राज काज में क्या है खास, जानें
चर्चा में साहब और उनका हिसाब
खाकी वाले साहब और करोड़ों का हिसाब :
मरु प्रदेश की राजधानी गुलाबीनगर के लालकोठी इलाके में बने दफ्तर में तैनात खाकी वाले एक साहब इन दिनों सरकारी फाइलों से ज्यादा एक खास रजिस्टर में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेते नजर आ रहे हैं। मामला भाईजान के नवाबों वाले शहर से होते हुए पिंकसिटी को पानी पिलाने वाले बीसलपुर डैम तक पहुंचा, तो साहब भी पार्टनर की भूमिका में मैदान में उतर गए। आदर्शनगर वाले भाई साहब से जुड़ा यह किस्सा अब हिसाब-किताब की नई इबारत लिख रहा है। पीएचक्यू में बैठे खाकी वाले साहब लोगों में खुसरफुसर है कि पिछले दिनों हिसाब में कुछ ऐसी गड़बड़ी नजर आई कि साहब ने हिसाब मांगने के बजाय सीधे हिसाब का रजिस्टर ही उठा कर अपने कब्जे में कर लिया। रजिस्टर खुला तो जोड़-बाकी और गुणा-भाग करने में ऐसी कलाबाजी दिखाई कि अच्छे-अच्छे मुनीम की आंखें भी फटी रह गईं। अब तकादा चल रहा है और यह है कि मुनाफा लाखों का नहीं करोड़ों का है। यानी साझेदारी छोटी, हिसाब बड़ा और रजिस्टर सबसे भारी। अब देखना यह है कि अगला पन्ना कौन पलटता है-रजिस्टर या राज।
चर्चा में साहब और उनका हिसाब :
सूबे में इन दिनों कुछ भाई लोगों का हिसाब चर्चा में है। अब देखो ना, शहरी सरकारों के चुनाव में पब्लिक ने जिस तरह से हाथ वाले भाई लोगों को अपेक्षा से जिताया, उससे लगा था कि पुराने राज की नीतियों की याद अभी पूरी तरह धुंधली नहीं हुई है। मगर चुनाव के बाद शुरू हुआ असली गणित। हाथ वाली पार्टी के बड़े नेताओं की आपसी खींचतान और निकायों में बोर्ड बनाने की कवायद में आंकडा ऐसा पलटा कि 574 निर्वाचित सदस्य भगवा वालों के साथ जा खड़े हुए। अब बेचारी पब्लिक सोच रही है कि वोट हमने दिया था बदलाव के लिए या बोर्ड की चाबी किसी और को सौंपने के लिए। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि इलेक्शन के समय जनादेश की बड़ी-बड़ी बातें और रिजल्ट आते ही समर्थन का नया समीकरण। लगता है कि लोकतंत्र में अब वोट की स्याही सूखने से पहले ही अंकगणित की स्याही गहरी हो जाती है। पब्लिक की भावनाएं अपनी जगह। सवाल बस इतना है कि अगली बार वोटर रसीद मांगेगा या फिर पुराना हिसाब-किताब चलेगा।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि सुरा से ताल्लुक रखता है। सुरा भी देशी नहीं बल्कि अंग्रेजी है और अलग-अलग ब्राण्डों की। जुमला है कि सूबे में शराब की दुकान का शटर देखकर अगर कोई यह समझे कि अब दुकान बंद हो गई, तो वह मासूम है। सूबे में इन दिनों नया नियम चल रहा है कि शटर बंद, धंधा चालू। फर्क सिर्फ इतना सा है कि दुकान सामने से बंद और कारोबार पर्दे के पीछे जारी। अब कहने वालों का कोई मुंह थोडेÞ ही पकड़ा जाता है, वो तो चौड़े बोलते हैं कि पीसीआर की मौजूदगी में एट पीएम के बाद भी शराब बिकती है। इसकी शिकायतें भी होती हैं, लेकिन कार्रवाई का पता नहीं चलता। आखिर शटर से ज्यादा मजबूत है, शराब का सिस्टम या शिकायत करने वालों की आवाज कमजोर। और तो और नियम-कायदे शटर के बाहर टंगे रहते हैं और धंधा शटर के भीतर चलता रहता है। खाकी वाले साहब लोगों भी शायद इंतजार रहता है कि शराब खुद चलकर थाने पहुंचे और कहे कि साहब, मेरे खिलाफ कार्रवाई कर लीजिए।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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