जहां सपने बसते हैं, वहां सुरक्षा भी बसनी चाहिए              

निर्णायक कदम उठाने होंगे

जहां सपने बसते हैं, वहां सुरक्षा भी बसनी चाहिए              
दिल्ली और लखनऊ के अग्निकांड केवल हादसे नहीं, बल्कि चेतावनी हैं कि यदि छात्रावासों, हॉस्टलों और सार्वजनिक भवनों की सुरक्षा को आज प्राथमिकता नहीं बनाया गया, तो कल किसी और शहर में सपने नहीं, भविष्य जल सकता है।

दिल्ली और लखनऊ के अग्निकांड केवल हादसे नहीं, बल्कि चेतावनी हैं कि यदि छात्रावासों, हॉस्टलों और सार्वजनिक भवनों की सुरक्षा को आज प्राथमिकता नहीं बनाया गया, तो कल किसी और शहर में सपने नहीं, भविष्य जल सकता है। 3 जून को दिल्ली में हुआ भीषण अग्निकांड और 22 जून को लखनऊ में सामने आई अग्नि दुर्घटना दो अलग अलग घटनाएं अवश्य हैं, लेकिन दोनों एक ही संदेश देती हैं,भारत के तेजी से विकसित होते शहरों में भवन सुरक्षा और आपदा प्रबंधन अब केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिक सुरक्षा का केंद्रीय प्रश्न बन चुके हैं। हर अग्निकांड के बाद कुछ दिनों तक चर्चा होती है, जांच समितियां बनती हैं, जिम्मेदार लोगों की तलाश होती है और फिर समय के साथ सब कुछ सामान्य हो जाता है। किंतु आग की ये घटनाएं केवल समाचार नहीं हैं, ये ऐसी चेतावनियां हैं जो हमें बताती हैं कि विकास की दौड़ में सुरक्षा को पीछे छोड़ने की कीमत कितनी भारी पड़ सकती है।

पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था हो :

दिल्ली और लखनऊ की घटनाओं ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि आग लगने का कारण चाहे विद्युत शॉर्ट सर्किट हो, गैस रिसाव हो, अव्यवस्थित वायरिंग हो या मानवीय भूल, वास्तविक त्रासदी तब होती है जब भवनों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं होती। आग लगना कई बार दुर्घटना हो सकता है, लेकिन आग लगने के बाद लोगों का सुरक्षित बाहर निकल पाना अक्सर व्यवस्था की कमजोरी का परिणाम होता है। यही वह बिंदु है जिस पर देश को गंभीरता से विचार करना होगा। बहुमंजिला इमारतें, कोचिंग संस्थान, हॉस्टल, होटल, अस्पताल और व्यावसायिक परिसर तेजी से बढ़ रहे हैं। कई बार भवन निर्माण के समय सुरक्षा मानकों का पालन किया जाता है, लेकिन बाद में रखरखाव, नियमित निरीक्षण और आपदा प्रबंधन की संस्कृति विकसित नहीं हो पाती परिणामस्वरूप एक छोटी सी चिंगारी भी बड़ी त्रासदी का रूप ले सकती है। इन घटनाओं के संदर्भ में राजस्थान के कोटा शहर का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। कोटा केवल एक शहर नहीं, बल्कि देश की शिक्षा राजधानी के रूप में पहचाना जाता है। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या कोटा के सभी हॉस्टल आधुनिक सुरक्षा मानकों पर खरे उतरते हैं।

निर्णायक कदम उठाने होंगे :

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दुनिया तेजी से स्मार्ट सुरक्षा प्रणालियों की ओर बढ़ रही है और भारत को भी इस दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे। आज इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित सेंसर ऐसे उपलब्ध हैं जो धुएं, गैस रिसाव और तापमान में असामान्य वृद्धि का तुरंत पता लगा सकते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कैमरे आग या धुएं के शुरुआती संकेतों को पहचानकर चेतावनी दे सकते हैं। स्वचालित स्प्रिंकलर सिस्टम आग को फैलने से पहले नियंत्रित कर सकते हैं। यदि इन तकनीकों को बड़े हॉस्टलों, कोचिंग संस्थानों और सार्वजनिक भवनों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए तो अनेक संभावित दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। एक और महत्वपूर्ण सुधार डिजिटल सुरक्षा निगरानी प्रणाली हो सकती है। जिस प्रकार वाहनों के लिए फिटनेस प्रमाणपत्र आवश्यक होता है, उसी प्रकार बड़े हॉस्टलों और सार्वजनिक भवनों के लिए वार्षिक सुरक्षा फिटनेस प्रमाणपत्र अनिवार्य बनाया जा सकता है। प्रत्येक भवन का सुरक्षा रिकॉर्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हो, जहां यह स्पष्ट रूप से दिखाई दे कि अंतिम निरीक्षण कब हुआ, कौन कौन सी कमियां पाई गईं और उन्हें कब दूर किया गया। ऐसी पारदर्शिता केवल जवाबदेही बढ़ाएगी बल्कि नागरिकों का विश्वास भी मजबूत करेगी।

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राष्ट्रीय मॉडल बने :

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जापान जैसे देशों में आपदा प्रबंधन शिक्षा का हिस्सा है। बच्चे स्कूल स्तर से ही सीखते हैं कि आग, भूकंप या अन्य आपदा की स्थिति में क्या करना है। भारत में भी ऐसी संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता है। विशेष रूप से कोटा जैसे शहर में, जहां हजारों युवा घर से दूर रहकर अध्ययन कर रहे हैं, सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाने चाहिए। यह भी ध्यान रखना होगा कि सुरक्षा का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि विश्वास पैदा करना है। जब किसी शहर में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होती है तो वहां रहने वाले लोग अधिक आत्मविश्वास के साथ अपना कार्य कर पाते हैं। दिल्ली और लखनऊ की घटनाओं से हमें यह सीखना चाहिए कि किसी भी दुर्घटना के बाद केवल दोषी खोज लेना पर्याप्त नहीं है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम उन परिस्थितियों को पहचानें जो ऐसी दुर्घटनाओं को जन्म देती हैं और उन्हें समय रहते दूर करें। आग की घटनाएं हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि सावधान करने के लिए होती हैं। यदि हम उनसे सीख लेते हैं तो वे भविष्य की त्रासदियों को रोकने का माध्यम बन सकती हैं। कोटा जैसे शिक्षा नगर के लिए यह अवसर है कि वह केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता का ही नहीं, बल्कि छात्र सुरक्षा का भी राष्ट्रीय मॉडल बने।

आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण :

यदि यहां आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और जवाबदेही आधारित व्यवस्था को व्यापक रूप से लागू किया जाता है, तो यह पूरे देश के लिए एक प्रेरक उदाहरण बन सकता है। अंततः किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी इमारतों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि उनमें रहने वाले लोगों की सुरक्षा से होती है। दिल्ली और लखनऊ के अग्निकांड हमें यह याद दिलाते हैं कि विकास और सुरक्षा एक दूसरे के पूरक हैं, विकल्प नहीं। यदि हम आज जागरूकता, तकनीक,प्रशिक्षण और जवाबदेही के माध्यम से सुरक्षा की मजबूत नींव रख सकें, तो आने वाली पीढ़ियां अधिक सुरक्षित वातावरण में जीवन और शिक्षा प्राप्त कर सकेंगी। यही इन त्रासदियों से प्राप्त सबसे महत्वपूर्ण सबक और सबसे सार्थक श्रद्धांजलि होगी।

-गोपेश शर्मा

यह लेखक के अपने विचार हैं।

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