वेनेजुएला के तेल पर US का कंट्रोल : भारत के लिए बना चिंता का विषय, जानें कैसे ?
वेनेजुएला में अमेरिकी दखल
नालिस्ट और इंडस्ट्री सूत्रों ने कहा कि वेनेजुएला के तेल सेक्टर पर US के नेतृत्व में कब्ज़ा या रीस्ट्रक्चरिंग से भारत को सीधा फायदा हो सकता है, जिससे लंबे समय से अटके लगभग 1 अरब अमेरिकी डॉलर के बकाए का रास्ता खुल सकता है
नई दिल्ली। वेनेजुएला के राजनीतिक घटनाक्रम और वहां के तेल क्षेत्र पर संभावित अमेरिकी नियंत्रण ने भारत के ऊर्जा भविष्य के लिए नई उम्मीदें जगा दी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के हटने के बाद अमेरिका वहां के तेल बुनियादी ढांचे का पुनर्गठन करता है, तो भारत को न केवल अपना बकाया $1 अरब (लगभग 8,400 करोड़ रुपये) वापस मिल सकता है, बल्कि कच्चे तेल की आपूर्ति में भी भारी उछाल आ सकता है।
अटका हुआ लाभांश और उत्पादन में गिरावट
ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (OVL) का सैन क्रिस्टोबल तेल क्षेत्र में 40% हिस्सा है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण 2014 से उसका करीब $536 मिलियन का लाभांश अटका हुआ है। कुल बकाया अब $1 अरब के करीब पहुंच चुका है। प्रतिबंधों की वजह से इस क्षेत्र का उत्पादन गिरकर महज 5,000-10,000 बैरल प्रति दिन (bpd) रह गया है।
तकनीकी सहयोग और उत्पादन क्षमता
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि प्रतिबंध हटते हैं, तो OVL गुजरात से अपने उन्नत रिग्स और उपकरण वेनेजुएला भेज सकता है। इससे सैन क्रिस्टोबल क्षेत्र का उत्पादन बढ़कर 80,000 से 1,00,000 bpd तक पहुंच सकता है। इसके अलावा, कैराबोबो-1 प्रोजेक्ट में भी इंडियन ऑयल (IOC) और ऑयल इंडिया (OIL) की हिस्सेदारी है, जिसे पुनर्जीवित किया जा सकेगा।
भारतीय रिफाइनरियों के लिए रणनीतिक लाभ
रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी जैसी भारतीय रिफाइनरियां वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन की गई हैं। 2020 से पहले भारत 4,00,000 bpd तेल आयात करता था। अमेरिकी नियंत्रण के बाद, भारत को रूसी तेल पर निर्भरता कम करने और मध्य पूर्व के देशों के साथ कीमतों पर बेहतर सौदेबाजी करने में मदद मिलेगी।
भू-राजनीतिक बदलाव
वेनेजुएला के पास 303 बिलियन बैरल का दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। अमेरिका का इस पर नियंत्रण चीन के प्रभाव को कम करेगा और वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर करने में मदद करेगा। भारत के लिए यह न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने का मौका है, बल्कि लैटिन अमेरिका में अपनी रणनीतिक पहुंच बढ़ाने का भी द्वार है।

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