चिंता की लकीरें : दीपावली के उजाले में सूखे खेतों का अंधेरा
14 जिलों की 80 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने की खबर
दीपावली का त्योहार रोशनी, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है। घरों में दीप जलते हैं, बाजारों में रौनक लौटती है और किसान अपनी उपज से बेहतर आमदनी की उम्मीद करते हैं। लेकिन राजस्थान में इस बार दीपावली के उल्लास के बीच सूखे खेतों और पानी की कमी की चिंता भी मौजूद है। जब शहरों में रोशनी की सजावट और खरीदारी की चहल-पहल दिखाई दे रही है, तब प्रदेश के 14 जिलों की 80 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने की खबर ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों की ओर ध्यान खींचती है। इनमें 69 तहसीलें गंभीर और 11 मध्यम रूप से प्रभावित बताई गई हैं। एक जून से 30 सितंबर के बीच राज्य में 350.83 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य औसत 424.71 मिलीमीटर है। ये आंकड़े केवल वर्षा की कमी नहीं, बल्कि खेती-किसानी के सामने खड़ी चुनौती का संकेत हैं।
दीपावली भारतीय जीवन में नई शुरुआत का पर्व है। पर राजस्थान के किसान के लिए नई शुरुआत तभी संभव है, जब खेत में फसल हो, पशुओं के लिए चारा हो और घर में अगली बुवाई की उम्मीद बची रहे। खरीफ की फसल को नुकसान होने पर किसान की आमदनी घटती है, जबकि बीज, खाद, डीजल और मजदूरी पर किया गया खर्च उसके सिर पर बना रहता है। ऐसे में त्योहार की खुशियां भी आर्थिक चिंता से घिर जाती हैं। जिन परिवारों की आजीविका खेती और पशुपालन पर निर्भर है, उनके लिए दीपावली का अर्थ केवल नए कपड़े और मिठाइयां नहीं, बल्कि घर के खर्च पूरे करने और आने वाले मौसम की तैयारी करने की चिंता भी है। राजस्थान का इतिहास सूखे और अकाल से संघर्ष की कहानियों से भरा पड़ा है। यहां पानी की कमी ने जीवनशैली, खेती, खानपान और सामाजिक परंपराओं को आकार दिया। टांके, नाड़ियां, जोहड़, तालाब, बावड़ियां और खड़ीन जैसी व्यवस्थाएं इस बात का प्रमाण हैं कि मरुस्थल के लोगों ने वर्षाजल की हर बूंद का महत्त्व समझा था। पानी सहेजना उनके लिए केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि जीवन बचाने का उपाय था। आज प्रश्न यह है कि जल संरक्षण की इतनी समृद्ध विरासत के बावजूद प्रदेश को बार-बार इसी संकट का सामना क्यों करना पड़ता है। बदलती वर्षा, भूजल का अत्यधिक दोहन और पारंपरिक जलस्रोतों की उपेक्षा ने समस्या को अधिक गंभीर बनाया है। सूखाग्रस्त घोषित करना आवश्यक प्रशासनिक कदम हो सकता है, लेकिन इसकी सार्थकता राहत के समय पर मिलने से तय होगी।
प्रभावित क्षेत्रों में फसल खराबे का पारदर्शी सर्वेक्षण, पात्र किसानों को सहायता, फसल बीमा दावों का शीघ्र निपटारा और ग्रामीण रोजगार की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। चारा डिपो, पशुओं के लिए पानी और जरूरतमंद गांवों में पेयजल की व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा। राहत प्रक्रिया इतनी सरल हो कि संकट झेल रहे परिवारों को सहायता पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें। दीपावली का संदेश केवल दीप जलाने तक सीमित नहीं है; यह अभाव और निराशा के बीच आशा जगाने का अवसर भी है। इस भावना को जल संरक्षण के संकल्प से जोड़ा जा सकता है। गांवों में तालाबों और नाड़ियों का पुनरुद्धार, वर्षाजल संचयन, जलग्रहण क्षेत्रों का विकास और भूजल पुनर्भरण भविष्य के संकट को कम करने में मदद कर सकते हैं। मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के जरिए ग्रामीण रोजगार और जल संरक्षण को साथ आगे बढ़ाना उपयोगी होगा। खेती में भी स्थानीय जलवायु के अनुकूल बाजरा, ग्वार, मूंग और मोठ जैसी फसलों को प्रोत्साहन देने के साथ किसानों को बाजार और उचित मूल्य की सुरक्षा उपलब्ध करानी होगी। राजस्थान में दीपावली की खुशियां तभी व्यापक अर्थों में सार्थक होंगी, जब उनका उजाला गांवों तक पहुंचे और सूखे से जूझते परिवार भी भविष्य के प्रति आश्वस्त हो सकें।
सरकार की जिम्मेदारी है कि राहत घोषणाओं को धरातल पर उतारे और दीर्घकालीन जल-सुरक्षा को विकास की प्राथमिकता बनाए। समाज और नागरिकों की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। पानी का विवेकपूर्ण उपयोग, स्थानीय जलस्रोतों की देखभाल और सामुदायिक भागीदारी को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा। दीपावली के दीप तभी पूरी रोशनी देंगे, जब खेतों में उम्मीद की हरियाली लौटेगी, पशुओं को पानी मिलेगा और किसान का घर चिंता से मुक्त होगा। उत्सव की असली सार्थकता यही है कि समृद्धि का उजाला केवल शहरों और बाजारों तक सीमित न रहे, बल्कि उन गाँवों तक भी पहुंचे, जहां आज सूखे की मार के बीच अगली फसल और अगले मानसून की उम्मीद बचाए रखने की जद्दोजहद चल रही है।
बलवंत राज मेहता, वरिष्ठ पत्रकार
ये लेखक के अपने विचार हैं।

Comment List