बेटियां ही सरकारी स्कूलों की उम्मीद क्यों?
आर्थिक स्थिति और शिक्षा की गुणवत्ता
आज इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में एक तरफ महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और लैंगिक समानता के बड़े-बड़े दावे देशभर में गूंज रहे हैं, वहीं देश के भीतर से आने वाली कुछ तस्वीरें हमें अपने ही अंतर्विरोधों का सामना करने पर मजबूर करती हैं। जमीनी हकीकत भी समाज के इन दावों को पूरी तरह खारिज कर उसे आईना दिखा रही है। राजस्थान के शिक्षा विभाग से सामने आए हालिया आंकड़े ऐसे ही भेदभाव का जीवंत उदाहरण बने हैं। यह केवल सरकारी स्कूलों में दाखिले की संख्या नहीं हैं, बल्कि यह हमारे समाज की गहरी रूढ़िवादी सोच और संकीर्ण मानसिकता का एक जीवंत दस्तावेज हैं। आंकड़े बयां कर रहे हैं कि आज भी परिवारों के लिए बेटा एक आर्थिक निवेश है, जबकि बेटी एक वित्तीय जिम्मेदारी या पराया धन। प्रदेश के शिक्षा विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो यही तस्वीर सामने आती है। यहां के सरकारी स्कूलों में दाखिले के आंकड़ों की यह सच्चाई समाज को न सिर्फ सोचने पर मजबूर कर रही है, बल्कि यह शिक्षा की नीतियों से लेकर परिवारों की सोच भी सामने ला रही है, जो ये कहते हैं कि बेटे और बेटी में कोई फर्क नही।
शिक्षा विभाग के आंकड़े :
यह उस सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें बेटे की शिक्षा को भविष्य का निवेश और बेटी की शिक्षा को आवश्यक जिम्मेदारी समझा जाता है। पहली नजर में यह लग सकता है कि बेटियां पढ़ाई में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू बेहद स्याह है। हकीकत यह है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में यदि किसी परिवार में एक बेटा और एक बेटी है, तो माता-पिता अपने सीमित संसाधनों का इस्तेमाल बेटे को महंगे प्राइवेट स्कूलों में भेजने के लिए कर रहे हैं। वहीं, बेटियों को मुफ्त या कम खर्चीली शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों के भरोसे छोड़ दिया जाता है। शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023-24 में सरकारी स्कूलों में 38,40,925 छात्र और 42,91,737 छात्राएं थीं यानी छात्राओं की संख्या छात्रों से 4,50,812 अधिक थी। वर्ष 2024-25 में छात्रों की संख्या घटकर 35,24,563 रह गई, जबकि छात्राओं की संख्या 40,37,324 थी। इस साल दोनों के बीच अंतर बढ़कर 5,12,761 हो गया। वर्ष 2025-26 में सरकारी स्कूलों में 34,04,419 छात्र और 39,08,190 छात्राएं दर्ज की गईं। इस वर्ष भी छात्राओं की संख्या छात्रों से 5,03,771 अधिक रही।
आर्थिक स्थिति और शिक्षा की गुणवत्ता :
स्कूलों के नामांकन से यह सच्चाई सामने आ रही है कि कई परिवार बेटी और बेटे के लिए अलग-अलग स्कूल चुनते हैं। इस अंतर के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक स्थिति और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर बनी सामाजिक धारणा हो सकती है। निजी स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम, बेहतर संचार कौशल, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और रोजगार के अवसरों से जोड़कर देखा जाता है। कई अभिभावक मानते हैं कि बेटे को निजी स्कूल में पढ़ाने से उसके भविष्य की संभावनाएं बढ़ेंगी। वहीं बेटी के मामले में सरकारी स्कूल को पर्याप्त मान लिया जाता है। यह सोच कई बार जानबूझकर किए गए भेदभाव के रूप में नहीं, बल्कि परिवार की प्राथमिकताओं और सीमित संसाधनों के बीच लिए गए निर्णय के रूप में भी सामने आती है। बेटी की सुरक्षा, स्कूल की दूरी, परिवहन और सामाजिक परंपराएं भी उसके स्कूल चयन को प्रभावित करती हैं। हालांकि दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों में छात्राओं की अधिक संख्या एक सकारात्मक पक्ष भी है। छात्रवृत्ति, निशुल्क पाठ्यपुस्तकें, पोषण योजनाएं और साइकिल जैसी सुविधाओं ने बेटियों की शिक्षा जारी रखने में सहायता की है, लेकिन इस व्यवस्था का सामाजिक असर दूरगामी हो सकता है।
पितृसत्तात्मक सोच की जड़ें :
सवाल ये भी है कि बेटी पढ़ तो रही होगी, लेकिन क्या उसे वही अवसर मिल रहे हैं, जो बेटे को मिल रहे हैं? यही इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। इसका असर केवल लड़कियों तक सीमित नहीं रहेगा। बेटों को बेहतर शिक्षा का प्राथमिक अधिकार देने वाली सोच उन्हें भी एक असमान सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बनाती है, जहां शिक्षा का मूल्य समान अवसर के बजाय लिंग के आधार पर तय होता है। लंबे समय में यह सोच महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता, निर्णय लेने की क्षमता और कार्यक्षेत्र में भागीदारी को प्रभावित कर सकती है। समाज में समानता का आधार केवल बेटियों का स्कूल पहुंचना नहीं, बल्कि उन्हें समान गुणवत्ता वाली शिक्षा और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलना है। इस अंतर को दूर करने के लिए सबसे पहले सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को लेकर अभिभावकों का भरोसा मजबूत करना होगा। यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि सिर्फ विज्ञापनों, पोस्टरों और नारों पर करोड़ों रुपए बहाने से पितृसत्तात्मक सोच की जड़ें नहीं हिलने वालीं। सरकार योजनाएं बना सकती है, स्कूल खोल सकती है और छात्रवृत्तियां दे सकती है, लेकिन परिवार की सोच में बदलाव के बिना शिक्षा की समानता अधूरी रहेगी। जिस दिन अभिभावक बेटी के स्कूल का चुनाव भी उतनी ही उम्मीदों से करेंगे, जितनी उम्मीदों से बेटे का करते हैं, उस दिन यह अंतर वास्तव में मिटना शुरू होगा। शिक्षा का असली अर्थ केवल बच्चे को स्कूल पहुंचाना नहीं, बल्कि उसके सपनों को बराबर का आसमान देना है। जिस समाज में बेटे की उड़ान के लिए आसमान चुना जाए और बेटी को केवल जमीन पर चलना सिखाया जाए, वहां विकास के आंकड़े भले बढ़ जाएं, बराबरी का सफर अधूरा ही रहेगा। जब तक हम अपने परिवारों के भीतर अपनी सोच में एक बड़ा सांस्कृतिक बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक नीतियां केवल कागजों पर ही दम तोड़ती रहेंगी।
-डॉ. मोनिका शर्मा
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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