जानें राज काज में क्या है खास
चर्चा में अनडिसीप्लन
सूबे में हाथ वाले भाई लोगों में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।
कुछ तो गड़बड़ है :
सूबे में हाथ वाले भाई लोगों में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। गड़बड़ भी छोटी-मोटी नहीं बल्कि दिन का चैन और रातों की नींद उड़ाने वाली है। मारवाड़ से शुरू हुई यह गड़बड़ अब पूरे सूबे में पैर पसार चुकी है। इस गड़बड़ ने सूबे के नेताओं के साथ ही दिल्ली वाले लीडर्स तक की नींद उड़ा दी है। चौकड़ी को समझ में नहीं आ रही कि ऐसी कौनसी चूक हुई, जिसकी वजह से सबकुछ गड़बड़ हो गया। अब इनको कौन समझाए कि जब नवरात्रों में घर की देवी माताजी को छोड़ दूसरे पीरों के देवरो ढोकेंगे, तो बताशों की आस लगानी बेकार है। देवी माताजी के रुद्र रूप को शांत करने के लिए भोपे को बुलाकर देवरे पर अखाड़ा तो करना ही पड़ेगा। बाकी तो बाबा जाने मन की बात। समझने वाले समझ गए ना समझे वो अनाड़ी है।
चर्चा में दिन के सपने :
सपने तो सपने ही होते हैं, कब किसको दिखने लगें, कुछ कहा नहीं जा सकता। कई भाई लोग रात को हसीन सपने देखते हैं, तो लोगों को दिन में भी सपने देखने का रोग है। अब देखो ना भगवा वाले कुछ भाई लोगों को दिन में सपने देखने की बीमारी फिर से होने लगी है। उनको दोपहर होते ही राज की कुर्सी के सपने दिखने लगते हैं। सपनों की वजह से न तो वे ठीक से खा पाते हैं और पचा पाते हैं। अब उनको कौन समझाए कि मुंगेरीलाल के सपने देखने से कोई फायदा नहीं है, चूंकि कई सालों का पॉलिटिक्ल एक्सपीयरेंस रखने वाले गुजराती बंधु मोटा भाई-छोटा भाई अटारी के वंशज भजन जी भाई साहब का जो रास्ता तय करेंगे, सिर्फ अपनी मर्जी से ही करेंगे। जानने वाले सब जानते है, कि वे जितना ऊपर है, उससे सौ गुणा नीचे तक उनकी जड़ें हैं।
चर्चा में अनडिसीप्लन :
इन सूबे में भगवा वाले भाई लोगों में अनडिसीपलेन को लेकर चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों नहीं, मामला डिसीपलेन और अनडिसीपलेन से ताल्लुकात जो रखता है। जब भी कैबिनेट रिसफलिंग की सुगाबुगाहट शुरू होती है, सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर अनडिसीप्लिन वालों की लंबी चौड़ी लिस्ट बनने लगती है। इस बार की सूची वैसे तो जगजाहिर है, लेकिन वर्कर्स ने उसमें कुछ और नाम जोड़ दिए। ठिकाने पर सालों से आने वालों में चर्चा है कि चार दषक पुरानी पार्टी में अनडिसीपलेन करने वालों को बाहर का रास्ता दिखा कर ही मैसेज दिया गया है, हर गलती कीमत मांगती है। इस बार भी राज की कुर्सी संभालने वाले भाई साहब मैसेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, बाकी बाबा जाने मन की बात। समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।
तलाश तोड़ की :
आजकल सूबे के बड़े साहब एक चीज का तोड़ तलाशने में जुटे हैं। तोड़ भी हल्का नहीं है। सुशासन में रोड़ा बन रहे डिजायर सिस्टम को रोकने का तोड़ जानने के लिए सीएमआर में आने-जाने वालों से राय ली जा रही है। बदलियों में डिजायर सिस्टम के चलते सुशासन संभव नहीं है। राज का काज करने वाले भी तोड़ ढूंढने में लगे हैं। लंच केबिन में चिंता व्यक्त की जा रही है कि सूबे के राजा की मंशा तो साफ है, लेकिन वजीरों की सोच के आगे बेबस है।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि सिविल सर्विस के ब्यूरोक्रेसी को लेकर है। ब्यूरोक्रेसी के दो कैडरों में दिन रात का फर्क दिखाई देने लगा है। खाकी वाले कैडर में सब संतुष्ट है, चूंकि उनमें नंबर वन को लेकर कोई डिससेटिफाइड नहीं है, सो सलामी भी दिल से मिल रही है। दूसरा कैडर है, जिसके अफसर राज की नीति बना कर उनको लागू कराने में माहिर है, लेकिन इन दिनों उनमें सेटिसफेक्शन नहीं है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि उनमें से बेचारे कई ब्यूरोक्रेट्स तो रोजाना दांत पीस-पीसकर अपना मुंह कड़वा किए बिना नहीं रहते। चूंकि गुजरे जमाने में सोशल इंजीनियरिंग के चक्कर में पाटलिपुत्र की परम्परा को तोड़ उनके साथ जो किया गया, उसकी तो सपने में भी उम्मीद नहीं थी।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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