तापमान में बढ़ोतरी का खेती पर नकारात्मक असर

2024 की फरवरी सर्वाधिक गर्मी वाला माह रहा 

तापमान में बढ़ोतरी का खेती पर नकारात्मक असर

जलवायु परिवर्तन का असर खेती किसानी पर साफ दिखाई देने लगा है।

जलवायु परिवर्तन का असर खेती किसानी पर साफ दिखाई देने लगा है। कहा जा रहा था कि 2024 की फरवरी सर्वाधिक गर्मी वाला माह रहा है पर 2025 में जनवरी में जिस तरह से तापमान में बढ़ोतरी देखी गई है और फरवरी में ही देश के अधिकांश हिस्सों खासकर उत्तरी भारत में तापमान में लगातार तेजी देखी जा रही है, वह चिंतनीय होती जा रही है। दिल्ली, उत्तरप्रदेश,  मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान सहित अनेक प्रदेशों में फरवरी में अधिकतम तापमान का आंकड़ा 30 डिग्री को छूने को बेताब हो रहा है। देश के कई हिस्सों में दिन का तापमान 29 डिग्री को पार कर रहा है। यह कोई हमारे देश के ही हालात नहीं हैं अपितु दुनिया के अधिकांश देशों में जलवायु परिवर्तन का असर साफ  दिखाई देने लगा है। बढ़ता तापमान बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। बढ़ते तापमान के कारण परिस्थिति तंत्र प्रभावित हो रहा है। बीमारियां तो फैल ही रही हैं संपूर्ण तंत्र पर ही नकारात्मक प्रभाव पड़ता जा रहा है। 

चिंतनीय यह है कि एक और हम निरंतर घटते भूजल स्तर से प्रभावित हो रहे हैं तो ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का असर दिखाई दे रहा है। असमय अतिवृष्टि, अनावृष्टि, तूफान, जंगलों में आग आदि आदि सीधा असर दिखाई दे रहा है। जहां तक खेती-किसानी का प्रश्न है मौसम के अप्रत्याशित बदलाव से फसल चक्र पर नकारात्मक असर दिखने लगा है। बुआईं से लेकर फसल के पक कर तैयार होने का चक्र होता है। दर असल हो यह रहा है कि जिस समय फसल में फूल आने का समय होता है उस समय तापमान बढ़ने से इनका विकास रुक जाता है और फसल पकने लगती है, इससे फसल में खराब और उत्पादन में कमी होना स्वाभाविक हो जाता है। दिसंबर, जनवरी की सर्दी और फरवरी में औसत तापमान से फसलों का सही ढंग से विकास संभव हो पाता है। एक अन्य चिंतनीय कारण यह भी बनता जा रहा है कि मावठ के समय मावठ नहीं होती, सर्दियों की बरसात के समय बरसात नहीं होती और जिस समय तापमान में बढ़ोतरी होनी चाहिए उस समय आंधी, तूफान और बरसात आकर फसल को चौपट करने में कोई कमी नहीं छोड़ती। 

इसका सीधा सीधा असर खाद्यान्न संकट के रुप में देखा जा सकता है। जब फसल की कटाई का समय होता है उस समय आंधी तूफान या ओला-बरसात होकर फस्ल को चौपट करने में कमी नहीं छोड़ती। इसी तरह से जनवरी-फरवरी में जब तापमान में गिरावट की आवश्यकता होती है उस समय तापमान में बढ़ोतरी चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन के हालात यही रहे तो कुछ खाद्य वस्तुओं के भावों में कई गुणा तक बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। तापमान की असामयिक उतार-चढ़ाव के चलते कृषि पैदावार पर सीधा सीधा नकारात्मक असर पड़ रहा है। कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है। गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। इससे साफ  हो जाता है कि खाद्य वस्तुओं के भाव बढ़ेंगे ही और उसका सीधा असर हमें महंगाई के रुप में देखने को मिलेगा। मजे की बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के देशों में तेजी से बंजर होती भूमि को लेकर चिंता तो जताई जा रही है पर अभी तक इन हालातों से निपटने का ठोस आधार तैयार नहीं किया जा सका है।

आज दुनिया के देश आसन्न खाद्यान्न संकट को लेकर चिंतित है। इसके लिए बड़े बड़े सम्मेलनों में चिंतन मनन हो रहा है। विश्व खाद्य संगठन सहित दुनिया की संस्थाएं इस संकट को लेकर परेशान हैं। जलवायु परिवर्तन का असर जब साफ साफ  सामने आने लगा है तो उस हालात में मौसम विज्ञानियों और कृषि विज्ञानियों के सामने बड़ी चुनौती आ गई है। एक और जलवायु परिवर्तन को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले कारकों का कोई ना कोई विकल्प खोजना ही होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि इलेक्ट्रोनिक उत्पादों व नई नई खोजों ने हमारा जीवन आसान बनाया है पर उसके साइड इफेक्ट तेजी से असर दिखाने लगे हैं। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने भूमि की उर्वरा शक्ति को प्रभावित किया है। अत्यधिक जल दोहन से भूजल का स्तर साल दर साल नीचे जाता जा रहा है। 

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भू क्षरण होने लगा है। भूमि तेजी से बंजर होती जा रही है। प्रयास यह करना होगा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे मौसम चक्र के बदलाव के अनुकूल फसलों की किस्में तैयार हो। क्योंकि प्रकृति से छेड़छाड़ करने में हमने कोई कमी नहीं छोड़ी और उसका खामियाजा हमें आज भुगतना पड़ रहा है। तेज सर्दी के समय गर्मी से दो चार होना पड़ रहा है। इस सबके साथ ही धरती के बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने के उपायों पर ध्यान देना होगा। हालात गंभीर चिंतनीय होते जा रहे हैं और यही हालात रहे तो इसका असर सारी दुनिया को भुगतना होगा।  

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-डॉ.राजेन्द्र प्रसाद शर्मा 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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