटकलें तेज हो गयीं कि भाजपा शीघ्र ही बिहार में शीर्ष पद हथिया लेगी। चुनाव से पहले ही भाजपा के फायर ब्रांड नेता केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने संकेत दिए थे कि सम्राट चौधरी बिहार के अगले मुख्यमंत्री बन सकते हैं। जनसुराज के नेता और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी भविष्यवाणी की थी कि राजग चुनाव जीत भी जाये तो अब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नही रहेंगे।

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नवंबर 2025 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद नई कैबिनेट में सम्राट चौधरी को गृह मंत्रालय मिलना, उनके बढ़ते प्रभाव का एक और संकेत था। नीतीश कुमार ने अपने दो दशकों के मुख्यमंत्रित्व काल में पहली बार गृहमंत्रालय छोड़ा था। मार्च 2026 में अचानक इस बात की खबर आई कि नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं। 15 मार्च को राज्यसभा चुनाव में नीतीश कुमार की जीत के बाद बिहार में नये मुख्यमंत्री के चेहरे की तलाश शुरू हुई। इस क्रम में मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा में नितिन नवीन, नित्यानंद राय, धर्मशीला गुप्ता, श्रेयसी सिंह, मंगल पांडेय, दिलीप जायसवाल सहित दर्जन भर नामों की चर्चा राजनीतिक गलियारों में चलती रही, लेकिन सम्राट चौधरी शुरू से पहले स्थान पर ट्रेंड करते रहे और आखिर में बिहार के चौबीसवें और भाजपा के पहले मुख्यमंत्री का ओहदा उनको मिल ही गया।

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